अध्याय छठा - श्लोक १ से २०

देवताओंके शिल्पी विश्वकर्माने, देवगणोंके निवासके लिए जो वास्तुशास्त्र रचा, ये वही ’ विश्वकर्मप्रकाश ’ वास्तुशास्त्र है ।


इसके अनन्तर प्रासादोंकी विधिको कहताहुं -रुद्रदेवता और विष्णु देवता और देवताओंमें उत्तम ब्रम्हा आदि ॥१॥

इनका शुभस्थानमें स्थापन करना योग्य है अन्यथा ये भयकेम दाता होते है, गर्ताआदिका चिन्ह जिसमें हो और जिसका गन्ध और स्वाद श्रेष्ठ हो वह पृथिवी ॥२॥

और जिसका वर्ण श्रेष्ठ हो वह पृथिवी सब कामनाओंकी दाता होती है. अपने पितामहसे पूर्वके जो आठ कुल हैं ॥३॥

अपने सहित उन सबको विष्णुका मन्दिर बनवानेवाला तारता है और जो हमारे कुलमें कोई विष्णुका भक्त हो ॥४॥

ऎसा और हम विष्णुका मन्दिर बनवावेंगे ऎसा जो सदैव भक्तिसे ध्यान करते है उनके भी पूर्व लोकका १०० सौ जन्मोंका किया पाप नष्ट होता है ॥५॥

भो द्विजेन्द्रो ! देवताके मन्दिरमें जितने परमाणउ होते है उतने सहस्त्रवर्षपर्यत कर्ता स्वर्गलोकमें वसता है ॥६॥

जो यह मैने पुण्य कहा वह मिट्टीसे बनाये हुए मन्दिरमें होता है और उससे दश गुणा पुण्य पत्थरसे बनाये हुएमें होता है ॥७॥

उससे भी दशगुणा लोहेसे बनायेमें और उससे भी सौ १०० गुणा तांबेके बनाये हुएमें और उससे भी हजार गुणा सुवर्णके मन्दिरमें होता है ॥८॥

रत्नोंसे जडित मनोहर ( रमणीय ) मन्दिरके बनानेसे अनन्तफ़ल होता है , कनिष्ठ मध्यम और श्रेष्ठ विष्णुके मन्दिर बनानेसे ॥९॥

स्वर्गलोक विष्णुलोक और मोक्षको प्राप्त होता है और बाल्य अवस्थामें पांसु ( धूलि ) से खेलते हुए बालक जो वासुदेव हरिके भवनको ॥१०॥

करते हैं वे भी विष्णुलोकमें जाते है, जो भूमि घरके बनानेमें श्रेष्ठ है वही प्रासाद्की भूमिमें भी श्रेष्ठ है ॥११॥

जो विधि घरके बनानेमें और शिलाके स्थापन करनेमें है वही प्रासाद आदिमेंभी जाननी. चार ४ शिला ॥१२॥

नन्दा भद्रा जया पूर्णा नामकी आग्नेय आदि दिशाओमें प्रासादमें भी स्थापन करै. प्रासाद आदिमें वास्तु चतु:षष्टि (६४ ) पदका होता है ॥१३॥

चतु:षष्टिपद वास्तुमें ब्रम्हा चतुष्पद होता है और शेष देवता अपने अपने पदमें स्थित होते हैं. और इसमें वास्तुपूजाकी विधि गृहस्थापन कर्मके तुल्य होती है ॥१४॥ विधिसे वास्तुका भलीप्रकार पूजन करके फ़िर शिलाका स्थापन करै, प्रथम संक्षेपसे शिलाका उत्तम लक्षण देखे ॥१५॥

उसके अनन्तर शिल स्थापनविधिको कहते हैं- शिला हो वा ईंट हो चारों लक्षणसे युक्त ॥१६॥

भलीप्रकार मनोहर और समान और चारों तरफ़से हाथभर बनवा कर प्रासादाआदिमें विधिसे ॥१७॥

विस्तारके विभाग और बाहुल्यके तुल्य शिला और ईंटोंका प्रमाण और लक्षण कहाहै ॥१८॥

नंदा आदि शिलाओंकें अधिष्ठान ( नीचे ) की शिला अथवा ईंट जाननी और शिलाओंके रुपको जानना और नंदा आदि इष्टका कहीहै ॥१९॥

सम्पूर्ण शिलाओंका तल श्रेष्ठ हो और सब चिकनी समान लक्षणोंसे युक्त होयँ और सब कुशा और दूर्वासे चिहित ध्वजा छत्र चँवरसे युक्त होय तो धन्य होतीहै ॥२०॥

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Last Updated : January 20, 2012

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