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शिवानन्दलहरी - श्लोक ७१ ते ७५

शिवानंदलहरी में भक्ति -तत्व की विवेचना , भक्त के लक्षण , उसकी अभिलाषायें और भक्तिमार्ग की कठिनाईयोंका अनुपम वर्णन है । `शिवानंदलहरी ' श्रीआदिशंकराचार्य की रचना है ।


श्लोक ७१ ते ७५

७१

आरुढ़भक्तिगुणकुच्चितभावचाप -

युक्तै ःशिवस्मरणबाणगणैरमोघैः ।

निर्जित्य किल्बिषरिपून्विजयी सुधीन्द्रः

सानन्दमाविहति सुस्थिरराजलक्ष्मीम् ॥७१॥

 

७२

ध्यानाज्जनेन समवेक्ष तमःप्रदेशं

भित्वा महाबलिभिराश्वरनाममन्त्रैः ।

दिव्याश्रितं भुजगभूषणमुद्वहन्ति

ये पादपद्ममिह ते शिव ते कृता्र्थः ॥७२॥

 

७३

भूदारतामुदवहद्यदपेक्षया श्री -

भूदार एव कि्मतःसुमते लभस्व ।

केदारमाकलितमुक्तिमहौषधीनां

पादारविन्दभजनं परमेश्वरस्य ॥७३॥

 

७४

आशापाशक्लेशदुर्वासनादि -

भेदोद्युक्तैर्दिव्यगन्धैरमन्दैः ।

आशाशाटीकस्य पादारविन्दं

चेत ःपेटीं वासितां मे तनोतु ॥७४॥

 

७५

कल्याणिनं सरसचित्रगतिं सवेगं

सर्वेड्रि .तज्ञमनधं ध्रुवलक्षणाढयम् ।

चेतस्तुरड्र .मधिरुह्य चर स्मरारे

नेत ः समस्तजगतां बृषभाधिरुढ ॥७५॥

Translation - भाषांतर

सुदृढ़ भक्तिरुपी प्रत्यच्चा से चिन्तनरुपी धनुष को खींचकर , शिवस्मरणरुपी अमोघ बाणॊं से पापरुपी शत्रुओं को जीतकर विजयी , मनीषी सानन्द अचल राजलक्ष्मी -मोक्ष -प्राप्त करते हैं । ॥७१॥

( छीपे हुए खजाने को ढूँढने के लिये , कहते हैं , पहले आँखों में जादू का अच्चन लगाना होता है । फीर प्रवेश प्राप्त करने के लिये मन्त्रों सहित बलि दी जाती है ) ध्यानरुपी अच्चन आँखों में लगाकर , ईश्वरनामरुपी मन्त्रों से युक्त आवश्यक बलि द्वारा अंधकारयुक्त प्रदेश में मार्ग निकाल कर , देवताओं से सेवित , और सर्पो के आभूषणों से सुशोभित , आपके चरण कमलों को जो प्राप्त करते हैं वे ही धन्य हैं । ॥७२॥

हे मेरे मन ! भगवान् शिव के चरण -कमलों का आश्रय ले । ये चरण कमल उस जुती हुई , पानी से भरी हुई , मुक्तिरुपी महाऔषध की क्यारी के समान हैं जिसकीं मुझे अभिलाषा है । यह पादपद्मभूमि अत्यंत दुर्लभ है । जब श्री और भू के पति , महाविष्णु ने शूकर रुप धारण कर इसे खोजने का प्रयत्न किया तो वे भी सफल नहीं हुए । ॥७३॥

मेरा मन आशा -दुराशा , क्लेश और बुरी भावनाओ की दुर्गन्ध से भरा हुआ है । दिगम्बर भगवान शिव के चरण -कमलों की दिव्य सुगन्ध , इस दुर्गन्ध को हटाकर , मेरे चित्तरुपी वक्से को सुगन्धित करे। ॥७४॥

हे कामदेव को पराजित करनेवाले जगत के स्वमी ! आप बैल की सवारी करते हैं । मेरा चित्तरुपी तुरड्र . आपकी सेवा के लिये उपयुक्त है । यह शुभदर्शन है , मनोहर विचित्र गतिवाला है , और द्रुतगामी है । यह अपने स्वामी के प्रत्येक आशय को समझ सकता है , और शुभलक्षणों से सुशोभित है । आप इस पर सवार होकर विचरण करें । ॥७५॥


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Last Updated : 2016-11-11T11:54:58.7870000

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