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नवमोऽध्यायः - अष्टकवर्ग

सृष्टीचमत्काराची कारणे समजून घेण्याची जिज्ञासा तृप्त करण्यासाठी प्राचीन भारतातील बुद्धिमान ऋषीमुनी, महर्षींनी नानाविध शास्त्रे जगाला उपलब्ध करून दिली आहेत, त्यापैकीच एक ज्योतिषशास्त्र होय.


अष्टकवर्ग

स्वाद् अर्कः प्रथमाय बन्धु निधन द्व्याज्ञा तपो द्यूनगो वक्रात्

स्वाद् इव तद्वद् एवरविजाच्छुक्रात् स्मरान्त्यारिषु ।

जीवाद् धर्म सुताय शत्रुषु दश त्र्यायारिगः शीतगोरेष्वेवान्त्य

तपः सुतेषु च बुधाल् लग्नात् स बन्ध्वन्त्यगः ॥१॥

लग्नात् षट् त्रि दशायगः स धन धी धर्मेषु चाराच्छशी स्वात्

सास्तादिषु साष्ट सप्तसु रवेः षट् त्र्याय धीस्थो यमात् ।

धी त्र्यायाष्टम कण्टकेषु शशिजाज् जीवाद् व्ययायाष्टगः केन्द्रस्थश्च

सितात् तु धर्म सुखधी त्र्यायास्पदानङ्गगः ॥२॥

वक्रस्तूपचयेष्विनात् स तनयेष्वाद्याधिकेषूदयाच् ।

चन्द्राद् दिग् विफलेषु केन्द्र निधन प्राप्त्यर्थगः स्वाच्छुभः ।

धर्मायाष्टम केन्द्रगोऽर्क तनयाज् ज्ञात् षट् त्रि धी लाभगः ।

शुक्रात् षड् व्यय लाभ म्ऱ्त्युषु गुरोः कर्मान्यलाभारिषु ॥३॥

द्व्याद्यायाष्ट तपः सुखेषु भृगुजात् स त्र्यात्मजेष्विन्दुजः

साज्ञास्तेषु यमारयोर्व्ययरिपु प्राप्त्यष्टगो वाक् पतेः ।

धर्मायारि सुत व्ययेषु सवितुः स्वात् साद्य कर्म त्रिगः षट्

स्वायाष्ट सुखास्पदेषु हिमगोः साद्येषु लग्नाच्छुभः ॥४॥

दिक् स्वाद्याष्टमदाय बन्धुषु कुजात् स्वात् त्रिकेष्वङ्गिराः सूर्यात्

सत्रि नवेषु धी स्व नवदिग् लाभारिगो भार्गवात् ।

जायायरथ नवात्मजेषु हिमगोर्मन्दात् त्रि षड् धी व्यये दिग् धी

षट् स्व सुखाय पूर्व नवगो ज्ञात् स स्मरश्च उदयात् ॥५॥

लग्नाद् आ सुत लाभरन्ध्र नवगः सान्त्यः शशाङ्कात् सितः

स्वात् साज्ञेषु सुख त्रि धी नवदश च्छिद्राप्तिगः सूर्यजात् ।

रन्ध्राय व्यगो रवेर्नवदश प्राप्त्यष्टधीस्थो गुरोर्ज्ञाद्

धी त्र्याय नवारिगस्त्रि नव षट् पुत्रायसान्त्यः कुजात् ॥६॥

मन्द स्वात् त्रि सुताय शत्रुषु शुभः साज्ञान्त्यगो भूमिजात्

केन्द्रायाष्टधनेष्विनाद् उपचयेष्वाद्ये सुखे च उदयात् ।

धर्मायारि दशान्त्य मृत्युषु बुधाच्चन्द्रात् त्री षड् लाभगः

षष्ठायान्त्य गतः सितास्सुर गुरोः प्राप्त्यन्त्यधी शत्रुषु ॥७॥

इति निगदितम् इष्टं नेष्टम् अन्यद् विशेषाद् अधिक फल विपाकं जन्म भात् तत्रदद्युः ।

उपचय गृह मित्र स्वोच्चगैः पुष्टम् इष्टं अवपचय गृह नीचारातिगैर्नेष्ट सम्पत् ॥८॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2012-01-16T20:51:55.6730000

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बृबु (तक्षन)

  • n. ऋग्वेद निर्दिष्ट एक उदार दाता, जो पणि लोग का अधिपति था [ऋ.६.४५.३१-३३] । बृबु तक्षन् एवं प्रस्तोक सार्ञ्जय राजाओं से भरद्वाज ऋषि को विपुल उपहार प्राप्त होने का निर्देश ऋग्वेद एवं सांख्यायन श्रौतसूत्र में प्राप्त है [सां.श्रौ.१६.११.११] । यह स्वयं पणि अतएव हीन जति का होने के कारण, इसके द्वार कोई ऋषि दान न लेता था । किंतु भरद्वाज ऋषि अपने परिवार के साथ निर्जन अरण्य में रहता था, एवं उसे जीविका का कोई भी साधन उपलब्ध नहीं था । इस कारण बृबु से गायों का दान (प्रतिग्रह) लेते हुए भी, उए भरद्वाज को कोई दोष न लगा [मनु.१०.१०७] संभवतः मनुस्मृति में निर्दिष्ट बृधु तक्षन् एवं बृबु तक्षन् एक ही व्यक्ति होंगे । बृबु स्वयं एक पणि था । किंतु‘पाणियों का उन्मूलन करनेवाला’ ऐसा भी आशय ऋग्वेद के निर्देश से ग्रहण किया जा सकता है । यदि ऐसा ही है, तो ‘पणि’ का अर्थ ‘व्यापारी लोग’ हो कर, बृबु उनका राजा होना संभवनीय है । 
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