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y yari sahab

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भृगु (प्रजापति)

  • n. पुराणों में निर्दिष्ट प्रजापतियों में से एक, जो स्वायंभुव तथा चाक्षुष मन्वन्तर के सप्तर्षियो मे से एक था । स्वायंभुव मन्वन्तर में इसकी उत्पत्ति ब्रह्मा के हृदय से हुयी । यह स्वायंभुव मनु का दामाद एवं शंकर का साढू था । 
  • दक्षयज्ञ n. शंकर का अपमान कर के जिस समय दक्ष ने यज्ञ किया था, उस समय यह उपस्थित था, एवं दक्ष के द्वारा की गई शंकर की निन्दा में इसने भी भोगा लिया था । शंकर को जब यह ज्ञात हुआ तब उसने सबसे पहले नंदी को यज्ञविध्वंस करने के लिए भेजा, किंतु भृगु ने उसे शाप दे कर भगा दिया । तब शिव ने अपने पार्षद वीरभद्र को भेजा । वीरभद्र ने दक्षयज्ञ का विध्वंस किया, तथा यज्ञ में भाग लेनेवाले सभी ऋषियों को विद्रूप बना डाला । उसने क्रोध में आकर इसकी दाढी भे जला डाली । यह विध्वंसकारी लीला से भयातुर हो कर, सभी ऋषियों एवं देवों ने शंकर की स्तुति की, जिससे प्रसन्न हो कर शंकर ने इसे बकरे के दाढी प्रदान की [भा.४.५.१७-१९] । ब्रह्मांड के अनुसार, दक्ष द्वारा अपमानित होने के कारण शिव ने इसे जला डाला था [ब्रह्मांड.२.११.१-१०] 
  • देवदैत्य संग्राम n. देवों तथा असुरों के बीच होनेवाले युद्ध में दैत्यों को पराजय का मुख देखना पडा । यह देख कर, असुरों के गुरु शुक्र ‘संजीवनी’ मंत्र लाने के लिए गया । दूसरी ओर भृगु, जो असुरों का बडा पक्षपाती था, वह भी तपस्या के लिए चला गया । तब इसकी पत्नी देवों से संग्राम करती रही । विष्णु ने उसे युद्धभूमि में डट कर देवों को मारते हुए देखा । पहले तो वह शान्त रहे, फिर बिना विचार किये हुए कि वह स्त्री है, उन्होंने अपने सुदर्शन चक्रद्वारा उसका वध किया । भृगु को जैसे ही यह पता चला, इसने संजीवनीमंत्र से अपनी पत्नी को जिंदा किया, तथा विष्णु को शाप दिया, ‘तुम्हे गर्भ में रह कर उसकी पीडा को सहन कर, पृथ्वी पर अवतार लेना पडेगा’ [दे.भा.४.११-१२] । स्त्रीवध उचित है अथवा अनुचित इसके बारे में यह निर्देश रामायण में प्राप्त है । ‘ताडकावध’ के समय विश्वामित्र ने राम को समझाते हुए कहा था कि, विशेष प्रसंग में ‘स्त्रीवध’ अनुचित नहीं, उचित है [वा.रा.बा.२५.२१] । विष्णु को भृगु से शाप मिलने की एक दूसरी कथा पद्मपुराण में प्राप्त है । विष्णु ने पहले भृगु को यह वचन दिया था कि, वह इसके यज्ञ की रक्षा करेगा । किन्तु यज्ञ के समय वह इन्द्र के निमंत्रण पर उसके यहॉं चला गया । यज्ञ के समय विष्णु को न देख कर दैत्यों ने इसके यज्ञ का नाश किया । इससे क्रोधित हो कर भृगु ने विष्णु को मृत्युलोक में दस बार जन्म लेने का शाप दिया [पद्म.भू.१२१] 
  • देवों की परीक्षा n. एक बार स्वायंभुव मनु ने एक यज्ञ किया, जिसमें यह विवाद खडा हुआ कि, ब्रह्म विष्णु तथा महेश में कौन श्रेष्ठा है? भृगु उस में था, अतएव इस बात का पता लगाने का काम इसे सौंपा गया । भृगु सर्वप्रथम कैलाश पर्यत पर शंकरजी के यहॉं गया । वहॉं पर नंदी ने इसे अन्दर जाने के लिए रोका, कारण कि वहॉं शंकर-पार्वती क्रीडा में निमग्न थे । इसप्रकार के अपमान एवं उपेक्षा को यह सहन न कर सका, और क्रोधावेश में शंकर को शाप दिया, ‘तुम्हारे शरीर का आकार लिंग रुप में माना जायेगा, तथा तुम्हारे उपर चढाये हुये जल को ले कर कोई भी व्यक्ति तीर्थ रुप में पान न करेगा’। इसके उपरांत यह ब्रह्मा के पास गया, वहॉं ब्रह्मा ने न इसका नमस्कार ही किया, और न इसका उचुत सम्मान कर उत्थापन ही दिया । इससे क्रोधित होकर इसने शाप दिया, ‘तुम्हारा पूजन कोई न करेगा’। अंत में यह विष्णु पास गया । विष्णु उस समय सो रहे थे । यह दो देवताओं से रुष्ट ही था । क्रोध में आकर भृगु ने विष्णुके सीने पर कस कर एक लात मारी । विष्णु की नींद टूटी तथा उन्होंने इसे नमस्कार कर पूछा, ‘आप के पैरों को तो छोट नहीं लगी" । विष्णु की यह शालीनता देखकर भृगु प्रसन्न हुआ, तथा इसने विष्णु को सर्वश्रेष्ठ देवता की पदवी प्रदान की [पद्म. उ.२५५] । भृगु के द्वारा किये गये लात के प्रहार को श्रीविष्णु ने ‘श्रीवित्स’ चिह्र मानकर धारण किया [भा१०.८९.१-१२] 
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