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शिवानन्दलहरी - श्लोक ४१ ते ४५

शिवानंदलहरी में भक्ति -तत्व की विवेचना , भक्त के लक्षण , उसकी अभिलाषायें और भक्तिमार्ग की कठिनाईयोंका अनुपम वर्णन है । `शिवानंदलहरी ' श्रीआदिशंकराचार्य की रचना है ।


श्लोक ४१ ते ४५

४१

पापोत्पातविमोचनाय रुचिरैश्वर्याय मृत्युज्जय

स्तोत्रध्याननतिप्रदक्षिणसपर्यालोकनाकर्णने ।

जिह्राचित्तशिरोड्‍ .घ्रिहस्तनयनश्रोत्रैरहं प्रार्थितो

मामाज्ञापय तत्रिरुपय मुहुर्मामेव मा मेऽव चः ॥४१॥

 

४२

गाम्भीर्य परिखापदं घनघृ तिः प्राकार उद्यद्रुण -

स्तोमश्वाप्तबलं घनेन्द्रियचयो द्वाराणि देहे स्थि तः ।

विद्या वस्तुसमृद्विरित्यखिलसामग्रीसमेते सदा

दुर्गातिप्रियदेव मामकमनोदुर्गे निवासं कुरु ॥४२॥

 

४३

मा गच्छ त्वमितस्ततो गिरिश भो मय्येव वासं कुरु

स्वामित्रदिकिरात मामकमन ःकान्तारसीमान्तरे ।

वर्तन्ते बहुशो मृगा मदजुषो मात्सर्यमोहादय -

स्तान्हत्वा मृगयाविनोदरुचितालाभं च संप्राप्स्यसि ॥४३॥

 

४४

करलग्नमृ गःकरीन्द्रभृड्रो

घनशार्दूलविखण्डनोऽस्तज न्तुः ।

गिरिशो विशदाकृतिश्च चे तः -

कुहरे पच्चमुखोऽस्ति मे कुतो भीः ॥४४॥

 

४५

छन्दश्शाखिशिखान्वितैर्द्विजव रैःसंसेविते शाश्वते

सौख्यापादिनि खेदभेदिनि सुधासा रैः फलैर्दीपिते ।

चे तः पक्षिशिखामणे त्यज वृथासंचारमन्यैरलं

नित्यं शंकरपादपद्मयुगलीनीडे विहारं कुरु ॥४५॥

Translation - भाषांतर

हे मृत्युज्जय ! पापों के उत्पात का निवारण करने के लिए और रुचिर ऐश्वर्य के लिये मेरी इन्द्रियों द्वारा आपकी भक्ति की मुझसे प्रार्थना की जा रही है । मेरी जिह्रा स्तुति के लिये , चित्त ध्यान के लिये , शिर वन्दना के लिये , पैर प्रदक्षिणा के लिये , हाथ सेवा -पूजा के लि ये , नेत्र दर्शन के लिये , कान सुनने के लिये आपके आदेश की प्रार्थना कर रहे हैं । आप विस्तारसे मेरे लिये आपकी भक्ति के विधान समझाइये । बार -बार समझाइये । मेरे लिये मौन व्याख्यान अपर्याप्त है , मैं उसे नहीं समझ पाऊँगा । ॥४१॥

हे दुर्गा भवानी के अत्यंत प्रिय प्रभो ! (हे दुर्गप्रिय स्वामी !) आप मेने मन रुपी दुर्ग में सदा विराजमान रहिये । इस दुर्ग के चारों ओर गम्भीरता रुपी खाई है । अडिग धैर्य का परकोटा है । उत्तम गुणों के समूह की राजकीय सेना हैं । शरीर की इन्द्रियों के समूहों के दृढ़ द्वार हैं । विद्यारुपी धन -सम्पदा है । ॥४२॥

हे स्वामी कैलासपति आदिकिरात ! आप मृगया के लिये इधर -उधर मत जाइये । मेरे मन में ही वास कीजिये । मेरे इस मन में बड़ा घना जंगल है , जिसमें मोह , मत्सर आदि न जाने कितने मदमस्त जानवर रहते हैं । इन खूँख्वार जानवरों का शिकार कर मनोरंजन कीजिये और लाभ पाइये । ॥४३॥

मेरे चित्त की गुफा में पच्चमुखी शिव निवास करते हैं । मुझे किससे डर है ? वे कैलासपति बड़ी आकृतिवाले हैं । उन्होंने एक हाथ में दौड़ता हुआ मृग पकड़ रखा है , और गज चर्म धारण किये हुए हैं । उन्होंने भयंकर शार्दूल दैत्य को परास्त किया है । जिन्होंने पशु -चर्म धारण किया हुआ है , और जो पर्वतेश्वर हैं । ॥४४॥

हे मन पंछी , हे मनरुपी पक्षिराज ! इधर -उधर भटकना छोड़ । अब बहुत हो चुका । सदा भगवान् शंकर के चरणकमल युगल का आश्रय ले -वहाँ अपना घोंसला बना । इन चरणकमलों की वेदान्तवेत्ता पण्डित सदा सेवा करते हैं । इनसे परमसुख की प्राप्ति होती हैं , और दु ःखों का निवारण होता है । ये अमृत फलों से सुशोभित हैं । ॥४५॥


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Last Updated : 2016-11-11T11:54:58.4730000

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