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चतुश्र्चत्वारिंशत्तमदशकम्

दशमस्कन्धपरिच्छेदः - चतुश्र्चत्वारिंशत्तमदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


श्रीकृष्णके जातकर्म आदि संस्कारका वर्णन

गूढं वसुदेवगिरा कर्तुं ते निष्क्रियस्य संस्कारान् ।

हृद्गतहोरातत्त्वो गर्गमुनिस्त्वद्गृहं विभो गतवान् ॥१॥

नन्दोऽथ नन्दितात्मा वृन्दिष्ठं मानयन्नमुं यमिनाम् ।

मन्दस्मितार्दमूचे त्वत्संस्कारान् विधातुमुत्सुकधीः ॥२॥

यदुवंशाचार्यत्वात् सुनिभृतमिदमार्य कार्यमिति कथयन् ।

गर्गो निर्गतपुलकश्र्चके तव साग्रजस्य नामानि ॥३॥

कथमस्य नाम कुर्वे सहस्त्रनाम्नो ह्यनन्तनाम्नो वा ।

इति नूनं गर्गमुनिश्र्चके तव नाम नाम रहसि विभो ॥४॥

कृषिधातुणकाराभ्यां सत्तानन्दात्मतां किलाभिलपत् ।

जगदघकर्षित्वं वाऽककथयदृषिः कृष्णनाम ते व्यतनोत् ॥५॥

अन्यांश्र्च नामभेदान् व्याकुर्वन्नग्रजे च रामादीन् ।

अतिमानुषानुभावं न्यगदत्त्वामप्रकाशयन् पित्रे ॥६॥

स्निह्यति यस्तव पुत्रे मुह्यति स न मायिकैः पुनः शोकैः ।

द्रुह्यति यः स तु नश्येदित्यवदत्ते महत्त्वमृषिवर्यः ॥७॥

जेष्यति बहुतरदैत्यान् नेष्यति निजबन्धुलोकममलपदम् ।

श्रोष्यति सुविमलकीर्तीरस्योति भवद्विभूतिमृषिरूचे ॥८॥

अमुनैव सर्वदुर्गं तरितास्थ कृतास्थमत्र तिष्ठध्वम् ।

हरिरेवेत्यनभिलपन्नित्यादि त्वामवर्णयत् स मुनिः ॥९॥

गर्गेऽथ निर्गतेऽस्मिन् नन्दितनन्दादिनन्द्यमानस्त्वम् ।

मद्रदमुद्रतकरुणो निर्गमय श्रीमरुत्पुराधीश ॥१०॥

॥इति नामकरणवर्णनं चतुश्र्चत्वारिंशत्तमदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

विभो ! जिन्हें ज्योतिष शास्त्रका यथार्थ तत्त्व सम्यक् प्रकारसे विदित थो , वे मुनि गर्गाचार्य वसुदेवजीके कहनेसे गुप्तरूपसे आप निष्क्रियका नामकरणादि संस्कार करनेके लिये आपके घरपर पधारे ॥१॥

उन्हें देखकर नन्दजीका हृदय आह्लादित हो उठा । उन्होंने संयमशीलोंमे देवतुल्य वन्दनीय गर्गमुनिका यथाविधि आदर -सत्कार किया । तदनन्तर उत्सुकचित्त होकर मन्द मुसकराहटसे आर्द्र वाणीमें उन्होंने मुनिसे आपके संस्कार करनेके लिये कहा ॥२॥

तब गर्गाचार्यजीने यों उत्तर दिया ——‘आर्य ! मैं यदुवंशका आचार्य हूँ , अतः यह कार्य अत्यन्त गुप्तरूपसे सम्पन्न होना चाहिये । (क्योंकि मेरे संस्कार करनेसे कहीं कंसको शङ्का न हो जाय कि यह यदुकुमार है । )’ तदनन्तर आपके स्पर्शसे पुलकित शरीरवाले गर्गमुनि अग्रजसहित आपका नामकरण करनेको उद्यत हुए ॥३॥

उस समय मुनि ‘भला , जिसके हजारों अथवा अनन्त नाम हैं , उसका नामकरण मैं कैसे करूँ ?’ निश्र्चय ही इस विचारमें डूब गये । विभो !तत्पश्र्चात् एकान्तमें गर्गाचार्यने आपका नामकरण किया ॥४॥

ऋषिने कृषिधातु और णकारसे , जो क्रमशः सत्ता और आनन्दके वाचक हैं , आपकी सत्तानन्दस्वरूपता बतायी अथवा जगत्के पापका कर्षण करना —— यह आपका स्वभाव बताया और इसी तात्पर्यसे आपका नाम ‘कृष्ण ’ रख दिया ॥५॥

पुनः आपके अन्य विभिन्न नामोंकी व्याख्या करते हुए उन्होंने आपके अग्रजका ‘राम ’ आदि नाम रखा । तदनन्तर आपको (विष्णु हैं ——यों ) प्रकट न करते हुए उन्होंने नन्दाबाबासे आपका प्रभाव अलौकिक बताया ॥६॥

‘ जो आपके पुत्रसे स्नेह करेगा अर्थात् कृष्णभक्त होगा , वह पुनः मायिक शोकोंसे मोहित नहीं होगा —— उसे जनन - मरणादिके दुःखका अनुभव नहीं करना पड़ेगा । किंतु जो आपके पुत्रसे द्रोह करेगा अर्थात् कृष्णविमुख होगा , वह नष्ट हो जायगा । ’ इस प्रकार उन ऋषिश्रेष्ठने आपके महत्त्वका वर्णन किया ॥७॥

‘ यह बहुत - से दैत्योंको जी लेगा , अपने बन्धुसमुदायको अमल पदकी प्राप्ति करायेगा और अपनी अत्यन्त निर्मल कीर्तिका श्रवण करेगा। ’—— यों ऋषिने आपके ऐश्र्वर्यका कथन किया ॥८॥

‘ इसी पुत्रके द्वारा तुमलोग समस्त संकटोंसे पार हो जाओगे , अतः इस पुत्रमें तुमलोग आस्था बनाये रहो । ’ इस प्रकार ‘ ये विष्णु है ’ इतना ही मात्र न कहकर आपके कृष्णावतारके शेष कर्मोंका गर्गमुनिने वर्णन कर दिया ॥९॥

यों कार्य सम्पन्न करके गर्गमुनि वहॉंसे चले गये । तदनन्तर आनन्दित हुए नन्द आदि गोप बड़े लाड़ -प्यारसे आपका लालन -पालन करने लगे । श्रीमरुत्पुराधीश ! आप मुझपर कृपा करके मेरे रोगोंका निराकरण कर दीजिये ॥१०॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:49.8970000

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