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चतुरशीतितमदशकम्

दशमस्कन्धपरिच्छेदः - चतुरशीतितमदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


समन्तपञ्चकयात्रा-वर्णन

क्वचितदथ तपनोपरागकाले पुरि निदधत्कृतवर्मकामसूनू ।

यदुकुलमहिलावृतः सुतीर्थं समुपगतोऽसि समन्तपञ्चकाख्यम् ॥१॥

बहुतरजनताहिताय तत्र त्वमपि पुनन्विनिमज्ज्य तीर्थतोयम् ।

द्विजगणपरिमुक्तवित्तराशिः सममिलथाः कुरुपाण्डवादिमित्रैः ॥२॥

तव खलु दयिताजनैः समेता द्रुपदसुता त्वयि गाढभक्तिभारा ।

तदुदितभवदाहृतिप्रकारैरति मुमुदे सममन्यभामिनीभिः ॥३॥

तदनु च भगवन् निरीक्ष्य गोपानतिकुतुकादुपगम्य मानयित्वा ।

चिरतरविरहातुराङ्गरेखा ; पशुपवधूः सरसं त्वमन्वयासीः ॥४॥

सपदि च भवदीक्षणोत्सवेन प्रमुषितमानहृदां नितम्बिनीनाम् ।

अतिरसपरिमुक्तकञ्चुलीके परिचयहृद्यतरे कुचे न्यलैषीः ॥५॥

रिपुजनकलहैः पुनः पुनर्मे समुपगतैरियती विलम्बनाभूत् ।

इति कृतपरिरम्भणे त्वयि द्रागतिविवशा खलु राधिका निलिल्ये ॥६॥

अपगतविरहव्यथास्तदा ता रहसि विधाय ददाथ तत्त्वबोधम् ।

परमसुखचिदात्मकोऽहमात्मेत्युदयतु वः स्फुटमेव चेतसीति ॥७॥

सुखरसपरिमिश्रितो वियोगः किमपि पुराभवदुद्धवोपदेशैः ।

समभवदमुतः परं तु तासां परमसुखैक्यमयी भवद्विचिन्ता ॥८॥

मुनिवरनिवहैस्तवाथ पित्रा दुरितशमाय शुभानि पुच्छ्य़मानैः ।

त्वयि सति किमिदं शुभान्तरैरित्युरुहसितैरपि याजितस्तदासौ ॥९॥

सुमहति यजने वितायमाने प्रमुदितमित्रजने सहैव गोपाः ।

यदुजनमहितास्त्रिमासमात्रं भवदनुषङ्गरसं पुरेव भेजुः ॥१०॥

व्यपगमसमये समेत्य राधां दृढमुपगूह्य निरीक्ष्य वीतखेदाम् ।

प्रमुदितहृदयः पुरं प्रयातः पवनपुरेश्र्वर पाहि मां गदेभ्यः ॥११॥

॥ इति समन्तपञ्चकयात्रावर्णनं चतुरशीतितमदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

तदनन्तर किसी सूर्यग्रहणके अवसरपर कृतवर्मा और अनिरुद्धको द्वारकापुरीकी रक्षा करनेके लिये नियुक्त करके आप यदुकुलकी महिलाओंके साथ समन्तपञ्चक (कुरुक्षेत्र ) नामक उत्तम तीर्थमें गये ॥१॥

वहॉं अधिकांश लोगोंके हितके लिये आपने भी उस तीर्थजलको पवित्र करते हुए उसमें गोता लगाया और खुले हाथ ब्राह्मणोंको धनराशिका दान दिया । वहीं कुरु -पाण्डव आदि मित्रोंसे आपकी भेंट हो गयी ॥२॥

तब आपमें सुदृढ़ भक्तिभाव रखनेवाली द्रौपदी सुभद्रा आदि अन्य महिलाओंके साथ आकर आपकी रुक्मिणी आदि पटरानियोंसे मिली और जैसे -जैसे आपके उनका हरण किया था , उस -उस वृत्तान्तका उनके मुखसे सुनकर अतिशय

आनन्दित हुई ॥३॥

भगवन् ! तत्पश्र्चात् वहीं गोपोंको देखकर आप अत्यन्त उत्कण्ठित हो उन सबसे मिले और भलीभॉंति उनका सम्मान किया । पुनः आप स्नेहपूर्वक उन गोपाङ्गनाओंसे भी मिले , जिनके शरीर आपके चिरकालिक विरहसे दुबले

हो गये थे ॥४॥

आपके दर्शनका उत्सव पाकर तत्काल ही उन नितम्बिनी गोपियोंके हृदयका मान गल गया और अत्यन्त रसवशात् उनके स्तनोंपरसे चोली उतर गयी । तब आप उनके पूर्वपरिचित मनोहर स्तनोंमें निलीन हो गये — उनके आलिङ्गन -सुखका अनुभव किया ॥५॥

तदनन्तर ‘प्रिये ! बारंबार शत्रुओंके साथ युद्ध छिड़ जानेके कारण तुम्हारे पास मेरे आनेमें इतना विलम्ब हो गया । ’ इस प्रकार आपके सान्त्वनापूर्ण वचन आलिङ्गन करनेपर तुरंत ही अत्यन्त विवश हो आपके वक्षःस्थलमें लीन हो गयीं —— आपके साथ ऐक्य -सुखका अनुभव करने लगीं ॥६॥

उस समय एकान्तमें उन गोपियोंकी विरह -व्यथाको शान्त करके उन्हें तत्त्वज्ञान प्रदान करते हुए आप यों कहने लगे —— ‘प्यारी गोपियो ! तुमलोगोंके चित्तमें ऐसा ज्ञान स्पष्टरूपसे उदित होना चाहिये कि मैं परमानन्दबोधस्वरूप सबका आत्मा हूँ (अतः मेरे साथ तुमलोगोंका वियोग कभी होता ही नहीं )’ ॥७॥

पहले उद्धवके मुखसे किये गये उपदेशको सुनकर गोपियोंको विरह -दुःख कुछ आनन्दसे मिश्रित जान पड़ा था ; परंतु आपके इस उपदेशसे उन्हें आपसे वियोग होनेकी व्यथा परमानन्दरसैकरूपा प्रतीत हुई ॥८॥

तदनन्तर आपके पिता वसुदेवजीने वहॉं एकत्र मुनिवर -वृन्दसे पापशमनके लिये करने योग्य शुभकार्म पूछे । तब वे मुनिवर ‘आपके रहते हुए अन्य शुभकर्मोंकी क्या आवश्यकता है ?’—— यों कहकर ठहाका मारकर हँसने लगे । तथापि उस समय उन्होंने वसुदेवजीसे यज्ञका अनुष्ठान करवाया ॥९॥

जिस समय प्रमुदित मित्रजनोंसे परिपूर्ण वह महान् यज्ञ चल रहा था , उस समय सबके साथ गोपगण भी यादवोंसे पूजित हो तीन मासतक वहॉं ठहरकर पहलेकी ही तरह आपकेसंगम -सुखका आनन्द लेते रहे ॥१०॥

विदा होते समय आपने राधाके निकट जाकर उनका गाढ आलिङ्गन किया , जिससे उनकी विरह -व्यथा शान्त हो गयी । यह देखकर आपका हृदय आनन्दसे भर गया और आप द्वारकापुरीको चले गये । पवनपुरेश्र्वर ! रोगोंसे मेरी रक्षा कीजिये ॥११॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:52.0070000

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