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शिवानन्दलहरी - श्लोक ७६ ते ८०

शिवानंदलहरी में भक्ति -तत्व की विवेचना , भक्त के लक्षण , उसकी अभिलाषायें और भक्तिमार्ग की कठिनाईयोंका अनुपम वर्णन है । `शिवानंदलहरी ' श्रीआदिशंकराचार्य की रचना है ।


श्लोक ७६ ते ८०

७६

भक्तिर्महेशपदपुष्करमावसन्ती

कादम्बिनीव कुरुते परितोषवर्षम् ।

संपूरितो भवति यस्य मनस्तटाक -

स्तज्जन्मसस्यमखिलं सफलं च नान्यत् ॥७६॥

 

७७

बुद्धिःस्थिरा भवितुमीश्वरपादपद्म -

सक्ता वधूर्विरहिणीव सदा स्मरन्ती ।

सद्वावनास्मरणदर्शनकीर्तनादि

संमोहितेव शिवमन्त्रजपेन विन्ते ॥ ७७॥

 

७८

सदुपचारविधिष्वनुबोधितां

सविनयां सुह्रदं समुपाश्रिताम् ।

मम समुद्वर बुद्विमिमां प्रभो

वरगुणेन नवोढवधूमिव ॥७८॥

 

७९

नित्यं योगिमन ःसरोजदलसंचारक्षमस्त्वत्क्र्मः

शंभो तेन कथं कठोरयमराड्‍वक्षः कवाटक्षतिः ।

अत्यन्तं मृदुलं त्वदंघ्रियुगलं हा मे मनश्चिन्तय -

त्येतल्लोचनगोचरं कुरु विभो हस्तेन संवाहये ॥७९॥

 

८०

एष्यत्येष जनिं मनोऽस्य कठिनं तस्मित्रटानीति मद्‍ -

रक्षायै गिरिसीम्नि कोमल पद -न्यासपुराभ्यासि्तः ।

नो चेद्दिव्यगृहान्तरेषु सुमनस्तल्पेषु वेद्यादिषु

प्रयः सत्सु शिलातलेषु नटनं शंभो किमर्थ तव ॥८०॥

Translation - भाषांतर

भगवान शिव की भक्ति मेघों से भरे आकाश की भाँति है । इससे जलभरे बादलों की पंक्ति के समान आनन्दरुपी जल की वर्षा होती है । जिस किसी का मनसरोवर इस जल की वर्षा से अच्छी तरह भर जाता है , उसी की जीवनरुपे खेती सफल होती है , दूसरों की नहीं । ॥७६॥

विरहिणी नवबधू के समान , जो अपने प्रियतम का स्मरण करती रहती है , भगवान् शिव के चरण -कमलों में अनुरक्त भक्ति , सुदृढ़ होने के लिये सद् -विचार , नामस्मरण , दर्शन , कीर्तन आदि में सम्मोहित -सी , शिवमन्त्र के जाप में संलग्न रहती है । ॥ ७७॥

जैसे नवोढ़ा वधू को उसके पति के सद्गगुणों की चर्चा द्वारा शिक्षित करते हैं , वैसे ही हे प्रभु ! मेरी इस बुद्बि को , जो उचित उपचारों में शिक्षित है , जो विनयशील है , हितैषियों के आश्रय में पली है , ऊपर -अपनी ओर -आकर्षित कीजिये । ॥७८॥

हे शंभो ! आपके चरणकमल तो अत्यंत कोमल हैं । योगियों के चित्तरुपी कमलदलों पर नित्य विहार करते हैं । इन कोमल चरणों ने यमराज के बक्षस्थल के कठोर कपाट कैसे तोड़े होंगे ? मैं यही चिन्ता करता रहता हूँ । आपके चरणयुगल तो बड़े कमनीय कोमल हैं । उन्हें मेरी आँखों के सामने प्रकट कीजिये । मैं हाथों से संवाहन करुँगा , उन्हें सहलाऊँगा । ॥७९॥

हे शंभो ! मैं कल्पना करता हूँ आपने सोचा होगा कि , "यह जन्मेगा और इसका कठोर मन होगा । मुझे इस कठोर मन पर ही नृत्य करता है । " तभी तो आप कठोर पहाड़ियों की तलहटियों पर नृत्य का अभ्यास करते हैं । यदि ऐसा नहीं है तो महलों , फूलों के गद्दों , और मनोरम वेदियों के होते हुए शिलातलों पर नृत्य का क्या अर्थ है ॥८०॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:58.8330000

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