पदावली - ११ ते २०

संत रोहिदास (इ.स. १३७६ - इ.स. १५२७) हे मध्ययुगीन भारतातील हिंदू संत होते. यांच्या गुरूंचे नाव रामानंद स्वामी होते. कबीर यांचे समकालीन होत; तर मीराबाई यांच्या शिष्या होत्या.


११. आयौ हो आयौ देव तुम्ह सरनां

आयौ हो आयौ देव तुम्ह सरनां।
जांनि क्रिया कीजै अपनों जनां॥ टेक॥
त्रिबिधि जोनी बास, जम की अगम त्रास, तुम्हारे भजन बिन, भ्रमत फिर्यौ।
ममिता अहं विषै मदि मातौ, इहि सुखि कबहूँ न दूभर तिर्यौं॥१॥
तुम्हारे नांइ बेसास, छाड़ी है आंन की आस, संसारी धरम मेरौ मन न धीजै।
रैदास दास की सेवा मांनि हो देवाधिदेवा, पतितपांवन, नांउ प्रकट कीजै॥२॥
(राग रामकली)

१२. इहि तनु ऐसा जैसे घास की टाटी

इहि तनु ऐसा जैसे घास की टाटी।
जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी॥ टेक॥
ऊँचे मंदर साल रसोई। एक घरी फुनी रहनु न होई॥१॥
भाई बंध कुटंब सहेरा। ओइ भी लागे काढु सवेरा॥२॥
घर की नारि उरहि तन लागी। उह तउ भूतु करि भागी॥३॥
कहि रविदास सभै जग लूटिआ। हम तउ एक राम कहि छूटिआ॥४॥
(राग सूही)

१३. इहै अंदेसा सोचि जिय मेरे

इहै अंदेसा सोचि जिय मेरे।
निस बासुरि गुन गाँऊँ रांम तेरे॥ टेक॥
तुम्ह च्यतंत मेरी च्यंता हो न जाई, तुम्ह च्यंतामनि होऊ कि नांहीं॥१॥
भगति हेत का का नहीं कीन्हा, हमारी बेर भये बल हीनां॥२॥
कहै रैदास दास अपराधी, जिहि तुम्ह ढरवौ सो मैं भगति न साधी॥३॥
(राग सोरठी)

१४. ऐसा ध्यान धरूँ बनवारी

ऐसा ध्यान धरूँ बनवारी।
मन पवन दिढ सुषमन नारी॥ टेक॥
सो जप जपूँ जु बहुरि न जपनां, सो तप तपूं जु बहुरि न तपनां।
सो गुर करौं जु बहुरि न करनां, ऐसे मरूँ जैसे बहुरि न मरनां॥१॥
उलटी गंग जमुन मैं ल्याऊँ, बिन हीं जल संजम कै आंऊँ।
लोचन भरि भरि ब्यंव निहारूँ, जोति बिचारि न और बिचारूँ॥२॥
प्यंड परै जीव जिस घरि जाता, सबद अतीत अनाहद राता।
जा परि कृपा सोई भल जांनै, गूंगो सा कर कहा बखांनैं॥३॥
सुंनि मंडल मैं मेरा बासा, ताथैं जीव मैं रहूँ उदासा।
कहै रैदास निरंजन ध्याऊँ, जिस धरि जांऊँ (जब) बहुरि न आंऊँ॥४॥
(राग भैरूँ)

१५. ऐसी भगति न होइ रे भाई

ऐसी भगति न होइ रे भाई।
रांम नांम बिन जे कुछ करिये, सो सब भरम कहाई॥ टेक॥
भगति न रस दांन, भगति न कथै ग्यांन, भगत न बन मैं गुफा खुँदाई।
भगति न ऐसी हासि, भगति न आसा पासि, भगति न यहु सब कुल कानि गँवाई॥१॥
भगति न इंद्री बाधें, भगति न जोग साधें, भगति न अहार घटायें, ए सब क्रम कहाई।
भगति न निद्रा साधें, भगति न बैराग साधें, भगति नहीं यहु सब बेद बड़ाई॥२॥
भगति न मूंड़ मुड़ायें, भगति न माला दिखायें, भगत न चरन धुवांयें, ए सब गुनी जन कहाई।
भगति न तौ लौं जांनीं, जौ लौं आप कूँ आप बखांनीं, जोई जोई करै सोई क्रम चढ़ाई॥३॥
आपौ गयौ तब भगति पाई, ऐसी है भगति भाई, राम मिल्यौ आपौ गुण खोयौ, रिधि सिधि सबै जु गँवाई।
कहै रैदास छूटी ले आसा पास, तब हरि ताही के पास, आतमां स्थिर तब सब निधि पाई॥४॥

१६. ऐसी मेरी जाति भिख्यात चमारं

ऐसी मेरी जाति भिख्यात चमारं।
हिरदै राम गौब्यंद गुन सारं॥ टेक॥
सुरसुरी जल लीया क्रित बारूणी रे, जैसे संत जन करता नहीं पांन।
सुरा अपवित्र नित गंग जल मांनियै, सुरसुरी मिलत नहीं होत आंन॥१॥
ततकरा अपवित्र करि मांनियैं, जैसें कागदगर करत बिचारं।
भगत भगवंत जब ऊपरैं लेखियैं, तब पूजियै करि नमसकारं॥२॥
अनेक अधम जीव नांम गुण उधरे, पतित पांवन भये परसि सारं।
भणत रैदास ररंकार गुण गावतां, संत साधू भये सहजि पारं॥३॥
(राग आसा)

१७. ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै

ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै ।
गरीब निवाजु गुसाईआ मेरा माथै छत्रु धरै ॥
जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै ।
नीचउ ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै ॥
नामदेव कबीरू तिलोचनु सधना सैनु तरै ।
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभै सरै ॥

१८. ऐसे जानि जपो रे जीव

ऐसे जानि जपो रे जीव।
जपि ल्यो राम न भरमो जीव॥ टेक॥
गनिका थी किस करमा जोग, परपूरुष सो रमती भोग॥१॥
निसि बासर दुस्करम कमाई, राम कहत बैकुंठ जाई॥२॥
नामदेव कहिए जाति कै ओछ, जाको जस गावै लोक॥३॥
भगति हेत भगता के चले, अंकमाल ले बीठल मिले॥४॥
कोटि जग्य जो कोई करै, राम नाम सम तउ न निस्तरै॥५॥
निरगुन का गुन देखो आई, देही सहित कबीर सिधाई॥६॥
मोर कुचिल जाति कुचिल में बास, भगति हेतु हरिचरन निवास॥७॥
चारिउ बेद किया खंडौति, जन रैदास करै डंडौति॥८॥
(राग गौड़)

१९. ऐसौ कछु अनभै कहत न आवै

ऐसौ कछु अनभै कहत न आवै।
साहिब मेरौ मिलै तौ को बिगरावै॥ टेक॥
सब मैं हरि हैं हरि मैं सब हैं, हरि आपनपौ जिनि जांनां।
अपनी आप साखि नहीं दूसर, जांननहार समांनां॥१॥
बाजीगर सूँ रहनि रही जै, बाजी का भरम इब जांनं।
बाजी झूठ साच बाजीगर, जानां मन पतियानां॥२॥
मन थिर होइ तौ कांइ न सूझै, जांनैं जांनन हारा।
कहै रैदास बिमल बसेक सुख, सहज सरूप संभारा॥३॥
(राग रामकली)

२०. कवन भगितते रहै प्यारो पाहुनो रे

कवन भगितते रहै प्यारो पाहुनो रे ।
घर घर देखों मैं अजब अभावनो रे ॥टेक॥
मैला मैला कपड़ा केता एक धोऊँ ।
आवै आवै नींदहि कहाँलों सोऊँ ॥१॥
ज्यों ज्यों जोड़ै त्यों त्यों फाटै ।
झूठै सबनि जरै उड़ि गये हाटै ॥२॥
कह रैदास परौ जब लेख्यौ ।
जोई जोई, कियो रे सोई सोई देख्यौ ॥३॥

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Last Updated : September 07, 2026

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