बहुजिनसी - ॥ समास दूसरा - सर्वज्ञसंगनिरूपणनाम ॥

‘स्वधर्म’ याने मानवधर्म! जिस धर्म के कारण रिश्तों पहचान होकर मनुष्य आचरन करना सीखे ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
अज्ञानता से जो कुछ हुआ। हुआ सो हो गया । सूझबूझ से आचरण करना । चाहिये नियम से ॥१॥
ज्ञाता की संगत धरें । ज्ञाता की सेवा करें । ज्ञाता की सद्बुद्धि लें । धीरे धीरे ॥२॥
ज्ञाता के पास लिखना सीखें । ज्ञाता के पास पढना सीखें । ज्ञाता से पूछें । सब कुछ ॥३॥
ज्ञाता के लिये करें उपकार । ज्ञाता के लिये जुझायें शरीर । ज्ञाता का देखें विचार । कैसा है ॥४॥
ज्ञाता की संगति से भजें । ज्ञाता की संगति से जूझें । ज्ञाता की संगति से रिझें । विवरण कर पुनः पुनः ॥५॥
ज्ञाता के साथ गायें गाने । ज्ञाता के साथ बजायें । नाना आलाप सीखें । ज्ञाता के पास ॥६॥
ज्ञाता के पीछे रहें । ज्ञाता की औषधि लें । ज्ञाता कहे सो करें । पथ्य पहले ॥७॥
ज्ञाता के पास परीक्षा सीखना । ज्ञाता के पास तालीम करना। ज्ञाता के पास तैरने का । अभ्यास करें ॥८॥
ज्ञाता जो बोले वैसे बोलें । ज्ञाता कहे वैसे चलें । ज्ञाता का ध्यान करें । नाना प्रकार से ॥९॥
ज्ञाता की कथायें सीखें । ज्ञाता की युक्ति समझें । ज्ञाता की सकल बातों का करें । विवरण ॥१०॥
ज्ञाता के पेंच जानें । ज्ञाता से अंतरंग खोलें । ज्ञाता रखता वैसे रखें । लोग राजी ॥११॥
ज्ञाता के जानें प्रसंग । ज्ञाता के लें रंग । ज्ञाता के स्फूर्ति के तरंग । अभ्यास करें ॥१२॥
ज्ञाता का साक्षेप लें । ज्ञाता का तर्क जानें । ज्ञाता के उल्लेख समझें । न बोलते हुये ही ॥१३॥
ज्ञाता का धूर्तपन । ज्ञाता का राजकारण । ज्ञाता का निरूपण । सुनते जायें ॥१४॥
ज्ञाता के कवित्व सीखें । गद्य पद्य पहचानें । माधुर्यवचन समझें । अंतर्याम में ॥१५॥
ज्ञाता के देखें प्रबंध । ज्ञाता के वचनभेद । ज्ञाता के नाना संवाद । खोजें अच्छे से ॥१६॥
ज्ञाता की तीक्ष्णता । ज्ञाता की सहिष्णुता । ज्ञाता की उदारता । समझ कर लें ॥१७॥
ज्ञाता की नाना कल्पना । ज्ञाता की दीर्घसूचना । ज्ञाता की विवंचना । समझ कर लें ॥१८॥
ज्ञाता का काल सार्थक । ज्ञाता का अध्यात्मविवेक । ज्ञाता के गुण अनेक । सारे ही लें ॥१९॥
ज्ञाता का भक्तिमार्ग । ज्ञाता का वैराग्ययोग । ज्ञाता का सारा प्रसंग । समझाकर लें ॥२०॥
ज्ञाता का देखें ज्ञान । ज्ञाता का सीखें ध्यान । ज्ञाता के सूक्ष्म चिन्ह । समझकर लें ॥२१॥
ज्ञाता का अलिप्तपन । ज्ञाता के विदेहलक्षण । ज्ञाता का ब्रह्मविवरण । समझकर लें ॥२२॥
ज्ञाता एक अंतरात्मा । क्या बखानें उसकी महिमा । विद्याकलागुणसीमा । कौन करें ॥२३॥
परमेश्वर के गुणानुवाद । अखंड करें संवाद । उनके कारण आनंद । उदंड होता ॥२४॥
परमेश्वर जो निर्माण करता । वह दृष्टि से अखंड दिखता । पुनः पुनः विवरण से समझता । विवेकी जनों को ॥२५॥
जितना कुछ हुआ निर्माण । उतना जगदीश्वर ने किया निर्माण । अलग करना निर्माण । चाहिये पहले ॥२६॥
वह निर्माण करता है जन । परंतु देखने पर न होता दर्शन । विवेक बल से अनुमान । में लाते जायें ॥२७॥
उसका अखंड धरने पर ध्यान । कृपालु बन के देता अशन । सर्वकाल संभाषण । तदंश से ही करें ॥२८॥
ध्यान ना धरे वह अभक्त । ध्यान धरे वह भक्त । संसार से मुक्त । भक्तों को करे ॥२९॥
उपासना की अंत में । अखंड भेंट देव भक्त में । अनुभवी जानता ये बातें। प्रत्यय की ॥३०॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे सर्वज्ञसंगनिरूपणनाम समास दूसरा ॥२॥

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Last Updated : December 09, 2023

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