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सकुचत हौं अति राम कृपानिध...

भजन - सकुचत हौं अति राम कृपानिध...

तुलसीदास हिन्दीके महान कवी थे, जिन्होंने रामचरितमानस जैसी महान रचना की ।


सकुचत हौं अति राम कृपानिधि क्यों करि बिनय सुनावौं ।

सकल धरम बिपरीत करत, केहि भाँति नाथ मन भावौं ॥१॥

जानत हौं हरि रूप चराचर, मैं हठि नैन न लावौं ।

अंजन-केस-सिखा जुवती तहँ लोचन सलभ पठावौं ॥२॥

स्त्रवननिको फल कथा तुम्हारी, यह समुझों समुझावौं ।

तिन्ह स्त्रवननि परदोष निरंतर, सुनि-सुनि भरि-भरि तावौं ॥३॥

जेहि रसना गुन गाइ तिहारे, बिनु प्रयास सुख पावौं ।

तेहि मुख पर अपवाद भेक ज्यों, रटि रटि जनम नसावौं ॥४॥

'करहु ह्रदय अति बिमल बसहिं हरि', कहि कहि सबहिं सिखावौं ।

हौं निज उर अभिमान-मोह मद-खल मण्डली बसावौं ॥५॥

जो तनु धरि हरिपद साधहिं जन सो बिनु काज गवावौं ।

हाटक-घट भरि धर्‌यौ सुधा गृह तजि नभ कूप खनावौं ॥६॥

मन-क्रम-बचन लाइ कीन्हें अघ, ते करि जतन दुरावौं ।

पर-प्रेरित इरषा बस कबहुँक, किय कछु सुभ सो जनावौं ॥७॥

बिप्र द्रोह जनु बाँट परयो, हठि सबसों बैर बढ़ावौं ।

ताहू पर निज मति-बिलास सब संत माँझ गनावौं ॥८॥

निगम-सेस सारद निहोरि जो, अपने दोष कहावौ ।

तौ न सिराहि कलप सत लगि प्रभु, कहा एक मुख गावौं ॥९॥

जो करनी आपनी बिचारौं तौ कि सरन हौं आवौं ।

मृदुल सुभाव सील रघुपतिको, सो बल मनहिं दिखावौं ॥१०॥

तुलसीदास प्रभु सो गुन नहिं जेहि सपनेहुँ तुमहिं रिझावौं ।

नाथ कृपा भवसिंधु धेनुपद सम जो जानि सिरावौं ॥११॥

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Last Updated : December 15, 2007

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