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अष्टचत्वारिंशत्तमदशकम्

दशमस्कन्धपरिच्छेदः - अष्टचत्वारिंशत्तमदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


यमलार्जुन-उद्धार

मुदा सुरौघेस्त्वमुदारसम्मदैरुदीर्य दामोदर इत्यभिष्टुतः ।

मृदूदरः स्वैरमुलूखले लगन्नदूरतो द्वौ ककुभावुदैक्षथाः ॥१॥

कुबेरसूनुर्नलकूबराभिधः परो मणिग्रीव इति प्रथां गतः ।

महेशसेवाधिगताश्रियोन्मदौ चिरं किल त्वद्विमुखावखेलताम् ॥२॥

सुरापगायां किल तौ मदोत्कटौ सुरापगायद्बहुयौवतावृतौ ।

विवाससौ केलिपरौ स नारदो भवत्पदैकप्रवणो निरैक्षत ॥३॥

भिया प्रियालोकमुपात्तवाससं पुरो निरीक्ष्यापि मदान्धचेतसौ ।

इमौ भवद्भक्त्युपशान्तिसिद्धये मुनिर्जगौ शान्तिमृते कुतः सुखम् ॥४॥

युवामवाप्तौ ककुभात्मतां चिरं हरिं निरीक्ष्याथ पदं स्वमाप्नुतम् ।

इतीरितौ तौ भवदीक्षणस्पृहां गतौ व्रजान्ते ककुभौ बभूवतुः ॥५॥

अतन्द्रमिन्द्रद्रुयुगं तथाविधं समेयुषा मन्थरगामिना त्वया ।

तिरायितोलूखलरोधनिर्धुतौ चिराय जीर्णो परिपातितौ तरू ॥६॥

अभाजि खाखिद्वितयं यदा त्वया तदैव तद्रर्भतलान्निरेयुषा ।

महात्विषा यक्षयुगेन तत्क्षणादभाजि गोविन्द भवानपि स्तवैः ॥७॥

इहान्यभक्तोऽपि समेष्यति क्रमाद् भवन्तमेतौ खलु रुद्रसेवकौ ।

मुनिप्रसादाद्भवदङ्घ्रिमागतौ गतौ वृणानौ खलु भक्तिमुत्तमाम् ॥८॥

ततस्तरूद्दारणदारुणारवप्रकम्पिसम्पातिनि गोपमण्डले ।

विलज्जितत्वज्जननीमुखेक्षिणा व्यमोक्षि नन्देन भवान्विमोक्षदः ॥९॥

महीरुहोर्मध्यगतो बतार्भको हरेः प्रभावादपरिक्षतोऽधुना ।

इति ब्रुवाणैर्गमितो गृहं भवान् मरुत्पुराधीश्र्वर पाहि मां गदात् ॥१०॥

॥ इति यमलार्जुनभञ्चनमष्टचत्वारिंशत्तमदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

तदनन्तर अतिशय संतुष्ट हुए देवगण हर्षपूर्वक आपका ‘दामोदर ’ नामसे स्तवन करके अपने -अपने स्थानको चले गये । इधर सुखपूर्वक ओखलीमें बँधे हुए कोमल उदरवाले आपने ही स्थित दो अर्जुन -वृक्षोंको देखा ॥१॥

कुबेरका पुत्र जिसका नाम नलकूबर था और दूसरा मणिग्रीव नामसे प्रसिद्ध था - ये दोनों शंकरजीकी उपासनासे प्राप्त हुई लक्ष्मीके मदसे उन्मत्त होकर चिरकालतक आपसे विमुख हो क्रीड़ा -विलासमें संलग्न रहे ॥२॥

एक बार वे दोनों मदोन्मत्त होकर गङ्गाजीमें विहार कर रहे थे । उस समय उनके शरीरपर वस्त्र नहीं थे और वे सुरापान करके गाती हुई बहुत -सी युवतियोंसे घिरे हुए थे । इसी अवस्थामें उनको एकमात्र आपको ही चरणोंमें दत्तचित्त रहनेवाले नारद -मुनिने देख लिया ॥३॥

नारदजीको देखकर युवतियोंने शापभयसे डरकर तुरंत ही अपना -अपना वस्त्र धारण कर लिया ; परंतु इन दोनोंका चित्त तो मदसे अंधा हो गया था , अतः मुनिको सामने देखकर भी इन्होंने अपने कपड़े नही पहने । तब नारदमुनिने भवद्भक्ति तथा उपशान्तिकी सिद्धिके लिये उन्हें शाप दे दिया ; क्योंकि शान्तिके बिना सुख कहॉं ॥४॥

‘ तुम दोनों चिरकालके लिये अर्जुन - वृक्षका रूप धारण करो । तत्पश्र्चात् श्रीकृष्णका दर्शन करके मुक्त हो पुनः अपने स्थानको प्राप्त करोगे । ’ यों नारदद्वारा शापित हुए वे दोनों आपके दर्शनकी स्पृहासे व्रजमें जाकर यमलार्जुनके रूपमें उत्पन्न हुए ॥५॥

ऐसे यमलार्जुन -वृक्षोंके निकट आप उत्साहपूर्वक धीरे -धीरे ओखलीको खींचते हुए जा पहुँचे । ओखली तिरछी होकर दोनों वृक्षोंके मध्यमें जा फँसी । तब उसे वेगपूर्वक खींचनेसे आपने बहुत दिनोंके पुराने उन दोनों वृक्षोंको जड़सहित उखाड़कर धराशायी कर दिया ॥६॥

गोविन्द ! जब आपने उन दोनों वृक्षोंको उखाड़ दिया , तब उन वृक्षोंके मध्यभागसे दो महान् कान्तिमान् यक्ष प्रकट हुए । वे उसी क्षण स्तुतियोंद्वारा आपका स्तवन करने लगे ॥७॥

भगवन् ! इससे आपने निश्र्चित कर दिया कि जगत्में ब्रह्मा -शिव आदि अन्य देवोंके भक्त भी अधिकार -क्रमसे आपके भजनाधिकारी होते हैं ; क्योंकि ये दोनों नलकूबर और मणिग्रीव रुद्रके सेवक थे । ये नारदमुनिकी कृपासे आपकी चरण -शरणमें आये और उत्तम भक्तिका वरदान प्राप्त करके पुनः अपने स्थानको चले गये ॥८॥

तदनन्तर उन वृक्षोंके उखड़नेसे उत्पन्न हुए भयंकर शब्दके सुननेसे सम्भ्रान्त हुए झुंड -के -झुंड गोप वहॉं आ पहुँचे । तब आपको बॉंधनेके कारण जो विशेषरूपसे लजायी हुई थीं , उन आपकी माता यशोदाके मुखकी ओर देखते हुए नन्द बाबाने मुक्तिदाता आपको बन्धनसे मुक्त कर दिया ॥९॥

तब नन्दादि गोप ‘अहो ! कैसा आश्र्चर्य है ! इस समय यह बालक दोनां वृक्षोंके बीचमें पड़ गया था , परंतु इसे कोई चोट नहीं लगी —— यह श्रीहरिकी ही कृपा है । ’ यों कहते हुए आपको घर ले गये । मरुत्पुराधीश्र्वर ! रोगसे मेरी रक्षा कीजिये ॥१०॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:50.1000000

Comments | अभिप्राय

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री

  • स्त्री. 
    1. गायनांतील स्वरसप्तकांपैकी दुसरा स्वर . 
    2. मुख्य गायकाचे गायन चालले असतां त्याचा हस्तक किंवा साथीदार त्याच्या मागोमाग त्याचेच सूर म्हणत जातो ते . ( क्रि० नेणे ; धरणे ; ओडणे ). [ ध्व . ] 
     
  • ०ओढणे 
    1. दुसर्‍याच्या सुरांत सूर मिळविणे .
    2. दुसर्‍याच्या म्हणण्यासारखेच म्हणणे ; पुनरुच्चार करणे .
     
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