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शिबि

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शिबि  m. m. (also written शिवि) N. of a ऋषि (having the patr.औशीनर and supposed author of [RV. x, 179]), [Anukr.]
of a king (renowned for his liberality and unselfishness, and said to have saved अग्नि transformed into a dove from इन्द्र transformed into a hawk by offering an equal quantity of his own flesh weighed in a balance), [MBh.]; [Hariv.]; [Pur.]
(pl.) a people descended from शिबि, [MBh.]; [Hariv.]; [VarBṛS.]
N. of a son of इन्द्र, [MBh.]
शिखिन्   of इन्द्र in the fourth मन्व्-अन्तर (v.l.), [VP.]
of a son of मनुचाक्षुष, [BhP.]
of a दैत्य (son of संह्राद), [MBh.]
a king of the शिबिs, [VarBṛS.]
a beast of prey, [L.]
भूर्ज   the birch tree (= ), [L.]
Typha Angustifolia, [L.]

शिबि [śibi] वि [vi] का [kā]   (वि) का 1 A palanquin, litter.
A bier.
A raised platform.
शिबि [śibi] वि [vi] रम् [ram]   (वि) रम् 1 A camp; विद्रुते शिबिरे शून्ये [Mb.9.3.] 3.4; धृष्टद्युम्नः स्वशिबिरमयं याति सर्वे सहध्वम् [Ve.3.18;] [Śi. 5.68.]
A royal camp or residence.
An intrenchment for the protection of an army.
A kind of grain.
शिबि [śibi] वि [vi] रथः [rathḥ]   (वि) रथः A palanquin, litter.

शिबि n.  एक लोकसमूह, जो आधुनिक पंजाब प्रदेश में इरावती, एवं चंद्रभागा (असिक्नी) नदीयों के बीच प्रदेश में स्थित था ।
शिबि n.  ऋग्वेद में इन लोगों का निर्देश ‘शिव’ नाम से प्राप्त है, जहाँ, अलिन, पक्थ, भलानस्, एवं विषणिन् लोगों के साथ, इनके सुदास राजा के द्वारा पराजित होने का निर्देश प्राप्त है [ऋ. ७.१८.७] । बौधायन के श्रौतसूत्र में, इन लोगों के शिबि ओशीनर राजा का निर्देश प्राप्त है [वौ. श्रौ. ३.५३.२२] । इन लोगों के अमित्रतपन नामक राजा का निर्देश भी ऐतरेय ब्राह्मण में प्राप्त है [ऐ. ब्रा. ८.२३.१०]
शिबि n.  पाणिनी के अष्टाध्यायी, में, इन लोगों के शिविपुर, (शिवपुर) नामक नगर का निर्देश प्राप्त है, जो उत्तर प्रदेश में स्थित था [महा. २.२८२, २९३-२९४] । आधुनिक पंजाब के झंग प्रदेश में स्थित शोरकोट प्रदेश में शिबि लोग रहते थे, ऐसा माना जाता है । सिंकदर के आक्रमण के समय भी ये लोग पंजाब प्रदेश में रहते थे, एवं ‘सिबै’ अथवा ‘सीबोइ’ नाम से सुविख्यात थे [अरियन इंडिका ५.१२]; शिव २. देखिये ।
शिबि n.  इस ग्रंथ में इन लोगों का निर्देश शक, किरात, यवन, एवं वसाति आदि विदेशीय जातियों के साथ प्राप्त है । उशीनर लोगों से ये लोग शुरू से ही संबंधित थे, एवं शिबि औशीनर राजा के वृषदर्भ, सुवीर, केकय, एवं मद्रक इन चारों पुत्रों के कारण, समस्त पंजाब देश में इन्होंने अपना राज्य स्थापित किया था (शिबि औशीनर देखिये) । शांतनु राजा की माता सुनंदा, एवं युधिष्ठिर का श्र्वशुर गोवासन इसी प्रदेश के रहनेवाले थे [म. आ. ९०.४६, ९०.९३] । भारतीय युद्ध में, ये लोग सौवीर देश के राजा जयद्रथ के साथ कौरवपक्ष में शामिल थे [म. उ. १९६. ७-८]
शिबि (औशीनर , औशीनरि) n.  एक सुविख्यात दानशूर राजा, जो शिबि लोगों का सब से अधिक ख्यातनाम राजा था (शिबि. १. देखिये) । उशीनर राजा का पुत्र होने के कारण इसे ‘औशीनर’ अथवा ‘औशीनरि’ पैतृक नाम प्राप्त हुआ था । इसकी राजधानी शिवपुर में थी [ब्रह्मांड. ३.७४.२०-२३]
शिबि (औशीनर , औशीनरि) n.  एक वैदिक मंत्रद्रष्टा के नाते इसका निर्देश ऋग्वेद में प्राप्त है [ऋ. १०.१७९.१] यह इंद्र के कृपापात्र व्यक्तियों में से एक था, जिसने इसके लिए ‘वर्शिष्ठिय’ के मैदान में यज्ञ किया था, एवं इसे विदेशियों के आक्रमण से बचाया था [बौ. श्रौ. २१.१८]
शिबि (औशीनर , औशीनरि) n.  इस ग्रंथ में इसे उशीनर राजा एवं माधवी का पुत्र कहा गया है, एवं इसके औदार्य की अनेकानेक कथाएँ वहाँ प्राप्त हैं [म. उ. ११७.२०] । पौराणिकसाहित्य में इसकी माता का नाम दृषद्वती दिया गया है [वायु. ९९.२१-२३];[ ब्रह्मांड. ३.७४.२०-२३];[ मत्स्य. ४८.१८]
शिबि (औशीनर , औशीनरि) n.  इसके औदार्य की निम्नलिखित कथा सब से अधिक सुविख्यात है । एक बार इसकी सत्त्वपरिक्षा लेने के लिए अग्नि ने कपोत का, एवं इन्द्र ने बाज (श्येन) पक्षी का रूप धारण किया, एवं श्येन पक्षी कपोत का पीछा करता हुआ इसके संमुख उपस्थित हुआ। उस समय कपोत पक्षी इसकी शरण में आया, एवं उसने इसे श्येन को समझाने के लिए कहा। इसके द्वारा प्रार्थना किये जाने पर श्येन ने इससे कहा, ‘अगर तुम इस कपोत के वजन के बराबर अपना मांस काट कर मुझे दोंगे, तो मैं अपने भक्ष्य, इस कपोत को छोड़ दूंगा’। इसने श्येन पक्षी की यह शर्त मान्य कर दी, एवं अपने शरीर का मांस काट कर तराजु में रखना प्रारंभ किया । पश्चात् शरीर के मांसखंड पूरे न पड़ने पर, यह स्वयं ही तराजु के पलड़े में जा कर बैठ गया । इसका यह आत्मनिरपेक्ष दातृत्त्व देख कर, इंद्र एवं अग्नि इससे अत्यधिक प्रसन्न हुए, एवं उन्होंनें इसे अनेकानेक वर प्रदान किये [म. व. १३०.१९-२०, १३१. परि. १ क्र. २१ पंक्ति ५] । महाभारत में अन्यत्र उपर्युक्त कथा इसकी न हो कर, इसके पुत्र वृषदर्भ की बतलायी गयी है [म. अनु. ६७]
शिबि (औशीनर , औशीनरि) n.  महाभारत में अन्यत्र इसके औदार्य की एक अन्य कथा दी गयी है, जो उपर्युक्त कथा का ही अन्य रूप प्रतीत होता है । एक बार इसके पास एक ब्राह्मण अतिथि आया, जिसने इसके बृहद्गर्भ नामक पुत्र का मांस भोजनार्थ माँगा। यह उसे पका कर सिद्ध कर ही रहा था, कि इतने में उस ब्राह्मण ने इसके अन्तःपुर, शस्त्रगार, एवं हाथी, एवं अश्वशाला आदि को जलाना प्रारंभ किया । यह ज्ञात होते ही, अपने पुत्र का पका हुआ मांस अपने सर पर रख कर यह ब्राह्मण के पीछे दौडा। उस समय उस ब्राह्मण ने वह मांस इसे ही भक्षण करने की आज्ञा दी। तदनुसार यह उसे भक्षण करनेवाला ही था, कि इतने में ब्राह्मण ने संतुष्ट हो कर इसका पुत्र पुनः जीवित किया, एवं इसे अनेकानेक वर प्रदान कर वह चला गया [म. शां. २२६.१९];[ अनु. १३७.४]
शिबि (औशीनर , औशीनरि) n.  महाभारत में इसे ययाति राजा का पौत्र, एवं ययाति कन्या माधवी का पुत्र कहा गया है । एवं प्रतर्दन नामक तीन भाईयों के साथ एक यज्ञ किया, जिसका सारा पुण्य इन्होनें स्वर्ग से अधःपतित हुए अपने पितामह ययाति को प्रदान किया । इस प्रकार इन्होंनें ययाति को पुनः एकबार स्वर्गप्राप्ति करायी (माधवी देखिये) । ययाति के स्वर्गप्राप्ति के लिए इसने अन्तरिक्ष में स्थित अपना सारा राज्य उसे प्रदान किया, ऐसा एक रूपकात्मक निर्देश महाभारत में प्राप्त है, जिसका संकेत भी इसी पुण्यदान के आख्यान की ओर प्रतीत होता है [म. आ. ८८.८] महाभारत में अन्यत्र नारद का, एवं इसका एक संवाद प्राप्त है, जहाँ उसने इसे अपने से भी अधिक पुण्यवान वर्णन किया है [म.व. परि. १.२१.५.] । यह अत्यंत संपत्तिमान्, उदार, पराक्रमी, राजनीतिप्रवण एवं यज्ञकर्ता राजा था [म. द्रो. परि. १.८.४०९-४३६] । यह कुछ काल तक इंद्र बना था, एवं ब्रह्मा के यज्ञ का ‘प्रतिष्ठाता’ भी यही था ।
शिबि (औशीनर , औशीनरि) n.  इसने सुहोत्र राजा को दान का महत्त्व कथन किया था । उस समय उसने इसे कहा, ‘दान यह एक ही संपत्ति ऐसी है कि, जो देने से अधिक बढती है’ [म. व. परि. १.२१.२] । इसका यह उपदेश सुन कर, सुहोत्र ने इसे सम्मानपूर्वक विदा किया ।
शिबि (औशीनर , औशीनरि) n.  मृत्यु के पश्चात् यह यमसभा का सदस्य हुआ [म. स. ८.९] । मृत्यु के पश्चात्, उत्तर-गोग्रहणयुद्ध के समय पांडवों के पराक्रम को देखने के लिए अन्य देवों के साथ यह उपस्थित हुआ था [म. वि. ५१.९१७* पंक्ति. ३०] । इसके माहात्म्य की अनेकानेक कथाएँ पद्म में प्राप्त हैं [पद्म. उ. ८२, ११९]
शिबि (औशीनर , औशीनरि) n.  इसके निम्नलिखित चार पुत्र थेः-- १. वृषादर्भ, २. सुवीर; ३. मद्र; ४. केकय [भा. ९.२३.३] । इसके इन पुत्रों ने पंजाब प्रदेश में क्रमशः वृषादर्भ, सौवीर, केकय, एवं मद्र राज्यों की स्थापना की, एवं इस प्रकार वे समस्त पंजाब प्रदेश के स्वामी बन गये। उपर्युक्त पुत्रों के अतिरिक्त, इसके गोपति, एवं बृहद्गर्भ नामक पुत्रों का निर्देश भी महाभारत में प्राप्त है [म. शां. ४९.७०]
शिबि (औशीनर , औशीनरि) II. n.  उशीनर देश का एक राजा, जो द्रौपदीस्वयवंर में उपस्थित था [म. आ. ६०.२१] । भारतीय युद्ध में यह पांडवों के पक्ष में शामिल था । अन्त में यह द्रोण के द्वारा मारा गया [म. द्रो. १३०.१७]
शिबि (सिबोही) (गणराज्य) n.  एक गणराज्य (सिकंदर आक्रमणकालीन - उत्तर पश्चिम भारतीय लोकसमूह एवं गणराज्य)
जो दक्षिण पंजाब में वितस्ता एवं चिनाब के संगम के दाये ओर स्थित था । सिकंदर के अपने देश लौटते समय इन लोगों ने बिना लडे ही उसकी अधीनता स्वीकृत की थी ।
शिबि II. n.  एक दैत्य, जो हिरण्यकशिपु का पुत्र था [म. आ. ५९.११] । किंतु पौराणिक साहित्य में इसे प्रह्लाद का पुत्र कहा गया है [मत्स्य. ६.९];[ विष्णु. १.२१.१] । यह द्रुम राजा के रूप में पृथ्वी पर अवतीर्ण हुआ था [म. आ. ६१.८]
शिबि III. n.  तामस मन्वंतर का इन्द्र [वायु. ६२.४०]
शिबि IV. n.  (स्वा. उत्तान.) एक राजा, जो चाक्षुष मनु एवं नड्वला के पुत्रों में से एक था [भा. ४.१३.१६]
शिबि V. n.  (सो. वृष्णि.) एक यादव राजा, जो वृष्णि एवं माद्री के पुत्रों में से एक था [मत्स्य. ४५.२]
शिबि VI. n.  पुरूरवस्वंशीय शिनि राजा का नामांतर (शिनि १. देखिये)
शिबि VII. n.  एक आचार्य, जो शुनस्कर्ण बाष्कीह नामक आचार्य का पिता था (शुनष्कर्ण बाष्कीह देखिये) ।
शिबि VIII. n.  भूतपूर्व पाँच इंद्रों में से एक, जो शिव की आज्ञा से पृथ्वी पर अवतीर्ण हुआ था [म. आ. १९.१६*]

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ŚIBI I   Grandson of Hiraṇyakaśipu, who had four sons called Anuhrāda, Hrāda, Prahlāda and Saṁhlāda, and of the four, Saṁhlāda had three sons called Āyuṣmān, Śibi and Bāṣkala. [Agni Purāṇa, Chapter 19].
(1) This Śibi was the son of Hiraṇyakaśipu. [Ādi Parva, Chapter 65, Verse 18].
(2) This Asura took birth again and lived as a King by the name Druma. [M.B. Ādi Parva, Chapter 67, Verse 8].
ŚIBI II   Inhabitants of the country called Śibi; they are called Śaibyas also. The following information about the country is gathered from Mahābhārata.
(i) Sunandā, mother of King Śantanu was a princess of this country. [M.B. Ādi Parva, Chapter 95, Verse 44].
(ii) Govāsana, father-in-law of Yudhiṣṭhira, was a King of Śibi. [Ādi Parva, Chapter 95, Verse 76].
(iii) Nakula, during his triumphal tour of the western regions, conquered the kingdom of Śibi. [M.B. Sabhā Parva, Chapter 7].
(iv) People of Śibi attended the Rājasūya yajña conducted by Yudhiṣṭhira with presents. [Sabhā Parva, Chapter 52, Verse 14].
(v) A King called Uśīnara, once ruled the country. [Vana Parva, Chapter 131, Verse 21].
(vi) The kingdom of Śibi was once under the jurisdiction of Jayadratha. [Vana Parva, Chapter 267, Verse 11].
(vii) Arjuna annihilated the armies of the kingdom of Śibi which followed Jayadratha to the battlefield. [Vana Parva, Chapter 271, Verse 28].
(viii) The mahārathas of Śibi, with their armies, arrayed under the banner of Duryodhana to fight the Pāṇḍavas. [Udyoga Parva, Chapter 195, Verse 7].
(ix) Karṇa once subjugated the kingdom of Śibi. [Droṇa Parva, Chapter 91, Verse 38].
(x) The people of the country in earlier days were illiterate and ignorant. [Karṇa Parva, Chapter 45, Verse 34].
ŚIBI III   A King born in the dynasty of Uśīnara. He was present at the wedding of Draupadī. He fought on the side of the Pāṇḍavas in the great war and was killed by Droṇa. [Droṇa Parva, Chapter 155, Verse 19]. King Śibi had four sons Bhadra, Suvīra, Kekaya and Vṛṣadarbha. [Bhāgavata, 9th Skandha].
ŚIBI IV   An Indra. There were four sects of Devas called Supāras, Haris, Satyas and Sudhīs in Tāmasa Manvantara, and there were twentyseven Devas in each Sect. Śibi, who performed hundred yajñas then was Indra. (For details see under Manvantaram).
ŚIBI V   An ancient Rājarṣi.
1) Genealogy.
Descended from Viṣṇu thus:-- Brahmā-Atri-Candra-Budha-Purūravas-Āyus-Nahuṣa- Yayāti-Anudruhyu-Sabhānara-Kālanara-Sṛñjaya- Uśīnara-Śibi. Śibi was born to Uśīnara of Mādhavī, daughter of Yayāti.
2) Suhotra made to give way.
King Suhotra of Kuru dynasty once on his return from a visit of maharṣis saw King Śibi coming in the opposite direction in his chariot, and both the Kings saluted each other as their age ordained. But, they did not give passage to each other as they thought themselves to be equal in merit. At that time Nārada came there and asked the kings why they stood there thus blocking the path. They answered Nārada thus: “He who is more noble or clever on account of former actions etc. is usually given way to by the other person. Both of us are comrades and are equals.” Nārada then spoke as follows:-- “Oh! King of the Kuru dynasty! You are cruel to the gentle and gentle to the cruel. To the evil you are good; then why not be good to the good. Devas have ordered that he who does good will get it hundredfold by return. King Uśīnara is more noble and gentle than you are. The miser is won over by liberality, the liar by truth, the cruel by patience and the evil person by good. But, both of you Kings are noble persons. Therefore, one of you should give way to the other.” Listening to Nārada's advice, Suhotra gave way to Śibi and proceeded on his way. [Vana Parva, Chapter 194].
3) Śibi tested.
Śibi's fame spread in the three worlds, and an idea was mooted among the Devas that it should be tested how much of the reputation of the King was genuine. Accordingly, Agni in the form of a dove and Indra in that of a kite hunting after the dove, rushed to King Śibi. The dove took refuge in the lap of the King sitting in ‘divya’ posture, and the priest told the King that it was the latter's duty to protect the dove, which took refuge with him for its life. The dove also told the King thus; “I am really a muni, who has entered the body of the dove. I take refuge in you for my life.” By that time the kite too had flown up to the King. It asked the King to return the dove, which it had been chasing. The King was surprised to hear the kite talk and told the bird that it was not proper for him to give up the dove who had sought refuge under him, but that he would give the kite any other flesh in lieu of the dove. The kite replied as follows: “You must give me flesh cut from your right thigh equal in weight to that of the dove. If you do so, the dove will be saved and you will be praised by people.” Accordingly, the King cut a piece of flesh from his right thigh and weighed it in the balance against the dove. But, the dove weighed more. The King cut more flesh from his thigh and weighed, but the dove still weighed more. Thus, by instalments the King cut his whole body and weighed the flesh against the dove, yet it weighed more. Then the King himself sat in the balance, seeing which the kite flew away. Then the dove assumed its original form and told the King that it was Agni and the kite, Indra. The Devas were greatly pleased with the firm sense of sacrifice of the King; they blessed him and told him that a son called Kapotaromā will be born to him. [Vana Parva, Chapter 197].
4) Other information.
(i) When Yayāti fell down on earth from heaven, Śibi promised to transfer to him the merits acquired by him (Śibi). [Ādi Parva, Chapter 93, Verse 3].
(ii) Śibi worships Yama in his court. [Sabhā Parva, Chapter 8, Verse 10].
(iii) Śibi too was present in the company of Indra to witness the fight between Arjuna and Droṇa in the battle between King Virāṭa and Kauravas at the Virāṭa city in connection with the lifting of Virāṭa's cow by the Kauravas. [Virāṭa Parva, Chapter 56, Verse 9].
(iv) Śibi loved Indra very much. [Bhīṣma Parva, Chapter 9, Verse 7].
(v) People of the Yadu dynasty presented Śibi a sword. [Śānti Parva, Chapter 166, Verse 89].
(vi) He gifted away his son to the brahmins, and therefore he attained heaven. [Śānti Parva, Chapter 234, Verse 19];[ Anuśāsana Parva, Chapter 137, Verse 4].
(vii) He did not eat flesh. [Anuśāsana Parva, Chapter 115, Verse 61].
5) Conclusion.
The story of two Kings connected with the episode of the dove and the kite is mentioned in the Mahābhārata. One of the Kings is Śibi and the other Uśīnara, father of Śibi. (See under Uśīnara).

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    भक्तो और महात्माओंके चरित्र मनन करनेसे हृदयमे पवित्र भावोंकी स्फूर्ति होती है ।
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