Dictionaries | References

हयग्रीव

A Sanskrit English Dictionary | sa  en |   | 
हय—ग्रीव  m. m. ‘horse-necked’, N. of a form of विष्णु (manifested accord. to one legend, in order to recover the वेद carried off by two दैत्यs called मधु and कैटभ), [Pañcar.]
ब्रह्म-वेद-प्रहर्तृ   of a दैत्य (also called , as having carried off the वेदs at the dissolution of the universe caused by ब्रह्म's sleep at the end of the past कल्प; in order to recover them, विष्णु became incarnate as a मत्स्य or fish, and slew हय-ग्रीव), [Hariv.]; [Kathās.] &c.
of a राक्षस, [R.]
of a तन्त्र deity, [Buddh.]
of a राजर्षि, [MBh.]
of a wicked king of the विदेहs, [MBh.]
of a मुनि, [Cat.]
of the supposed author of the छान्दोग्यउपनिषद् and various other writers &c., ib.

Shabda-Sagara | sa  en |   | 
हयग्रीव  m.  (-वः) A prince of the Daityas, who during BRAHMA'S sleep at the end of a KALPA stole the Vedas; in the recovery of them, he was slain by VISHṆU, after his descent as the MATSYA or fish Avatār.
E. हय a horse, and ग्रीवा neck.

हयग्रीव n.  विष्णु का एक अवतार। यह अश्वमुखी होने के कारण इसे ‘हयग्रीव’ नाम प्राप्त हुआ था । इसे ‘हयशिरस्’ ‘अश्वशिरस्’ नामांतर भी प्राप्त थे (विष्णु देखिये) ।
हयग्रीव n.  अगस्त्य ऋषि को कांची नगरी में इसके दिये दर्शन का वर्णन ब्रह्मांड में प्राप्त है, जहाँ इसे शंख, चक्र, अक्षवलय एवं ‘पुस्तक’ (ग्रंथ) धारण करनेवाला कहा गया है [ब्रह्मांड. ४.५, ९.३५-४०]
हयग्रीव n.  इस साहित्य में सर्वत्र इसे विष्णु का नहीं, बल्कि यज्ञ का अवतार कहा गया है । किन्तु तैत्तिरीय आरण्यक में यज्ञ को विष्णु का ही एक प्रतिरूप कथन किया गया है । इससे प्रतीत होता है कि, वैदिक एवं पौराणिक साहित्य मतें निर्दिष्ट हयग्रीवकथा का स्तोत्र एक ही है, जिसका प्रारंभिक रूप वैदिक साहित्य में पाया जाता है । पंचविश ब्राह्मण में हयग्रीव की कथा निम्नप्रकार बतायी गयी है । एक बार अग्नि, इंद्र, वायु एवं यज्ञ (विष्णु) ने एक यज्ञ किया । इस यज्ञ के प्रारंभ में यह तय हुआ था कि, यज्ञ को जो हविर्भाग प्राप्त होगा, वह सभी देवताओं में बाँट दिया जायेगा । उस समय यज्ञ को सर्वप्रथम हविर्भाव प्राप्त हुआ, जिसे ले कर वह भाग गया । इस कारण बाकी सारे देव इसका पीछा करने लगे । अपने दैवी धनुष की सहायता से यज्ञ ने सभी देवताओं को हरा दिया । अन्त में एक दीमक के द्वारा देवों ने यज्ञ के धनुष की प्रत्यंचा कटवा दी, एवं इस प्रकार असहाय हुए यज्ञ का मस्तक कटवा दिया । तत्पश्चात् अपने कृतकर्म के लिए यज्ञ देवों से माफ़ी माँगने लगा । इस पद देवों ने अश्विनों के द्वारा एक अश्वमुख यज्ञ के कबंध पर लगा दिया [पं. ब्रा. ७.५.६];[ तै. आ. ५.१];[ तै. सं. ४.९.१]
हयग्रीव n.  यही कथा स्कंद पुराण आदि पौराणिक साहित्य में कुछ मामूली फर्क के साथ दी गयी है । एक बार देवताओं की प्रतियोगिता में विष्णु सर्वश्रेष्ठ देव सिद्ध हुआ। इस कारण क्रुद्ध हो कर, ब्रह्मा ने उसे उसका टूट जाने का शाप दिया । आगे चल कर एक अश्वमुख लगा कर यह देवताओं के यज्ञ में शामिल हुआ । यज्ञसमाप्ति के पश्चात् इसने धर्मारण्य में तप किया, जहाँ शिव की कृपा से इसका अश्वमुख नष्ट को कर इसे अपना पूर्वरूप प्राप्त हुआ ।
हयग्रीव n.  पौराणिक साहित्य में हयग्रीव एवं मधुकैटभ असुरों का वध करने के लिए श्रीविष्णु का हयग्रीव नामक अवतार होने का निर्देश प्राप्त है । एक बार हयग्रीव नामक असुर ने पृथ्वी में स्थित वेदों का हरण किया । उस पर ब्रह्मादि सारे देव हयग्रीव की शिकायत ले कर विष्णु के पास गये । पश्चात् विष्णु आदि देव हयग्रीव के पास पहुँच गये, जहाँ इन्होनें देखा कि, वह असुर भूमि पर अपने धनुष रख कर पास ही सो गया है । तदुपरांत विष्णु ने पास ही स्थित दीमक की सहायता से हयग्रीव असुर केधनुष की प्रत्यंचा को तोड़ डाला, एवं उसका नाश किया । हयग्रीव के धनुष की प्रत्यंचा टूटते ही विष्णु का स्वयं का मुख भी टूट गया, जो आगे चल कर विश्र्वकर्मन् की सहायता से पुनः जोड़ा गया । उस समय विश्वकर्मन् ने विष्णु को जो मुख प्रदान किया था, वह अश्व का था । इस कारण हयग्रीव असुर का वध करनेवाले इस अवतार को ‘हयग्रीव’ नाम प्राप्त हुआ [दे. भा. १.५] । देवी भागवत के अनुसार, हयग्रीव असुर को देवी का आशीर्वाद था कि, केवल ‘हयग्रीव’ नाम धारण करनेवाला व्यक्ति ही उसका वध कर सकती है । इस कारण हयग्रीव का अवतार ले कर विष्णु को इसका वध करना पड़ा । विष्णु के इस अवतार का निर्देश महाभारत में भी प्राप्त है [म. उ. १२८.४९];[ म. शां. १२२.४६, २३६.५६] । रसातल में रहनेवाले मधु एवं कैकटक नामक राक्षसों का वध भी इसी अवतवार के द्वारा होने का निर्देश महाभारत में प्राप्त है [म. शां. ३३५.५२-५५];[ भा. ५.१८. १-६]
हयग्रीव n.  इसीके आराधना से पंचाल ऋषि ने वेदों का क्रमपाठ प्राप्त किया था [म. शां. ३३५.६९-७१]
हयग्रीव II. n.  एक असुर, जो कश्यप एवं दिति के पुत्रों में से एक था [पद्म. उ. २३०] । इसका जन्म पूर्वकल्प की रात्रि में हुआ था । पृथ्वीप्रलय के समय इसने वेदों का हरण किया जिन्हें हयग्रीव का अवतार ले कर श्रीविष्णु ने पुनः प्राप्त किया (हयग्रीव देखिये) । भागवत के अनुसार, इसका वध हयग्रीव अवतार के द्वारा नहीं, बल्कि विष्णु के मत्स्यावतार के द्वारा हुआ था [भा. ८.२४. ९-५७]
हयग्रीव III. n.  एक दानव, जो कश्यप एवं दनु के पुत्रों में से एक था । यह वृत्र का [भा. ६.१०.१९]; हिरण्यकशिपु का [भा. ७.२.४]; एवं तारकासुर का अनुगामी था ।
हयग्रीव IV. n.  एक असुर, जो नरकासुर का प्रमुख अनुयायी, एवं उसके राज्य की रक्षा करनेवाले पाँच प्रमुख असुरों में से एक था । श्रीकृष्ण ने इसका वध किया [म. स. परि. १.१९.१३७७];[ म.उ. १२८.४९]
हयग्रीव V. n.  एक राजा, जिसने क्षात्रधर्मानुसार उत्तम रीति से राज्य कर मुक्ति प्राप्त की थी [म. शां. २५. २२-३३]
हयग्रीव VI. n.  विदेशवंश का एक कुलांगार राजा [म. उ. ७२.१५]

Puranic Encyclopaedia  | en  en |   | 
HAYAGRĪVA I   An Asura, the son of Kaśyapaprajāpati by his wife Danu. [Vālmīki Rāmāyaṇa, Araṇyakāṇḍa, Canto 14]. As a child the Asura began tapas on the banks of river Sarasvatī, and after a thousand years Devī appeared and asked him to choose any boon he wanted, and he wanted to become invincible by Devas and Asuras, and also deathless. When Devī told him that such a boon was out of question, he wanted the boon that he (Hayagrīva) should not be killed by anyone but by a Hayagrīva (one with the horse's neck). Devī granted him the boon. Hayagrīva, who became haughty and overconfident on receiving such a boon, went about the three worlds troubling good people, and at last he clashed with the Devas. As he could be killed only by one with the head of a horse the combined attack of Mahāviṣṇu and the Devas did not succeed in defeating him and Mahāviṣṇu decided to rest for some time to recoup himself from weariness. During his rest his head was hit by the end of his own bow and the head was severed from the trunk. Mahāviṣṇu replaced the head thus lost with that of a horse and killed Hayagrīva in fight. (For details see Cital).
HAYAGRĪVA II   An asura who guarded the kingdom of Narakāsura. He was killed by Śrī Kṛṣṇa, [Udyoga Parva, Chapter 130 Verse 50].
HAYAGRĪVA III   A King born in the Videha dynasty. [Udyoga Parva, Chapter 74, Verse 15].
HAYAGRĪVA IV   A saintly king. Though he defeated his enemies, yet, as he had no backing and support, he was finally killed. The story of Hayagrīva was told by Vyāsa to teach Dharmaputra the lesson that even the greatest of heroes requires the support of others. Though killed, Hayagrīva secured a place in heaven. [Śānti Parva, Chapter 24, Verse 23].
HAYAGRĪVA V   An incarnation of Viṣṇu.
1) In Vedic literature:
--In Vedic literature incarnation as Hayagrīva is attributed not to Viṣṇu, but to Yajña. But the Taittirīya āraṇyaka depicts yajña as a protoform of Viṣṇu. The inference that may be drawn from the above is that the root of the Hayagrīva story detailed in Vedic and Purāṇic literature is one and the same. About the Hayagrīva incarnation the Pañcaviṁsabrāhmaṇa contains the following story. Agni, Indra, Vāyu and Yajña (Viṣṇu) once began a yajña on the understanding that the havirbhāga obtained from it should be divided among all the Devas. But, in violation of the agreement, yajña left the place carrying away the whole Yajñabhāga with him, and he drove back the Devas who followed him with the help of the bow presented to him by Devī. Finally the Devas got the string of the bow bitten off by termites and the bow which got straightened up cut off yajña's head. Yajña then apologized for his offence and then the devas got the Aśvinīdevas to fix the head of a horse to the trunk of Yajña. [Pañcaviṁśabrāhmaṇa 7, 5, 6];[ Taittirīya āraṇyaka 5, 1];[ Taittirīya Saṁhitā, 4-9, 1].
2) In Purāṇic literature.
The above story is told in [Skanda Purāṇa] with slight modifications as follows:- Once Brahmā and other Devatās conducted a test as to which one amongst them was the greatest, and when it became evident tha tMahāviṣṇu was, in every respect, superior to all the others Brahmā cursed that Viṣṇu should lose his head. Viṣṇu, who got thus bereft of his head attended a yajña conducted by the Devas with the head of a horse attached to his trunk. After the yajña was over he went to dharmāraṇya and did tapas there and by the blessings of Śiva got back his former head instead of that of the horse.

Related Words

: Folder : Page : Word/Phrase : Person

Keyword Pages

: Folder : Page : Word/Phrase : Person

Related Pages

  |  
  |  
: Folder : Page : Word/Phrase : Person

Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.
TOP