अध्याय पाँचवा - श्लोक १०१ से १२०

देवताओंके शिल्पी विश्वकर्माने, देवगणोंके निवासके लिए जो वास्तुशास्त्र रचा, ये वही ’ विश्वकर्मप्रकाश ’ वास्तुशास्त्र है ।


सर्वोषधि सर्वजत्न और अनेक प्रकारके गन्ध पंच कषाय और पल्लव और मिट्टी इनसे पूर्ण करे वा शुध्द जलसे पूर्ण करे ॥१०१॥

वह वेदीके ऊपर ग्रहोंका पूजन करै मुरा जटामांसी वच कूट चंदन दोनों हलदी ॥१०२॥

शुंठी चम्पा नागरमोथा यह सर्वोषधियोंका गण कहा है. पीपल गूलर पिलखन आम्र और वड इनमें उत्पन्नहुए ॥१०३॥

पंचपल्लव कहे हैं. ये सब कर्मोमें श्रेष्ठ होते हैं तुलसी सहदेवी विष्णुक्रान्ता शतावर ॥१०४॥

यदि सौ औषधि न मिलैं तो इन मूलोंको ग्रहण करे. वड गूलर बैत ॥१०५॥

अश्वत्थ ( पीपल ) और मूल ये पंच कषाय कहे है. अश्वस्थान गजस्थान बमई दो नदियोंक संगम ॥१०६॥

राजद्वारका प्रवेश इनसे मिट्टी मँगाकर कलशमें डारे. सपूर्ण समुद्र नदी तलाव और जल देनेवाले नद ॥१०७॥

ये सब यजमानके पापनाशक कलशमें आओ ॥१०८॥ और कलशमें शिखी आदि पैंतालीस ४५ देवोंका पूजन करै ॥१०९॥

वह पूजन वेदके मंत्र वा नामके मंत्र ॐकार वा व्याह्रतियोंसे करना और हस्तभर प्रमाणके तीन मेखला वाले कुण्डमें होम करना ॥११०॥

जौ कालेतिल समिध और क्षीरवृक्ष पालाश खदिर अपामार्ग गूलर इनमे होम करै ॥१११॥

अथवा सहत मिलिहुई कुशा और दूबसे घृत मिलाकर करै अथवा पांच बेल वा बलकी बीजोंसे करै ॥११२॥

होमके अन्तमें भक्ष्य और भोज्योंसे वास्तुदेशमें, नमस्कार जिसके अंतम ॐकार जिसकी आदिमें हो ऎसे बलिको दे ॥११३॥

क्रमसे वेदोक्तमंअत्रोंसे देवताओंका पूजनकरैं फ़िर व्याह्यतियोंसे होम करै और स्विष्टकृत होमको करै ॥११४॥

फ़िर पूर्णाहुतिका हवन करै और संस्त्रवका प्राशन अर्थात स्त्रुवेकेघीका भक्षण करै और विधिसे वास्तिमण्डलदेवताओंको बलि दे ॥११५॥

शिखिको घृतान्न दे, पर्जन्यको घृतान्न और कमलमी बलि दे फ़िर जयन्त आदि वास्तुमण्डलदेवताओंको बलि दे ॥११६॥

कुलिशायुधको पंचरत्न और पुष्टिके पदार्थ दे सूर्यको कुशा और धूम रक्त चंदोवा अपूप और सत्तु दे ॥११७॥

सत्यको घी और गेहूं दे. भृशको मत्स्य और अन्न दे अन्तरिक्षको शष्कुलि ( पूरी ) और पक्षियोंका मांस दे ॥११८॥

वायसको सत्तु और पूषाको लाजा ( खील ) बुध्दिमान कही है. वितथको चणकन्न, गृहक्षतको मध्वन्न दे ॥११९॥

यमको पिशितान्न ( मांस ) गन्धर्वको गन्धौदन, भृंगराजको मेंढके जिह्याकी बलि दे ॥१२०॥

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Last Updated : January 20, 2012

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