पदावली - ४१ ते ५०

संत रोहिदास (इ.स. १३७६ - इ.स. १५२७) हे मध्ययुगीन भारतातील हिंदू संत होते. यांच्या गुरूंचे नाव रामानंद स्वामी होते. कबीर यांचे समकालीन होत; तर मीराबाई यांच्या शिष्या होत्या.


४१. जीवत मुकंदे मरत मुकंदे

जीवत मुकंदे मरत मुकंदे।
ताके सेवक कउ सदा अनंदे॥ टेक॥
मुकंद-मुकंद जपहु संसार। बिन मुकंद तनु होइ अउहार।
सोई मुकंदे मुकति का दाता। सोई मुकंदु हमरा पित माता॥१॥
मुकंद-मुकंदे हमारे प्रानं। जपि मुकंद मसतकि नीसानं।
सेव मुकंदे करै बैरागी। सोई मुकंद दुरबल धनु लाधी॥२॥
एक मुकंदु करै उपकारू। हमरा कहा करै संसारू।
मेटी जाति हूए दरबारि। तुही मुकंद जोग जुगतारि॥३॥
उपजिओ गिआनु हूआ परगास। करि किरपा लीने करि दास।
कहु रविदास अब त्रिसना चूकी। जपि मुकंद सेवा ताहू की॥४॥
(राग गौड़ी)

४२. जो तुम तोरौ रांम मैं नहीं तोरौं

जो तुम तोरौ रांम मैं नहीं तोरौं।
तुम सौं तोरि कवन सूँ जोरौं॥ टेक॥
तीरथ ब्रत का न करौं अंदेसा, तुम्हारे चरन कवल का भरोसा॥१॥
जहाँ जहाँ जांऊँ तहाँ तुम्हारी पूजा, तुम्ह सा देव अवर नहीं दूजा॥२॥
मैं हरि प्रीति सबनि सूँ तोरी, सब स्यौं तोरि तुम्हैं स्यूँ जोरी॥३॥
सब परहरि मैं तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा॥४॥ (राग सोरठी)

४३. जो मोहि बेदन का सजि आखूँ

जो मोहि बेदन का सजि आखूँ।
हरि बिन जीव न रहै कैसैं करि राखूँ॥ टेक॥
जीव तरसै इक दंग बसेरा, करहु संभाल न सुरि जन मोरा।
बिरह तपै तनि अधिक जरावै, नींदड़ी न आवै भोजन नहीं भावै॥१॥
सखी सहेली ग्रब गहेली, पीव की बात न सुनहु सहेली।
मैं रे दुहागनि अधिक रंजानी, गया सजोबन साध न मांनीं॥२॥
तू दांनां सांइंर् साहिब मेरा, खिजमतिगार बंदा मैं तेरा।
कहै रैदास अंदेसा एही, बिन दरसन क्यूँ जीवैं हो सनेही॥३॥
(राग विलावल)

४४. तब रांम रांम कहि गावैगा

तब रांम रांम कहि गावैगा।
ररंकार रहित सबहिन थैं, अंतरि मेल मिलावैगा॥ टेक॥
लोहा सम करि कंचन समि करि, भेद अभेद समावैगा।
जो सुख कै पारस के परसें, तो सुख का कहि गावैगा॥१॥
गुर प्रसादि भई अनभै मति, विष अमृत समि धावैगा।
कहै रैदास मेटि आपा पर, तब वा ठौरहि पावैगा॥२॥

४५. ताथैं पतित नहीं को अपांवन

ताथैं पतित नहीं को अपांवन। हरि तजि आंनहि ध्यावै रे।
हम अपूजि पूजि भये हरि थैं, नांउं अनूपम गावै रे॥ टेक॥
अष्टादस ब्याकरन बखांनै, तीनि काल षट जीता रे।
प्रेम भगति अंतरगति नांहीं, ताथैं धानुक नीका रे॥१॥
ताथैं भलौ स्वांन कौ सत्रु, हरि चरनां चित लावै रे।
मूंवां मुकति बैकुंठा बासा, जीवत इहाँ जस पावै रे॥२॥
हम अपराधी नीच घरि जनमे, कुटंब लोग करैं हासी रे।
कहै रैदास नाम जपि रसनीं, काटै जंम की पासी रे॥३॥
(राग विलावल)

४६. तुझहि चरन अरबिंद भँवर मनु

तुझहि चरन अरबिंद भँवर मनु।
पान करत पाइओ, पाइओ रामईआ धनु॥ टेक॥
कहा भइओ जउ तनु भइओ छिनु छिनु।
प्रेम जाइ तउ डरपै तेरो जनु॥१॥
संपति बिपति पटल माइआ धनु।
ता महि भगत होत न तेरो जनु॥२॥
प्रेम की जेवरी बाधिओ तेरो जन।
कहि रविदास छूटिबो कवन गुनै॥३॥
(राग आसा)

४७. तुझा देव कवलापती सरणि आयौ

तुझा देव कवलापती सरणि आयौ।
मंझा जनम संदेह भ्रम छेदि माया॥ टेक॥
अति संसार अपार भौ सागरा, ता मैं जांमण मरण संदेह भारी।
कांम भ्रम क्रोध भ्रम लोभ भ्रम, मोह भ्रम, अनत भ्रम छेदि मम करसि यारी॥१॥
पंच संगी मिलि पीड़ियौ प्रांणि यौं, जाइ न न सकू बैराग भागा।
पुत्र बरग कुल बंधु ते भारज्या, भखैं दसौ दिसि रिस काल लागा॥२॥
भगति च्यंतौं तो मोहि दुख ब्यापै, मोह च्यंतौ तौ तेरी भगति जाई।
उभै संदेह मोहि रैंणि दिन ब्यापै, दीन दाता करौं कौंण उपाई॥३॥
चपल चेत्यौ नहीं बहुत दुख देखियौ, कांम बसि मोहियौ क्रम फंधा।
सकति सनबंध कीयौ, ग्यान पद हरि लीयौ, हिरदै बिस रूप तजि भयौ अंधा॥४॥
परम प्रकास अबिनास अघ मोचनां, निरखि निज रूप बिश्रांम पाया।
बंदत रैदास बैराग पद च्यंतता, जपौ जगदीस गोब्यंद राया॥५॥
(राग धनाश्री)

४८. तू कांइ गरबहि बावली

तू कांइ गरबहि बावली।
जैसे भादउ खूंब राजु तू तिस ते खरी उतावली॥ टेक॥
तुझहि सुझंता कछू नाहि। पहिरावा देखे ऊभि जाहि।
गरबवती का नाही ठाउ। तेरी गरदनि ऊपरि लवै काउ॥१॥
जैसे कुरंक नहीं पाइओ भेदु। तनि सुगंध ढूढ़ै प्रदेसु।
अप तन का जो करे बीचारू। तिसु नहीं जम कंकरू करे खुआरू॥२॥
पुत्र कलत्र का करहि अहंकारू। ठाकुर लेखा मगनहारू।
फेड़े का दुखु सहै जीउ। पाछे किसहि पुकारहि पीउ-पीउ॥३॥
साधू की जउ लेहि ओट। तेरे मिटहि पाप सभ कोटि-कोटि।
कहि रविदास जो जपै नामु। तिस जातु न जनमु न जोनि कामु॥४॥
(राग बसंत)

४९. तू जानत मैं किछु नहीं भव खंडन राम

तू जानत मैं किछु नहीं भव खंडन राम।
सगल जीअ सरनागति प्रभ पूरन काम॥ टेक॥
दारिदु देखि सभ को हसै ऐसी दसा हमारी।
असटदसा सिधि कर तलै सभ क्रिया तुमारी॥१॥
जो तेरी सरनागता तिन नाही भारू।
ऊँच नीच तुमते तरे आलजु संसारू॥२॥
कहि रविदास अकथ कथा बहु काइ करी जै।
जैसा तू तैसा तुही किआ उपमा दीजै॥३॥
(राग विलावल)

५०. तेरा जन काहे कौं बोलै

तेरा जन काहे कौं बोलै।
बोलि बोलि अपनीं भगति क्यों खोलै॥ टेक॥
बोल बोलतां बढ़ै बियाधि, बोल अबोलैं जाई।
बोलै बोल अबोल कौं पकरैं, बोल बोलै कूँ खाई॥१॥
बोलै बोल मांनि परि बोलैं, बोलै बेद बड़ाई।
उर में धरि धरि जब ही बोलै, तब हीं मूल गँवाई॥२॥
बोलि बोलि औरहि समझावै, तब लग समझि नहीं रे भाई।
बोलि बोलि समझि जब बूझी, तब काल सहित सब खाई॥३॥
बोलै गुर अरु बोलै चेला, बोल्या बोल की परमिति जाई।
कहै रैदास थकित भयौ जब, तब हीं परंमनिधि पाई॥४॥

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Last Updated : September 07, 2026

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