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शिवानन्दलहरी - श्लोक ११ ते १५

शिवानंदलहरी में भक्ति -तत्व की विवेचना , भक्त के लक्षण , उसकी अभिलाषायें और भक्तिमार्ग की कठिनाईयोंका अनुपम वर्णन है । `शिवानंदलहरी ' श्रीआदिशंकराचार्य की रचना है ।


श्लोक ११ ते १५

११

वटुर्वा गेही वा यतिरपि जटी वा तदितरो

नरो वा य : कश्चिद्ववतु भव किं तेन भवति ।

यदीयं ह्रत्पद्मं यदि भवदधीनं पशुपते

तदीयस्त्वं शंभो भवसि भवभारं च वहसि ॥११॥

 

१२

गुहायां गेहे वा वहिरपि वने वा‍ऽद्रिशिखरे

जले वा वह्रौ वा वसतु वसते : किं वद फलम् ।

सदा यस्यैवान्त : करणमपि शंभो तव पदे

स्थितं चेद्योगोऽसौ स च परमयोगी स च सुखी ॥१२॥

 

१३

असारे संसारे निज भजनदूरे जडधिया

भ्रमन्तं मामन्धं परमकृपया पातुमुचितम्

मदन्य : को दीनस्तव कृपणरक्षातिनिपुण -

स्त्वदन्य : को वा मे त्रिजगति शरण्य : पशुपते ॥१३॥

 

१४

प्रभुस्त्वं दीनानां खलु परमबन्धु :पशुपते !

प्रमुख्योऽहं तेषामपि किमुत बन्धुत्वमनयो ।

त्वयैव क्षन्तव्या : शिव मदपराधाश्च सकला :

प्रयत्नात्कर्तव्यं मदवनमियं बन्धुसरणि ॥१४॥

 

१५

उपेक्षा नो चेत्किं न हरसि भवद्वयानविमुखां

दुराशाभूयिष्ठां विधिलिपिमशक्तो यदि भवान् ।

शिरस्तद्वैधात्रं ननु खलु सुवृत्तं पशुपते

कथं वा निर्यत्नं करनरमुखेनैव लुलितम् ॥१५॥

Translation - भाषांतर

हे भव ! (भगवान् शिव !) मनुष्य विद्याध्ययन करने वाला ब्रह्यचारी हो , गृहस्थ हो , वानप्रस्थी यति हो , सन्यासी हो , अथवा इनसे भी अलग कोई और हो -कोई भी हो , इससे क्या होता है ? यदि , हे पशुपति ! उसका ह्रदय -कमल आपके अधीन हो तो आप उसके हो जाते हैं , और उसका सांसारिक भार स्वयं वहन करते हैं । ॥११॥

कोई भले ही घर में रहे , चाहे बाहर रहे , वनों में रहे चाहे पर्वतों की चोटियों पर , पानी में रहे चाहे अग्नि में -कही भी निवास करे । बताइये निवास -स्थान का क्या महत्व है । हे शिवशंकर ! यदि किसी का अन्त :करण सदा आपके चरणॊं में स्थित है , जो आपका अनन्य भक्त है , तो वही योग है , वह भक्त ही परमयोगी और परमसुखी है । ॥१२॥

अपनी जड़ता के कारण संसार में आने -जाने के व्यर्थ चक्कर में पडा हुआ , और आपके भजन से दुर मुझ विवेकहीन अंधे पर आप भक्त वत्सल की कृपा उचित ही है । मुझ जैसा दीन -मलीन और आप जैसा दीन -दुखियों की रक्षा करने में निपुण , हे पशुपति ! और कहाँ मिलेगा ॥१३॥

हे प्रभो ! आप दीनों के परम हितकारी बन्धु हैं । हे पशुपति ! दीन -दुखियों में मैं अग्रगण्य हूँ । यह बन्धुत्व का कैसा संयोग है ! इसलिए , हे शिव ! मेरे समस्त अपराध आप द्वारा क्षमा करने योग्य है | यदि कुछ कठिनाई भी हो , कुछ प्रयत्न भी करना पडे , तो भी मेरी रक्षा का भार आप पर है । बन्धुओं में सम्बन्धों की यही रीति प्रचलित है । ॥१४॥

हे प्रभो पशुपति ! ऐसा लगता है कि आप मेरी ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं । यदि ऐसा नहीं होता तो आप मेरी उस भाग्य -लिपी को क्यों नही मिटाते जिसमें आपके ध्यान से विमुख होना , और बुरी -बुरी कामनाएँ करना लिखा है। आप यह नहीं कर सकते यह तो संभव नहीं है । यह सर्वविदित है कि आपने सहजभाव से , विना किसी प्रयत्न किये , ब्रह्या का वह पाँचवाँ मस्तक हाथ के नाखूनों से नोंच कर अलग कर दिया था । ॥१५॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:58.1470000

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किरविल

  • पु. सर्प ; किरडू . ' किरविल जैसा पसरला । ' - वेसीस्व ४ . ९९ . ( सं . कृमि किंवा कीर + आवली ?) 
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