देवशोधन नाम - ॥ समास दसवां - अनिर्वाच्यनाम ॥

श्रीसमर्थ ने ऐसा यह अद्वितीय-अमूल्य ग्रंथ लिखकर अखिल मानव जाति के लिये संदेश दिया है ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
समाधान पूछने पर कुछ तो सही । कहत बोलने जैसा वह नहीं । फिर वह कैसा है सर्व ही । निरूपित कीजिये ॥१॥
गूंगे ने गुड़ खाया । मिठास न बताना आया । इसका अभिप्राय है क्या । मुझे निरूपण कीजिये ॥२॥
अनुभव ही पूछने जायें । कहते कहना न आये । अब किसे पूछने जायें । समाधान ॥३॥
हर कोई अगम्य कहता । यह मेरे प्रचीति में ना आता । विचार मेरे चित्त में बैठे । ऐसा करें ॥४॥
ऐसे श्रोता का उत्तर । इसका कैसा प्रत्युत्तर । किया निरूपित तत्पर । होकर सुनो ॥५॥
जो समाधान के स्थल । अथवा जो अनुभव ही केवल । वह स्वरूप प्रांजल । बोलकर दिखाऊं ॥६॥
बोलों से आकलन होये ना । बोले बिना समझेना । जिसे कल्पित करते कल्पना । अयशस्वी होती ॥७॥
वह जानिये परब्रह्म । जो वेदों का गुह्य परम । करते ही संत समागम । सभी कुछ समझे ॥८॥
वही अब किया जाता कथन । जिससे समाधान गहन । सुन अनुभव के वचन । अनिर्वाच्य वस्तु ॥९॥
कह न पाये वह कहना । मिठास जानने को गुड़ देना । ऐसा यह सद्गुरू बिना । होगा नहीं ॥१०॥
सद्गुरू कृपा समझे उसे । जो स्वयं को खोजे । आगे समझे अनुभव से । अपने आप वस्तु ॥११॥
दृढ करके बुद्धि । पहले लें आत्मशुद्धि । उससे लगे समाधि । अकस्मात् ॥१२॥
मूल अपना जो सही खोजता । अपनी तो मायिक वार्ता । आगे वस्तु ही तत्त्वता । समाधान ॥१३॥
आत्मा सर्वसाक्षी है । यह बोला पूर्वपक्ष में । जो कोई सिद्धांत पर लक्ष्य करे । वही सिद्ध ॥१४॥
सिद्धांत वस्तु लक्ष्य करें । सर्वसाक्षिणी वह अवस्था है । आत्मा उससे भी पहले । अवस्थातीत ॥१५॥
पदार्थज्ञान जब निरसे । द्रष्टा द्रष्टापन से न बचे । उस समय गर्व उतरे । मैंपन का ॥१६॥
जहां मैंपन हो जीर्ण । वही अनुभव के चिन्ह । अनिर्वाच्य समाधान । इस कारण कहा गया ॥१७॥
अत्यंत विचार के बोल । फिर भी वे मायिक खोखल । शब्द सबाह्य सखोल । अर्थ ही संपूर्ण ॥१८॥
शब्द के कारण समझे अर्थ । अर्थ देखें तो शब्द व्यर्थ । शब्द कहे वह यथार्थ । मगर स्वयं वह मिथ्या ॥१९॥
शब्द के कारण वस्तु भासे । वस्तु देखने पर शब्द नासे । शब्द खोखला अर्थ रहे । सघन रूप से ॥२०॥
भूस के कारण धान्य उपजे । धान्य लेकर भूस त्यागें । वैसे ही शब्द भूस जानें । अर्थ धान्य ॥२१॥
पोले में सघन । सघन से उडे पोला । वैसे शब्द जानें खोखला । परब्रह्म में ॥२२॥
शब्द बोलकर रह जाये । अर्थ शब्द के पहले ही है । इस कारण शोभा न दे । उपमा उस अर्थ को ॥२३॥
भूस त्यागकर दाना लें । वैसे ही वाच्यांश त्यागें । दाना लक्ष्यांश पर लक्ष्य करें । शुद्ध स्वानुभव से ॥२४॥
दृश्य से अलग कहिये । वह वाच्यांश कहलाये । उसका अर्थ वह जानिये । शुद्ध लक्ष्यांश ॥२५॥
ऐसा जो शुद्ध लक्ष्यांश । वही जानिये पूर्वपक्ष । स्वानुभव वह अलक्ष्य । लक्ष्य में न आये ॥२६॥
जहां छानकर नभ त्यागा । जो सार है अनुभव का । ऐसा वह भी खड़ा । कल्पित किया ॥२७॥
मिथ्या बना कल्पना से । सच्चाई उसमें होगी कहां से । वहां अनुभव को इस कारण से । ठांव ही नहीं ॥२८॥
दूजे बिन अनुभव । यह बोलना ही मिथ्या । इस कारण नहीं ठाव । अनुभव को ॥२९॥
अनुभव से त्रिपुटी उपजे । अद्वैत में द्वैत ही लाजे । इस कारण बोलना सजे । अनिर्वाच्य ॥३०॥
दिवसरजनी के परिमित्य । करने के लिये मूल आदित्य । उस आदित्य के जाने पर उर्वरित । को कहें भी क्या ॥३१॥
शब्दमौन्य का विचार । होने के लिये मूल ओंकार । उस ओंकार के जाने पर उच्चार । कैसे करें ॥३२॥
अनुभव और अनुभवभोक्ता । माया के कारण ही सब होता । वह माया ही न होती मूलतः । उसे क्या कहें ॥३३॥
वस्तु एक स्वयं एक । ऐसे रहते अगर पृथक । फिर अनुभव का विवेक । बोलने पर सुख होता ॥३४॥
भिन्नत्व की माता । वह मिथ्या बांझ की सूता । इस कारण अभिन्नता । मूलतः ही है ॥३५॥
अजन्मा निद्रा में था । उसने स्वप्न में स्वप्न देखा । सद्गुरू के शरण में गया । संसार दुःख से ॥३६॥
सद्गुरूकृपा के कारण । हुआ संसार मिथ्था । ज्ञान होने पर ठांव । मिटे अज्ञान का ॥३७॥
जो है वह नहीं हुआ । नहीं नहीं पन में मिल गया । है नहीं जाकर बच गया । न रहा था जो कभी ॥३८॥
शून्यत्वातीत शुद्ध ज्ञान । उससे हुआ समाधान । ऐक्यरूप में अभिन्न । सहजस्थिति ॥३९॥
अद्वैत निरूपण होते ही । डूबी वार्ता द्वैत की । ज्ञानचर्चा बोलते ही । जागृति आई ॥४०॥
श्रोता हों सावधान । अर्थ में लगायें मन । संकेत पाते ही समाधान । अंतरंग में समझे ॥४१॥
उसने जितना ज्ञान कहा । उतना स्वप्न की तरह गया । अनिर्वाच्य सुख बचा रहा । शब्दातीत ॥४२॥
शब्दों के बिन ऐक्यता । अनुभव ना अनुभव भोक्ता । ऐसे शांत वह पुनः । जागृति में आया ॥४३॥
उसने स्वप्न में स्वप्न देखा। जागकर जागृति में आया। वहां शब्द कुंठित हुआ । अंत न लगे ॥४४॥
इस निरूपण का मूल । किया वही करूं प्रांजल । जिससे अंतरंग में शांत निर्मल । समाधान समझे ॥४५॥
तब शिष्य ने किया निवेदन । जो अभी दिया निरूपण । उसका चाहिये करना कथन । पुनः स्वामी ॥४६॥
मुझे समझे इस कारण । किया वही पुनः कीजिये निरूपण । यहां के जो निजचिन्ह । वे मुझे निरूपित करें ॥४७॥
कहिये अजन्मा वह कौन । उसने देखा कैसा स्वप्न । वहां कैसा निरूपण । कहा गया है ॥४८॥
जानकर शिष्य का आदर । स्वामी देते प्रत्युत्तर । वही अब अति तत्पर । श्रोता यहां परिशीलन करें ॥४९॥
सुन शिष्य सावधान । अजन्मा वह तू ही है जान । तूने देखा स्वप्न में स्वप्न । वह भी अब कहता हूं ॥५०॥
स्वप्न में स्वप्न का विचार । सो तू जान यह संसार । यहां तूने सारासार । विचार किया ॥५१॥
जाकर सद्गुरू के शरण । निकालकर शुद्ध निरूपण । इसके किये न्यून चिन्ह । प्रत्यक्ष अब ॥५२॥
इसका ही लेने पर अनुभव । बोलना सारा होता व्यर्थ । शांत विश्रांति का ठांव । सो तू जान जागृति ॥५३॥
ज्ञानचर्चा का शोर । मिटकर हुआ प्रकट अर्थ । इसका विचार देखने पर । आया पुनः जागृति में ॥५४॥
तुझे यह लगे जागृति । मुझे हुई अनुभव प्राप्ति । इसका नाम केवल भ्रांति । मिटी ही नहीं ॥५५॥
अनुभव अनुभवी में विलय हुआ । अनुभव बिन अनुभव आया । यह भी स्वप्न से जागृति में आया । नहीं रे बापा ॥५६॥
जागने पर स्वप्न ऊर्मी । स्वप्न में कहे अजन्मा वह मैं ही । जागृति में स्वप्नऊर्मी । गई ही नहीं ॥५७॥
स्वप्न में लगता जागापन । वैसे ही अनुभव के चिन्ह । मिले मगर वह सत्य स्वप्न । भ्रमरूप ॥५८॥
जागृति पार इसके । कब होगा बोलना ऐसे । जहां धारणा ही टूटे । विवेक की ॥५९॥
इस कारण वह समाधान । बोलता ही न बने ऐसे जान । निशब्द के ऐसे चिन्ह । पहचानो ॥६०॥
ऐसा है समाधान । बोल ही न पाते जान । इससे ही दृढ हुआ चिन्ह । निशब्द का ॥६१॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे अनिर्वाच्यनाम समास दसवां ॥१०॥

N/A

References : N/A
Last Updated : December 01, 2023

Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.
TOP