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सप्तपञ्चाशत्तमदशकम्

दशमस्कन्धपरिच्छेदः - सप्तपञ्चाशत्तमदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


प्रलम्बासुरका वध

रामसखः क्वापि दिने कामद भगवन् गतो भवान् विपिनम् ।

सूनुभिरपि गोपानां धेनुभिरभिसंवृतो लसद्वेषः ॥१॥

सन्दर्शयन् बलाय स्वैर वृन्दावनश्रियं विमलाम् ।

काण्डीरैः यह बालैर्भाण्डीरकमागतो वटं क्रीडन् ॥२॥

तावत्तावकनिधनस्पृहयालुर्गोपमूर्तिरदयालुः ।

दैत्यः प्रलम्बनामा प्रलम्बबाहुर्भवन्तमापेदे ॥३॥

जानन्नप्यविजानन्निव तेन समं निबद्धसौहार्दः ।

वटनिकटे पटुपशुपव्याबद्धं द्वन्द्वयुद्धमारब्धाः ॥४॥

गोपान् विभज्य तन्वन् सङ्घं बलभद्रकं भवत्कमपि ।

त्वद्बलगतमन्वमन्यथा भगवन् ॥५॥

कल्पिताविजेतृवहने समरे परयूथगं स्वदयिततरम् ।

श्रीदामानमधत्थाः पराजितो भक्तदासतां प्रथयन् ॥६॥

एवं बहुषु विभूमन् बालेषु वहत्सु वाह्यमानेषु ।

रामविजितः प्रलम्बो जहार तं दूरतो भवद्भीत्या ॥७॥

त्वद्दूरं गमयन्त तं दष्ट्वा हलिनि विहितगरिमभरे ।

दैत्यः स्वरूपमागाद्यद्रूपात् सहि बलोऽपि चकितोऽभूत् ॥८॥

उच्चतया दैत्यतनोस्त्वन्मुखमालोक्य दूरतो रामः ।

विगतभयो दृढमुष्ट्या भृशदृष्टं सपदि पिष्टवानेनम् ॥९॥

हत्वा दानववीरं प्राप्तं बलमालिलिङ्गिथ प्रेम्णा ।

तावन्मिलतोर्युवयोः शिरसि कृता पुष्पवृष्टिमरगणैः ॥१०॥

आलम्बो भुवनानां प्रालम्बं निधनमेवमारचयन् ।

कालं विहाय सद्यो लोलम्बरुचे हरे हरेः क्लेशान् ॥११॥

॥ इति प्रलम्बासुरवधवर्णनं समप्तपञ्चाशत्तमदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

अभीष्टदाता भगवन् ! एक दिन सुसज्जित वेषमें बलरामजीके साथ ग्वालबालों तथा गौओंसे घिरे हुए आप वनको गये ॥१॥

वहॉं बलरामजीको वृन्दावनकी निर्मल शोभा दिखाते हुए दण्डधारी बालकोंके साथ स्वच्छन्दातापूर्वक क्रीडा करते हुए भाण्डीर -वटके निकट आये ॥२॥

तबतक लंबी भुजाओंवाला प्रलम्ब नामक दैत्य , जो बड़ा ही क्रूर था , आपको मार डालनेकी इच्छासे गोपवेष धारण करके आपके पास आया ॥३॥

‘ यह राक्षस है ’—— यों जानते हुए भी आपने अनजानकी तरह उसके साथ मित्रता कर ली । तब उस वटके निकट द्वन्द्वयुद्धकुशल दो - दो गोपोंमें निश्र्चित परस्पर द्वन्द्वयुद्ध प्रारम्भ करवाया ॥४॥

उस समय आपने गोपोंको दो दलोंमें बॉंट दिया । एक दलके नायक बलरामजी तथा दूसरे दलके नायक आप हुए । भगवन् ! प्रलम्बासुर पहलेसे ही आपके बलसे डरा हुआ था , अतः उसने आपके ही दलमें सम्मिलित होना चाहा , तब आपने उसे स्वीकृति दे दी ॥५॥

उस युद्धमें यह शर्त रखी गयी कि पराजित दल विजेता दलको अपनी पीठपर चढ़ाकर नियत स्थानतक ले चलेगा । तब पराजित हुए आप अपनी भक्त -पराधीनताको प्रकट करते हुए अपने अतिशय प्रेमी श्रीदामाको पीठपर चढ़ाकर ले चले ॥६॥

विभून् ! इस प्रकार बहुत -से बालक परस्पर एक दूसरेको वहन करते तथा वहन किये जा रहे थे । उसी बीचमें बलरामसे पराजित हुआ प्रलम्बासुर उन्हें पीठपर चढ़ाकर आपके भयसे नियत स्थानसे दूर जाकर ले भागा ॥७॥

आपके पाससे दूर ले जाते हुए उस -दैत्यको देखकर बलरामजीने अपने शरीरके बोझको भारी कर दिया , जिसे वहन करनेमें असमर्थ होनेके कारण प्रलम्बासुर अपने असली स्वरूपमें प्रकट हो गया । उसके रूपको देखकर बलरामजी भी चकित हो गये ॥८॥

उस दैत्यके शरीरके ऊपरी भाग अर्थात् कंधेपर बैठे हुए बलरामजी दूरसे ही आपके मुखको देखकर निर्भय हो गये । तब उन्होंने तुरंत ही अपने सुदृढ़ मुक्केके प्रहारसे अतिशय दृष्ट प्रलम्बासुरके मस्तकको चूरचूर कर दिया ॥९॥

इस प्रकार उस दानववीर प्रलम्बका संहा करके लौटे हुए बलरामजीका आपने प्रेमपूर्वक आलिङ्गन किया । उस समय परस्पर मिलते हुए आप दोनोंके मस्तकपर देवगण पुष्पवर्षा करने लगे ॥१०॥

भुवनोंके आश्रयभूत आपने अस प्रकार प्रलम्बासुरका निधन कराया । लोलम्बरुचे ! हरे ! विलम्ब न करके शीध्र ही मेरे क्लेशोंको हर लीजिये ॥११॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:50.5530000

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