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भवानि स्तोतुं त्वां प्रभव...

आनन्दलहरी - भवानि स्तोतुं त्वां प्रभव...

सती पार्वतीची दहा रूपे - काली,  तारा, छिन्नमस्ता, भुवनेश्वरी, बगलामुखी, धूमावती, त्रिपुर सुंदरी, मातंगी, षोड़शी आणि भैरवी.


आनन्दलहरी
भवानि स्तोतुं त्वां प्रभवति चतुर्भिर्न वदनैः
प्रजानामीशानस्त्रिपुरमथनः पञ्चभिरपि ।
न षड्भिः सेनानीर्दशशतमुखैरप्यहिपतिः
तदान्येषां केषां कथय कथमस्मिन्नवसरः ॥१॥

घृतक्षीरद्राक्षामधुमधुरिमा कैरपि पदैः
विशिष्यानाख्येयो भवति रसनामात्र विषयः ।
तथा ते सौन्दर्यं परमशिवदृङ्मात्रविषयः
कथंकारं ब्रूमः सकलनिगमागोचरगुणे ॥२॥

मुखे ते ताम्बूलं नयनयुगळे कज्जलकला
ललाटे काश्मीरं विलसति गळे मौक्तिकलता ।
स्फुरत्काञ्ची शाटी पृथुकटितटे हाटकमयी
भजामि त्वां गौरीं नगपतिकिशोरीमविरतम् ॥३॥

विराजन्मन्दारद्रुमकुसुमहारस्तनतटी
नदद्वीणानादश्रवणविलसत्कुण्डलगुणा
नताङ्गी मातङ्गी रुचिरगतिभङ्गी भगवती
सती शम्भोरम्भोरुहचटुलचक्षुर्विजयते ॥४॥

नवीनार्कभ्राजन्मणिकनकभूषणपरिकरैः
वृताङ्गी सारङ्गीरुचिरनयनाङ्गीकृतशिवा ।
तडित्पीता पीताम्बरललितमञ्जीरसुभगा
ममापर्णा पूर्णा निरवधिसुखैरस्तु सुमुखी ॥५॥

हिमाद्रेः संभूता सुललितकरैः पल्लवयुता
सुपुष्पा मुक्ताभिर्भ्रमरकलिता चालकभरैः ।
कृतस्थाणुस्थाना कुचफलनता सूक्तिसरसा
रुजां हन्त्री गन्त्री विलसति चिदानन्दलतिका ॥६॥

सपर्णामाकीर्णां कतिपयगुणैः सादरमिह
श्रयन्त्यन्ये वल्लीं मम तु मतिरेवं विलसति ।
अपर्णैका सेव्या जगति सकलैर्यत्परिवृतः
पुराणोऽपि स्थाणुः फलति किल कैवल्यपदवीम् ॥७॥

विधात्री धर्माणां त्वमसि सकलाम्नायजननी
त्वमर्थानां मूलं धनदनमनीयांघ्रिकमले ।
त्वमादिः कामानां जननि कृतकन्दर्पविजये
सतां मुक्तेर्बीजं त्वमसि परमब्रह्ममहिषी ॥८॥

प्रभूता भक्तिस्ते यदपि न ममालोलमनसः
त्वया तु श्रीमत्या सदयमवलोक्योऽहमधुना।
पयोदः पानीयं दिशति मधुरं चातकमुखे
भृशं शङ्के कैर्वा विधिभिरनुनीता मम मतिः ॥९॥

कृपापाङ्गालोकं वितर तरसा साधुचरिते
न ते युक्तोपेक्षा मयि शरणदीक्षामुपगते ।
न चेदिष्टं दद्यादनुपदमहो कल्पलतिका
विशेषः सामान्यैः कथमितरवल्लीपरिकरैः ॥ १०॥

महान्तं विश्वासं तव चरणपङ्केरुहयुगे
निधायान्यन्नैवाश्रितमिह मया दैवतमुमे ।
तथापि त्वच्चेतो यदि मयि न जायेत सदयं
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥११॥

अयः स्पर्शे लग्नं सपदि लभते हेमपदवीं
यथा रथ्यापाथः शुचि भवति गंगौघमिलितम् ।
तथा तत्तत्पापैरतिमलिनमन्तर्मम यदि
त्वयि प्रेम्णासक्तं कथमिव न जायेत विमलम् ॥१२॥

त्वदन्यस्मादिच्छाविषयफललाभे न नियमः
त्वमर्थानामिच्छाधिकमपि समर्था वितरणे ।
इति प्राहुः प्राञ्चः कमलभवनाद्यास्त्वयि मनः
त्वदासक्तं नक्तं दिवमुचितमीशानि कुरु तत् ॥१३॥

स्फुरन्नानारत्नस्फटिकमयभित्तिप्रतिफल
त्त्वदाकारं चञ्चच्छशधरकलासौधशिखरम् ।
मुकुन्दब्रह्मेन्द्रप्रभृतिपरिवारं विजयते
तवागारं रम्यं त्रिभुवनमहाराजगृहिणि ॥१४॥

निवासः कैलासे विधिशतमखाद्याः स्तुतिकराः
कुटुम्बं त्रैलोक्यं कृतकरपुटः सिद्धिनिकरः ।
महेशः प्राणेशस्तदवनिधराधीशतनये
न ते सौभाग्यस्य क्वचिदपि मनागस्ति तुलना ॥१५॥

वृषो वृद्धो यानं विषमशनमाशा निवसनं
श्मशानं क्रीडाभूर्भुजगनिवहो भूषणविधिः
समग्रा सामग्री जगति विदितैव स्मररिपोः
यदेतस्यैश्वर्यं तव जननि सौभाग्यमहिमा ॥१६॥

अशेषब्रह्माण्डप्रलयविधिनैसर्गिकमतिः
श्मशानेष्वासीनः कृतभसितलेपः पशुपतिः ।
दधौ कण्ठे हालाहलमखिलभूगोलकृपया
भवत्याः संगत्याः फलमिति च कल्याणि कलये ॥१७॥

त्वदीयं सौन्दर्यं निरतिशयमालोक्य परया
भियैवासीद्गंगा जलमयतनुः शैलतनये ।
तदेतस्यास्तस्माद्वदनकमलं वीक्ष्य कृपया
प्रतिष्ठामातन्वन्निजशिरसिवासेन गिरिशः ॥१८॥

विशालश्रीखण्डद्रवमृगमदाकीर्णघुसृण
प्रसूनव्यामिश्रं भगवति तवाभ्यङ्गसलिलम् ।
समादाय स्रष्टा चलितपदपांसून्निजकरैः
समाधत्ते सृष्टिं विबुधपुरपङ्केरुहदृशाम् ॥१९॥

वसन्ते सानन्दे कुसुमितलताभिः परिवृते
स्फुरन्नानापद्मे सरसि कलहंसालिसुभगे ।
सखीभिः खेलन्तीं मलयपवनान्दोलितजले
स्मरेद्यस्त्वां तस्य ज्वरजनितपीडापसरति ॥२०॥

॥इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता आनन्दलहरी सम्पूर्णा ॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-07-12T01:55:52.0100000

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धर्मगुप्त

  • n. सोमवंशीय नंद राजा का पुत्र । एक बार यह अरण्य में गया था । संध्यासमय होने के कारण, उसी अरण्य के एक वृक्ष का इसने रातभर के लिये सहारा लिया । रात के समय, उसी वृक्ष का सहारा लेने एक रीछ आया । उसके पीछे एक सिंह लगा हुआ था । रीछ ने राजा ने कहा, ‘मित्र, तुम घबराना नहीं । सिंह के डर से मैं यहॉं आया हूँ । हम दोनों इस वृक्ष के सहारे रात बिता लेंगे । आधी रात तक तुम जागो । आधी रात तक मैं जाग कर तुम्हें सम्हालूँगा’। राजा निश्चिंत मन से सो गया । नीचे खडा सिंह, रीछ से बोला, ‘तुम राजा को नीचे फेंक दो’। रीछ ने यह अमान्य कर कहा, ‘विश्वसघात करना बहुत ही बडा पाप हैं’। बाद में राजा को जागृत कर वह स्वयं सो गया । सिंह ने राजा से कहा, ‘तुम रीछ को नीचे ढकेल दो’। दुर्बुद्धि सूझ कर राजा ने रीछ को नीचे ढकेल दिया, परंतु सावधानी से रीछ वृक्षों के डालो में अपने आप को फँसा दिया । पश्चात् इसने क्रोधवश राजा को शाप दिया, ‘तुम पागल हो जाओगे’। रीछ आगे बोला, ‘मैं भृगुकुल क ध्यानकाष्ट नामक ऋषि हूँ । मन चाहा रुप मैं ले सकता हूँ । तुम विश्वास घात से मुझे नीचे ढकेल रहे थे, इसलिये मैंने तुम्हें शाप दिया है’। सिंह से भी उसने कहा, ‘तुम भद्र नामक यक्ष तथा कुबेर के सचिव थे । गौतम ऋषि के आश्रम में दोषहर में निर्लज्जता से स्त्री के साथ क्रीडा करने के कारण, गौतम ने तुम्हें सिंह बनने का शाप दिया था । मेरे साथ संवाद करने पर पुनः यक्षरुप प्राप्त होने का उःशाप भी, तुम्हे मिला था’। ध्यानकाष्ट का यह भाषण सुन कर, सिंह पुनः यक्ष बना एवं विमान में बैठ कर अलकापुरी चला गया । धर्मगुप्त के पागल होने की वार्ता सुन कर, नंद राजा राजाधानी में वापस आया । उसने जैमिनि ऋषि को, अपने पुत्र के पागलपन का उपाय पूछा । उसने राजा को पुष्करिणी तीर्थ पर, स्नान करने के लिये कहा । नंद ने वैसा करने पर, उसके पुत्र धर्मगुप्त का पागलपन निकल गया । पश्चात् नंद राजा पुनः तप करने के लिये वन में गया [स्कंद.२.१.१३] 
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Category : Puranic Literature
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