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अष्टात्रिंशत्तमदशकम्

दशमस्कन्धपरिच्छेदः - अष्टात्रिंशत्तमदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


श्रीकृष्णका गोकुल-गमन

आनन्दरूप भगवन्नयि तेऽवतारे

प्राप्ते प्रदीप्तभवङ्गनिरीयमाणैः ।

कान्तिव्रजैरिव घनाघनमण्डलैर्द्या -

मावृण्वती विरुरुचे किल वर्षवेला ॥१॥

आशासु शीतलतरासु पयोदतोयै -

राशासिताप्तिविवशेषु च सज्जनेषु ।

नैशाकरोदयविधौ निशि मध्यमायां

क्लेशापहस्त्रिजगतां त्वमिहाविरासीः ॥२॥

बाल्यस्पृशापि वपुषा दधुषा विभूति -

रुद्यक्तिरीटकटकाङ्गदहारभासा ।

शङ्खारिवारिजगदापरिभासितेन

मेघासितेन परिलेसिथ सूतिगेहे ॥३॥

वक्षःस्थलीसुखनिलीनविलासिलक्ष्मी -

मन्दाक्षलक्षितकटाक्षविमोक्षभेदैः ।

तन्मन्दिरस्य खलकंसकृतामलक्ष्मी -

मुन्मार्जयन्निव विरेजिथ वासुदेव ॥४॥

शौरिस्तु धीरमुनिमण्डलचेतसोऽपि

दूरस्थितं वपुरुदीक्ष्य निजेक्षणाभ्याम् ।

आनन्दबाष्पपुलकोद्रमगद्रदादर्‌र -

स्तुष्टाव दृष्टिमकरन्दरसं भवन्तम् ॥५॥

देव प्रसीद परपूरुष तापवल्ली -

निर्लूनदात्र समनेत्र कलाविलासिन् ।

खेदानपाकुरु कृपागुरुभिः कटाक्षै -

रित्यादि तेन मुदितेन चिरं नुतोऽभूः ॥६॥

मात्रा च नेत्रसलिलास्तृगात्रवल्या

स्तोत्रैरभिष्टुतगुणः करुणालयस्त्वम् ।

प्राचीनजन्मयुगलं प्रतिबोध्य ताभ्यां

मातुर्गिरा दधिथ मानुषबालवेषम् ॥७॥

त्वत्प्रेरितस्तदनु नन्दतनूजया ते

व्यत्यासमारचयितुं स हि शूरसूनुः ।

त्वां हस्तयोरधित चित्तविधार्यमार्ये -

रम्भोरुहस्थकलहंसकिशोररम्यम् ॥८॥

जाता तदा पशुपसद्मनि योगनिद्रा

निद्राविमुद्रितमथाकृत पौरलोकम् ।

त्वत्प्रेरणात् किमिव चित्रमचेतनैर्यद्

द्वारैः स्वयं व्यघटि संघटितैः सुगाढम् ॥९॥

शेषेण भूरिफणवारितवारिणाथ

स्वैरं प्रदर्शितपथो मणिदीपितेन ।

त्वां धारयन् स खलु धन्यतमः प्रतस्थे

सोऽयं त्वमीश मम नाशय रोगवेगान् ॥१०॥

॥ इति श्रीकृष्णावतारवर्णनम् अष्टात्रिशत्तमदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

अयि आनन्दस्वरूप भगवन् ! आपके जन्म लेते समय वर्षा -ऋतु आपके प्रकाशोज्जवल श्रीविग्रहसे बाहर फैलते हुए कान्ति -पुञ्चकी भॉंति घनघोर बादलोंसे आकाशको आच्छादित करती हुई विशेष शोभा पा रही थी ॥१॥

उस समय मेघ -जलसे सभी दिशाएँ अत्यन्त शीतल हो गयी थीं और सत्पुरुष -समुदाय अभीष्टार्थकी प्राप्तिसे आनन्दविभोर था । तब अर्धरात्रिके समय चन्द्रोदयकी भॉंति त्रिलोकीके कष्टहर्ता आप इस भूतलपर प्रकट हुए ॥२॥

उस समय बाल्यभावका स्पर्श करते हुए भी जिसने ईश्वरत्वद्योतक विभूतियॉं धारण कर रखी थीं , जिससे प्रकाशमान किरीट , कटक , बाजूबंद और हारकी प्रभा छिटक रही थी , जो अपनी चारों भुजाओंमें शङ्ख , चक्र , कमल और गदा धारण करनेसे उद्दीप्त हो रहा था तथा जिसकी कान्ति सजल जलधरके समान श्याम थी , अपने उस श्रीविग्रहसे आप सूतिकागृहमें शोभा पाने लगे ॥३॥

वासुदेव ! अपने वक्षःस्थलपर सुखपूर्वक निवास करनेवाली विलासवती लक्ष्मीके लज्जापूर्वक लक्षित होनेवाले विभिन्न प्रकारके कटाक्ष -पातोंसे उस भवनकीं दुष्ट कंसद्वारा उत्पन्न की हुई अलक्ष्मी (शोभाहीनता )-का उन्मार्जन करते हुए -से आप विशेष रूपसे सुशोभित हो रहे थे ॥४॥

उस समय धीर —— साधनचतुष्टयसम्पन्न मुनिमण्डलीके चित्तसे भी दूर रहनेवाले अर्थात् ध्यानमें न आनेवाले आपके श्रीविग्रहको अपने नेत्रोंद्वारा अवलोकन करके वसुदेवजीके नेत्रोंमें आनन्दाश्रु छलक आये , उनका शरीर पुलकित हो उठा और उनकी वाणी हर्षगद्रद हो गयी । तब वे नेत्रोंके लिये मकरन्दरसस्वरूप आपकी स्तुति करने लगे — ॥५॥

‘ देव ! प्रसन्न होइये । परम पुरुष ! आप ताप - वाल्लीका मूलोच्छेदन करनेके लिये अतिशय तीक्ष्ण शस्त्ररूप हैं , सभी प्राणियोंको समान दृष्टिसे देखनेवाले तथा अपनी अंशभूता मायाद्वारा क्रीड़ा करनेवाले हैं । अपने कृपा - परिपूर्ण कटाक्षोंद्वारा मेरे कष्टोंको दूर कर दीजिये । ’ इस प्रकार वसुदेवजी हर्षोल्लसित होकर चिरकालतक आपके स्तवनमें लगे रहे ॥६॥

माता देवकी , जिनका लता -सदृश दुबला -पतला शरीर नेत्रोंसे बहते हुए आँसुओंद्वारा भीग रहा था , स्तोत्रोंद्वारा आपका गुणगान कर रही थीं । तब आप दयानिधिने अपने दो प्राचीन (पृश्नि -सुतपाद्वारा पृश्निगर्भ तथा अदिति -कश्यपद्वारा वामन नामक ) अवतारोंकी बातें बताकर उन्हें समझाया और माताके कहनेसे मानव -बाल -रूप धारण कर लिया ॥७॥

तत्पश्र्चात् नन्द -तनयाके साथ्ज्ञ अपना व्यत्यास (अदला -बदली — ‘मुझे यशोदाके पास पहुँचा दो और उनकी पुत्री मेरी माताके पास ला दो ’-इस आज्ञाका पालन ) करनेके लिये आपद्वारा प्रेरित किये जानेपर शूर -कुमार वसुदेवजीने मुनियोंद्वारा चित्तसे धारण करने योग्य आपको दोनों हाथोंसे उठाया । उस समय कमलपर बैठे हुए कलहंस -किशोरके समान आपकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥८॥

आपके प्रस्थान करते समय भगवती योगनिद्राने नन्दगोपके घरमें जन्म लिया । उसने आपकी प्रेरणासे पुरवासियोंको निद्रित करके निश्र्चेष्ट कर दिया । फिर तो जो सुदृढ़ रूपसे बंद किय गये थे वे अचेतन दरवाजे स्वयं खुल गये , यह कैसी आश्र्चर्यकी बात है ? ॥९॥

तदनन्तर नागराज शेष अपने हजारों फणोंसे वर्षाकी बूँदोंका निवारण करते हुए फणस्थित मणियोंके प्रकाशसे स्वच्छन्दतापूर्वक मार्गदर्शन कर रहे थे । इस प्रकार वे धन्यातिधन्य वसुदेवजी आपको सिरपर धारण करके प्रस्थित हुए । हे ईश ! वही आप मेरे रोगोंके वेगको नष्ट कर दीजिये ॥१०॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:49.6000000

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