पदावली - ९१ ते १००

संत रोहिदास (इ.स. १३७६ - इ.स. १५२७) हे मध्ययुगीन भारतातील हिंदू संत होते. यांच्या गुरूंचे नाव रामानंद स्वामी होते. कबीर यांचे समकालीन होत; तर मीराबाई यांच्या शिष्या होत्या.


९१. या रमां एक तूं दांनां, तेरा आदू बैश्नौं

या रमां एक तूं दांनां, तेरा आदू बैश्नौं।
तू सुलितांन सुलितांनां बंदा सकिसंता रजांनां॥ टेक॥
मैं बेदियांनत बदनजर दे, गोस गैर गुफतार।
बेअदब बदबखत बीरां, बेअकलि बदकार॥१॥
मैं गुनहगार गुमराह गाफिल, कंम दिला करतार।
तूँ दयाल ददि हद दांवन, मैं हिरसिया हुसियार॥२॥
यहु तन हस्त खस्त खराब, खातिर अंदेसा बिसियार।
रैदास दास असांन, साहिब देहु अब दीदार॥३॥
(राग जंगली गौड़ी)

९२. रथ कौ चतुर चलावन हारौ

रथ कौ चतुर चलावन हारौ।
खिण हाकै खिण ऊभौ राखै, नहीं आन कौ सारौ॥ टेक॥
जब रथ रहै सारहीं थाके, तब को रथहि चलावै।
नाद बिनोद सबै ही थाकै, मन मंगल नहीं गावैं॥१॥
पाँच तत कौ यहु रथ साज्यौ, अरधैं उरध निवासा।
चरन कवल ल्यौ लाइ रह्यौ है, गुण गावै रैदासा॥२॥
(राग सोरठी)

९३. राम गुसईआ जीअ के जीवना

राम गुसईआ जीअ के जीवना।
मोहि न बिसारहु मै जनु तेरा॥ टेक॥
मेरी संगति पोच सोच दिनु राती। मेरा करमु कटिलता जनमु कुभांति॥१॥
मेरी हरहु बिपति जन करहु सुभाई। चरण न छाडउ सरीर कल जाई॥२॥
कहु रविदास परउ तेरी साभा। बेगि मिलहु जन करि न बिलंबा॥३॥
(राग गौड़ी)

९४. राम जन हूँ उंन भगत कहाऊँ

राम जन हूँ उंन भगत कहाऊँ, सेवा करौं न दासा।
गुनी जोग जग्य कछू न जांनूं, ताथैं रहूँ उदासा॥ टेक॥
भगत हूँ वाँ तौ चढ़ै बड़ाई। जोग करौं जग मांनैं।
गुणी हूँ वांथैं गुणीं जन कहैं, गुणी आप कूँ जांनैं॥१॥
ना मैं ममिता मोह न महियाँ, ए सब जांहि बिलाई।
दोजग भिस्त दोऊ समि करि जांनूँ, दहु वां थैं तरक है भाई॥२॥
मै तैं ममिता देखि सकल जग, मैं तैं मूल गँवाई।
जब मन ममिता एक एक मन, तब हीं एक है भाई॥३॥
कृश्न करीम रांम हरि राधौ, जब लग एक एक नहीं पेख्या।
बेद कतेब कुरांन पुरांननि, सहजि एक नहीं देख्या॥४॥
जोई जोई करि पूजिये, सोई सोई काची, सहजि भाव सति होई।
कहै रैदास मैं ताही कूँ पूजौं, जाकै गाँव न ठाँव न नांम नहीं कोई॥५॥
(राग रामकली)

९५. राम बिन संसै गाँठि न छूटै

राम बिन संसै गाँठि न छूटै।
कांम क्रोध मोह मद माया, इन पंचन मिलि लूटै॥ टेक॥
हम बड़ कवि कुलीन हम पंडित, हम जोगी संन्यासी।
ग्यांनी गुनीं सूर हम दाता, यहु मति कदे न नासी॥१॥
पढ़ें गुनें कछू संमझि न परई, जौ लौ अनभै भाव न दरसै।
लोहा हरन होइ धँू कैसें, जो पारस नहीं परसै॥२॥
कहै रैदास और असमझसि, भूलि परै भ्रम भोरे।
एक अधार नांम नरहरि कौ, जीवनि प्रांन धन मोरै॥३॥

९६. राम मैं पूजा कहा चढ़ाऊँ

राम मैं पूजा कहा चढ़ाऊँ ।
फल अरु फूल अनूप न पाऊँ ॥टेक॥
थन तर दूध जो बछरू जुठारी ।
पुहुप भँवर जल मीन बिगारी ॥१॥
मलयागिर बेधियो भुअंगा ।
विष अमृत दोउ एक संगा ॥२॥
मन ही पूजा मन ही धूप ।
मन ही सेऊँ सहज सरूप ॥३॥
पूजा अरचा न जानूँ तेरी ।
कह रैदास कवन गति मोरी ॥४॥

९७. रामा हो जगजीवन मोरा

रामा हो जगजीवन मोरा।
तूँ न बिसारि राम मैं जन तोरा॥टेक॥
संकट सोच पोच दिनराती।
करम कठिन मोरि जाति कुजाती॥१॥
हरहु बिपति भावै करहु सो भाव।
चरण न छाड़ौं जाव सो जाव॥२॥
कह रैदास कछु देहु अलंबन।
बेगि मिलौ जनि करो बिलंबन॥३॥

९८. रांम राइ का कहिये यहु ऐसी

रांम राइ का कहिये यहु ऐसी।
जन की जांनत हौ जैसी तैसी॥ टेक॥
मीन पकरि काट्यौ अरु फाट्यौ, बांटि कीयौ बहु बांनीं।
खंड खंड करि भोजन कीन्हौं, तऊ न बिसार्यौ पांनी॥१॥
तै हम बाँधे मोह पासि मैं, हम तूं प्रेम जेवरिया बांध्यौ।
अपने छूटन के जतन करत हौ, हम छूटे तूँ आराध्यौ॥२॥
कहै रैदास भगति इक बाढ़ी, अब काकौ डर डरिये।
जा डर कौं हम तुम्ह कौं सेवैं, सु दुख अजहूँ सहिये॥३॥
(राग सोरठी)

९९. रांमहि पूजा कहाँ चढ़ाऊँ

रांमहि पूजा कहाँ चढ़ाऊँ।
फल अरु फूल अनूप न पांऊँ॥ टेक॥
थनहर दूध जु बछ जुठार्यौ, पहुप भवर जल मीन बिटार्यौ।
मलियागिर बेधियौ भवंगा, विष अंम्रित दोऊँ एकै संगा॥१॥
मन हीं पूजा मन हीं धूप, मन ही सेऊँ सहज सरूप॥२॥
पूजा अरचा न जांनूं रांम तेरी, कहै रैदास कवन गति मेरी॥३॥
(राग आसा)

१००. रे चित चेति चेति अचेत काहे

रे चित चेति चेति अचेत काहे, बालमीकौं देख रे।
जाति थैं कोई पदि न पहुच्या, राम भगति बिसेष रे॥ टेक॥
षट क्रम सहित जु विप्र होते, हरि भगति चित द्रिढ नांहि रे।
हरि कथा सूँ हेत नांहीं, सुपच तुलै तांहि रे॥१॥
स्वान सत्रु अजाति सब थैं, अंतरि लावै हेत रे।
लोग वाकी कहा जानैं, तीनि लोक पवित रे॥२॥
अजामिल गज गनिका तारी, काटी कुंजर की पासि रे।
ऐसे द्रुमती मुकती कीये, क्यूँ न तिरै रैदास रे॥३॥
(राग सोरठी)

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Last Updated : September 07, 2026

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