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शिवानन्दलहरी - श्लोक ६१ ते ६५

शिवानंदलहरी में भक्ति -तत्व की विवेचना , भक्त के लक्षण , उसकी अभिलाषायें और भक्तिमार्ग की कठिनाईयोंका अनुपम वर्णन है । `शिवानंदलहरी ' श्रीआदिशंकराचार्य की रचना है ।


श्लोक ६१ ते ६५

६१

अंकोलं निजबीजसंततिरयस्कान्तोपलं सूचिका

साध्वी नैजविभुंलता क्षितिरुहं सिन्धुः सरिद्वल्लभम् ।

प्राप्रोतीह यथा तथा पशुपतेः पादारविन्दद्वयं

चेतोवृत्तिरुपेत्य तिष्ठति सदा सा भक्तिरित्युच्यते ॥६१॥

इस पद्य में कई उपमाएँ देकर भक्ति को परिभाषित किया गया है ।

 

६२

आनन्दाश्रुभिरातनोति पुलकं नैर्मल्यतश्छादनं

बाचाशड्ख .मुखे स्थितैश्च जठरापूर्ति चरित्रामृतैः ।

रुद्राक्षैर्भसितेन देव वयुषो रक्षां भवद्वावना -

पर्यडेक . विनिवेश्य भक्तिजननी भक्तार्भकं रक्षति ॥६२॥

 

६३

मार्गावर्तितपादुका पशुपतेरड्र .स्य कूर्चायते

गण्डूषाम्बुनिषेचनं पुररिपोर्दिव्याभिषेकायते ।

किच्चित्भक्षितमांसशेषकवलं नव्योपहारायते

भक्तिः किं न करोत्यहो वनचरो भक्तावतंसायते ॥६३॥

 

६४

वक्षस्ताडनमन्तकस्य कठिनापस्मारसंमर्दनं

भूभृत्पर्यटनं नमत्सुरशिरःकोटीरसंघर्षणम्

कर्मेदं मृदुलस्य तातकपदद्वन्द्वस्य किं वोचितं

मच्चेतोमणिपादुकाविहरणं शम्भो सदाड्री .कुरु ॥६४॥

 

६५

वक्षस्ताडनशड्क .या विचलितो वैवस्वतो निर्जराः

कोटीरोज्ज्वलरत्नदीपककलिकानीराजनं कुर्वते

दृष्ट्‍वा मुक्तिवधूस्तनोति निभृताश्लेषं भवानीपते

यच्चेतस्तव पादपद्मभजनं तस्येह कि दुर्लभम् ॥६५॥

Translation - भाषांतर

जिस प्रकार पिस्ते के बीज , पेड से जा चिपकते हैं । जैसे सुई चुम्बक पत्थर से जा चिपकती है ; जैसे पतिब्रता पत्नी अपनी पति की ओर आकर्षित होती है ; जैसे लता पेड से , और नदी समुद्र के पास आकर मिल जाती है ; उसी भाँति , हे पशुपति ! जब चित्तवृत्ति आपके चरण -कमलों को प्राप्त कर , वहीं सदा स्थिर हो जाती है , तो वह ’भक्ति ’ कहलाती है । ॥६१॥

इस पद्य में भक्ति का माता के रुप में और भक्त का उसके बालक के रुप में वर्णन किया गया है । माता अपने बालक को स्नान कराती है , कपड़े पहानाती है , उसे दूध पिलाती है , और उसके शरीर पर रक्षासूत्र बाँधती है ।

भक्तिमाता अपने बालक भक्त को आनन्द के अश्रुओं से स्नान कराकर , निर्मलता रुपी वस्त्र पहनाती है। भगवान् शिव के चरितामृत से वाणीरुपी शंख द्वारा भूख मिटाती है । रुद्राक्ष और भस्म से उसके शरीर की रक्षा करती है । हे देव पशुपति ! आपकी भावना रुपी पलंग पर सुला कर रक्षा करती है। ॥६२॥

( अगर सच्ची भक्ति हो तो सेवा - पूजा के विधि - विधान की क्या आवश्यकता ? शिवभक्त कण्णपर का ही उदाहरण लें ) जंगली शिकारी शिवभक्त कण्णपन की चलते - चलते घिसी हुई पैरों की जूती दोनों भोंओं के बीच का स्थान निश्चित करने के लिए ठीक थी । मुँह में भरे पानी के कुल्ले से भगवान् शिव का अभिषेक हो गया । कुछ - कुछ खाये हुए माँस के कौर का नैवेद्य वन गया । अहा ! भक्ति क्या नहीं कर सकती ! जंगली शिकारी भक्त शिरोमणि हो गया । ॥६३॥

मार्कण्डेय की केवल सोलह वर्ष की निर्धारित आयु थी । माता -पिता बड़े चिन्तित हुए । किन्तु बालक शिवलिड्र . की पूजा में सम्पूर्ण रुप से संलग्न हो गया । यम के दूत लेने आये , किन्तु शिवमन्दिर के गर्भगृह में प्रवेश नहीं पा सके । अन्त में स्वयं यमराज आये । भगवान् शिव ने लिड्र . से प्रकट होकर यमराज की छाती पर लात मारी । मार्कण्डेय चिरंजीवी हो गया । भक्त कल्पना करता है इस कठोर कार्य में भगवान् के कोमल चरण को चोट लगी होगी ।

दारुकवन के यज्ञ में अपस्मार (मिरगी से बीमार बोंना ) उत्पन्न हुआ । इसने शिव से युद्व करना चाहा । भगवान् ने पैर के अंगूठे से उसकी कमर तोड़ दी । नटराज की मूर्ति में भगवान् इसी अपस्मार को पैर से दबाये हुए दिखाई देते हैं । ॥६४॥

( इस पद्य का अर्थ समझने से पहले इसकी पृष्ठभूमि की कुछ कथाओं का स्मरण आवश्यक है ।

हे उमापते महेश्वर ! जो कोई भी आपके चरण -कमलों की सेवा करता है , उसके लिये क्या दुर्लभ है ? उससे मृत्यु का देवता , यम भी , दूर भागता है । उसे डर रहता है कि कहीं शिवभक्त मार्कण्डेय को बचाने के लिये शिव ने उसकी छाती पर लात मारी थी जैसी फिर लात न पड़ जाय । देवता उनकी अपने मुकुटों में लगे रत्नों की ज्योति से आरती उतारते हैं । मुक्तिबधू उसका नम्र आलिड्र .न करती है । ॥६५॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:58.6770000

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