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लक्ष्मी

A Sanskrit English Dictionary | sa  en |   | 
लक्ष्मी  n. f. (nom.ई॑स्, rarely ई॑; also ifc. as mf., but n(). ; cf.लक्ष्मीक) a mark, sign, token, [RV. x, 71, 2]; [Nir. iv, 10]
पापी   (with or without ) a bad sign, impending misfortune, [AV.]; [ĀpŚr.]
पुण्या   (but in the older language more usually with ) a good sign, good fortune, prosperity, success, happiness (also pl.), [AV.] &c. &c.
wealth, riches, [Kāv.]; [Rājat.]
beauty, loveliness, grace, charm, splendour, lustre, [MBh.]; [Kāv.] &c.
N. of the goddess of fortune and beauty (frequently in the later mythology identified with श्री and regarded as the wife of विष्णु or नारायण; accord. to [R. i, 45, 40-43] she sprang with other precious things from the foam of the ocean when churned by the gods and demons for the recovery of the अमृतq.v.; she appeared with a lotus in her hand, whence she is also called पद्मा; accord. to another legend she appeared at the creation floating over the water on the expanded petals of a lotus-flower, she is also variously regarded as a wife of सूर्य, as a of प्रजा-पति, as a of धर्म and mother of काम, as sister or mother of धातृ and विधातृ, as of दत्तत्रेय, as one of the 9 शक्तिs of विष्णु, as a manifestation of प्रकृति &c., as identified with दाक्षायणी in भरताश्रम, and with सीता, wife of राम, and with other women), ib. (cf.[RTL. 103; 108 &c.])
the Good Genius or Fortune of a king personified (and often regarded as a rival of his queen), royal power, dominion, majesty, [Kāv.]; [Kathās.]; [Rājat.]
a partic. verse or formula, [NṛsUp.]
ऋद्धि   N. of various plants (Hibiscus Mutabilis; Mimosa Suma; turmeric; a white तुलसी; = , वृद्धि, प्रियङ्गु, and फलिनी), [L.]
of the eleventh कला of the moon, [Cat.]
of two kinds of metre, [Col.]
the wife of a hero, [L.]
द्रव्य   = , [L.]
a pearl, [L.]
लखमा   N. of the wife of king चन्द्र-सिंह of मिथिला and patroness of various authors (also called , लषमा, लखिमा or लछिमा), [Cat.]
of a poetess, ib.
of another woman, [Śukas.]

लक्ष्मी [lakṣmī]  f. f. [लक्ष्-इ मुट् च [Uṇ.3.158,16]]
Fortune, prosperity, wealth; सा लक्ष्मीरुपकुरुते यया परेषाम् [Ki.8.13;] मातर्लक्ष्मि तव प्रसादवशतो दोषा अमी स्युर्गुणाः Subhāṣ; [Bh.3.] 64; तृणमिव लघुलक्ष्मीर्नैव तान् संरुणद्धि [Bh.2.17.]
Good fortune, good luck.
Success, accomplishment; [U.4.] 1.
Beauty, loveliness, grace, charm, splendour; lustre; श्यामं सदापीच्यवयोऽङ्गलक्ष्म्या स्त्रीणां मनोज्ञं रुचिरस्मितेन [Bhāg.1.19.28;] मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति [Ś.1.2;] [U.6.24;] [Māl.9.25;] लक्ष्मीमुवाह सकलस्य शशाङ्कमूर्तेः [Ki. 2.59;5.39,52;9.2;] [Ku.3.49.]
The goddess of fortune, prosperity and beauty, regarded as the wife of Viṣṇu. (She is said to have sprung from the ocean along with the other precious things or 'jewels' when it was churned for nectar by the gods and demons.); इयं गेहे लक्ष्मीः [U.1.39;] प्रत्यब्दं पूजयेल्लक्ष्मीं शुक्लपक्षे गुरोर्दिने । नापराह्ने न रात्रौ च नासिते न त्र्यहस्पृशि ॥ [Skanda P.]
Royal or sovereign power, dominion; (oft. personified as a wife of the king and regarded as a rival of the queen); तामेकभार्यां परिवादभीरोः साध्वीमपि त्यक्तवतो नृपस्य । वक्षस्यसंवट्टसुखं वसन्ती रेजे सपत्नीरहितेव लक्ष्मीः ॥ [R.14.86;12.26.]
The wife of a hero.
A pearl.
 N. N. of turmeric.
Superhuman power.
 N. N. of the eleventh digit of the moon.
Comp. ईशः an epithet of Viṣṇu.
the mango tree.
a prosperous or fortunate man.
-कल्पः   a particular period of time.
कान्तः an epithet of Viṣṇu.
a king.
-गृहम्   the red lotus-flower.
तालः a kind of palm.
(in music) a kind of measure.-नाथः an epithet of Viṣṇu.
-निकेतनम्   the bathing with fragrant myrobalan powder.
-निरीक्षित a.  a. favoured by Lakṣmī, rich; लक्ष्मीनिरीक्षिताः क्षिप्रं भजन्ते चक्रवर्तिताम् [Bm.1.676.]
पतिः an epithet of Viṣṇu.
a king; विहाय लक्ष्मीपतिलक्ष्म कार्मुकम् [Ki.1.44.]
the betel-nut tree.
the clove tree.
पुत्रः a horse.
 N. N. of Kuśa and Lava.
 N. N. of Cupid or Kāma.
a wealthy man.
-पुष्पः   a ruby.
-पूजनम्   the ceremony of worshipping Lakṣmī (performed by the bridegroom in company with his bride after she has been brought home).
-पूजा   the worship of Lakṣmī performed on the day of newmoon in the month of Āśvina (chiefly by bankers and traders whose commercial or official year closes on that day).
-फलः   theBilva tree.
-रमणः   an epithet of Viṣṇu.
-वसतिः  f. f. 'Lakṣmī's abode', the red lotus-flower.
-वारः   Thursday.
-विवर्तः   change of fortune.
-वेष्टः   turpentine.-सखः a favourite of Lakṣmī
-सनाथ a.  a. endowed with beauty or fortune.
सहजः, सहोदरः epithets of the moon.
camphor.
 N. N. of the horse of Indra.-समाह्वया N. of Sītā; L. D. B.

Shabda-Sagara | sa  en |   | 
लक्ष्मी  f.  (-क्ष्मी)
1. LAKSHMI, one of the three principal female deities of the Hindus, the wife of VISHṆU, and goddess of wealth and pros- perity.
2. Fortune, success, prosperity.
3. SĪTĀ, the wife of RĀMA. 4. Beauty, splendour.
5. The name of a medicinal root, common- ly Briddhi.
6. Another root, termed Riddhi.
7. A plant: see प्रियङ्गु.
8. The wife of a hero.
9. Turmeric.
10. A pearl.
11. Royal power.
E. लक्ष् to see, &c., Unādi aff. ई, and मुट् augment.

ना.  इस्टेट , जायदाद . दौलत , धन . पैसा , श्री , संपत्ती , संपदा .

A dictionary, Marathi and English | mr  en |   | 
. लक्ष्मी अवतरणें To descend and smile upon; to make to look full, flourishing, lively, swarming &c.;--used of Fortune with respect to a household, an estate, a business. लक्ष्मीचा होरा The season of prosperity; the ascendant period of one's good fortune. लक्ष्मी मोरीवाटें येणें To have riches flowing in profusely.

 स्त्री. ( अपभ्रष्टरुपे लक्ष्मी , लक्षुमी , लक्षिमी ).
विष्णूची स्त्री ; संपत्ति , उत्कर्ष , वैभव , सौंदर्य इ० ची देवता .
भाग्य ; नशीब ; सद्दी .
धन ; संपत्ति . इ०
( काव्य ) श्री ; शोभा ; सौंदर्य ; दर्शनीयता ( सामा . वस्तूंची ).
( कृषि ) शेतीच्या उपयोगाची जनावरे ( गाई , म्हशी , बैल , रेडे ). पाटलाजवळ दोन खंडी लक्ष्मी आहे . रानांत लक्ष्मीला पाणी भेटत नाही .
( खा . व . ) स्त्री ; बायको . तुझ्या शेतांत निंदण्यास किती लक्षिम्या होत्या ? [ सं . ] अवतरणे - लक्ष्मीची कृपादृष्टि होणे ; समृद्धि येऊन शोभा प्राप्त होणे ( कुटुंब , शेत , घरदार , व्यापार इ० स ). लक्ष्मीचा होरा - पु . भरभराटीचा काल ; भाग्योदयकाल . लक्ष्मीची मोठी बहीण - अक्काबाई पहा .
०मोरीवाटे   - गडगंज संपत्ति येणे ; लयलूट होणे . सामशब्द -
येणे   - गडगंज संपत्ति येणे ; लयलूट होणे . सामशब्द -
०ताल  पु. गाण्यांतील एक ताल . [ सं . ]
०नारायण  पु. लक्ष्मीसह विष्णु ; एक देवता .
०नारयणाचा   - पु . एकमेकाला शोभणारी नवराबायको ; आदर्श दांपत्य .
जोडा   - पु . एकमेकाला शोभणारी नवराबायको ; आदर्श दांपत्य .
०पति  पु. 
विष्णु .
धनवान मनुष्य . [ सं . ]
०पुत्र  पु. श्रीमंत मनुष्य . [ सं . ]
०पूजन   पूजा नस्त्री .
गृहप्रवेशाने नवर्‍या मुलीला सासरी आणल्यानंतर दांपत्याकडून केलेली लक्ष्मीची पूजा .
अश्विन वद्य अमावस्येस धनिक , व्यापारी इ० लोक मोहरा , रुपये इ० द्रव्यावर लक्ष्मीचे आवाहनपूर्वक पूजन करतात ते . लक्ष्मीबाईची दया , लक्षुमबाईची दया - स्त्री . लक्ष्मीची कृपादृष्टि . ह्याच्या उलट अकाबाईची दया .
०राखण  न. लक्ष्मीने कुटुंबात रहावे म्हणून लक्ष्मीकरितां निराळा काढून ठेवलेला रोजच्या जेवणाचा भाग .
०लीळ  पु. लक्ष्मीचा पति . [ लक्ष्मी + लीला ]
०वंत वि.  लक्ष्मीवान .
०वान वि.  
संपत्तिमान ; श्रीमान .
उत्कर्ष पावणारा ; वर्धमान ; आबादीचा . [ सं . लक्ष्मी + वत ]
०विलास  पु. एक रसायण . हे विशेषतः क्षयावर देतात . [ सं . ]
०विलास   तेल न . गंधतेल . हे सर्व रोगनाशक आहे . [ सं . ]

लक्ष्मी n.  समुद्र से प्रकट हुई एक देवी, जो भगवान् विष्णु की पत्नी मानी जाती है । ऐश्वर्यं का प्रतीकरूप देवता मान कर, ऋग्वेदिक श्रीसूक्त में इसका वर्णन किया गया है । समृद्धि, संपत्ति, आयुरारोग्य पुत्रपौत्रादि परिवार, धनधान्यविपुलता आदि की प्राप्ति के लिए लक्ष्मी एवं श्री की उपासना की जाती है । इसी कारण श्रीसूक्त में प्रार्थना की गयी है-- यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम ॥२॥ सुवर्ण, गायें, अश्व एवं चाकरनौकर आदि परिवार से युक्त लक्ष्मी मुझे प्राप्त हो । धनधान्यादि भौतिक संपत्ति धनलक्ष्मी ही नही. बल्कि सैन्यसंपत्ति (सैन्यलक्ष्मी) का भी लक्ष्मी में ही समावेश किया जाता था
लक्ष्मी n.  ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले ‘लक्ष्मी’ देवता की कल्पना अथर्ववेदकालीन है । उस ग्रंथ में अनेक ‘भावानात्मक’ देवताओं का निर्देश प्राप्त है, जिनकी उपासना से प्रेम, विद्या, बुद्धि, वाक्चातुर्य आदि इच्छित सिद्धिओं का लाभ प्राप्त होता है । अथर्ववेद में निर्दिष्ट ऐसी देवताओं में काम प्रेमदेवता, सरस्वती विद्या, मेधा बुद्धि, वाक् वाणी आदि देवता प्रमुख है, जिनमें ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली लक्ष्मी देवता का प्रमुखता से निर्देश किया गया है ।
लक्ष्मी n.  श्रीसूक्त में लक्ष्मी का स्वरूपवर्णन प्राप्त है, जहाँ इसे हिरण्यवर्णा, पद्मस्थिता, पद्मवर्णा, पद्ममालिनी, पुष्करिणी, आदि स्वरूपवर्णनामक विशेषण प्रयुक्त किये गये हैं । वाल्मीकि रामायण में प्राप्त इसके स्वरूपवर्णन में, इसे शुभ्रवस्त्रधारिणी, तरुणी मुकुटधारिणी, कुंचितकेशा, चतुर्हस्ता, सुवर्णकान्ति, मणिमुक्तादिभूषिता कहा गया है [वा. रा. वा. ४५] पुराणों में वर्णित लक्ष्मी कमलसना, कमलहस्ता, एवं कमलमालाधरिणी है । ऐरावतों के द्वारा सुवर्णपात्र में लाये हुए तीर्थजल से यह स्नान सुस्नात करती है, एवं सदेव विष्णु के वक्ष:स्थल में रहती है [विष्णु, १.९.९८-१०५]
लक्ष्मी n.  लक्ष्मी क्षीरसागर में अपने पति श्रीविष्णु के साथ रहती है, एवं अपने अन्य एक अवतार राधा के रूप में कृष्ण के साथ गोलोक में रहती है (राधा देखिये) । महाभारत में लक्ष्मी के ‘विष्णुपत्नी लक्ष्मी‘ एवं ‘राज्यलक्ष्मी’ ऐसे दो प्रकार बताये गये हैं । इनमें से लक्ष्मी हमेशा विष्णु के पास रहती है, एव राज्यलक्ष्मी राजा एवं पराक्रमी लोगों के साथ घूमती है, ऐसा निर्देश प्राप्त है । लक्ष्मी का निवासस्थान कहाँ रहता है, इसका रूपकात्मक दिग्दर्शन करनेवाली अनेकानेक कथाएँ महाभारत एवं पुराणों मे प्राप्त है, जिनमें निम्नलिखित कथाएँ प्रमुख हैं
(१) लक्ष्मी-प्रल्हादसंवाद---असुरराज प्रल्हाद ने एक ब्राह्मण को अपना शील प्रदान किया, जिस कारण क्रमानुसार उसका तेज, धर्म, सत्य, वृत्त, बल एवं अंत में उसकी लक्ष्मी उसे छोड कर चले गयें । तत्पश्चात् लक्ष्मी ने प्रल्हाद को साक्षात दर्शन दे कर उपदेश दिया, ‘तेज, धर्म, सत्य, वृत्त, बल एवं शील आदि मानवी गुणों में मेरा निवास रहता है, जिन में से शील अथवा चारित्र्य मुझे सबसे अधिक प्रिय है । इसी कारण सच्छील आदमी के यहाँ रहना मैं सबसे अधिक पसंद करती हूँ। ‘शीलं परं भूषणम्’ इस उक्ति का भी यही अर्थ है’ [म. शां. १२४.४५.६०]
(२) लक्ष्मी-इंद्रसंवाद---असुरराज प्रह्नाद के समान, उसका पौत्र बलि का भी लक्ष्मी ने त्याग किया । बलि का त्याग करने की कारणपरंपरा इंद्र से बताते समय लक्ष्मी ने कहा, ‘पृथ्वी के सारे निवासस्थानों में से भूमि, (वित्त) जल (तिर्थादि), अग्नि (यज्ञादि) एवं विद्या (ज्ञान) ये चार स्थान मुझे अत्यधिक प्रिय हैं । सत्य, दान, व्रत, मेरा भी निवास रहता है । देवब्राह्मणों से नम्रता के साथ व्यवहार करनेवाला मनुष्य मुझे अत्यधिक प्रिय है ’। लक्ष्मी ने आगे कहा, ‘चोरी, वासना, अपवित्रता, एवं अशांति से मैं अत्यधिक घृणा करती हूँ, जिनके आधिक्य के कारण क्रमश: भूमि, जल अग्नि, एवं विद्या में स्थित मेरे प्रिय निवासस्थानो का मैं त्याग कर देती हूँ । ‘बलि दैत्य ने उच्छिष्टभक्षण किया, एवं देवब्राह्मणों का विरोध किया जिस कारण वह मेरा अत्यंत प्रिय व्यक्ति हो कर भी, आज मैं उसका त्याग कर रही हूँ’ [म. थां. २१]
(३) लक्ष्मी-रुक्मिणीसंवाद---लक्ष्मी के निवासस्थान से संबंधित एक प्रश्न युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा था, जिसका जवाब देते समय भीष्म ने लक्ष्मी एवं रुक्मिणी के दरम्यान हुए एक संवाद की जानकारी युधिष्ठिर को दी [म. अनु. ११] । इस जानकारी के अनुसार, लक्ष्मी ने रुक्मिणी से कहा था, ‘सृष्टि के सारे लोगों में प्रगल्म, भाषणकुशल, दक्ष, निरलस, आस्तिक, अक्रोधन, कृतज्ञ, जितेंद्रिय, वृद्धजनों की सेवा करनेवाले वृद्धसेवक, सत्यनिष्ठ, शांत स्वभाववाले शांत एवं सदाचारी लोग मुझे सब से अधिक प्रिय हैं, जिनके यहाँ रहना मैं विशेष पसंद करती हूँ । ‘निर्लज्ज, कलहप्रिय, निंद्राप्रिय, मलीन, अशांत, एवं असमाधानी लोगों का मैं अतीव तिरस्कार करती हैं, जिस कारण ऐसे लोगों का मैं त्याग करती हूँ’ । महाभारत में अन्यत्र प्राप्त जानकारी के अनुसार, गायें एवं गोबर में भी लक्ष्मी का निवास रहता है [म. अन. ८२]
लक्ष्मी n.  देवासुरो के द्वारा किये गये समुद्रमंथन से, चंद्र के पश्चात लक्ष्मी का अवतार हुआ [म.आ. १६.३४];[ विष्णु. १.८.५];[ भा. ८.८.८];[ पद्म, सृ.४] इस ‘अयोनिज’ देवता को ब्रह्मा ने श्रीविष्णु को प्रदान किया, एवं विष्णु ने इसे पत्नी के रूप में स्वीकार किया । पश्चात यह उसके सन्निध क्षीरसागर में निवास करने लगी । ब्रह्मन के पुत्र भृगु ऋषि की कन्या के रूप में लक्ष्मी पृथ्वीलोक में पुन: अवतीर्ण हुई । इस समय, दक्षकन्या ख्याति इसकी माता थी [विष्णु. १.८] । कालोपरान्त इसका विवाह विष्णु के एक अवतार नारायण से हुआ, जिससे इसे बल एवं उन्माद नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए । ब्रह्मवैवर्त के अनुसार, विष्णु के दक्षिणांग से लक्ष्मी का, एवं वामांग से लक्ष्मी के ही अन्य एक अवतार राधा का जन्म हुआ [ब्रह्मवै. २.४७.४४]
लक्ष्मी n.  विष्णु के वक्षस्थल में लक्ष्मी का निवासस्थान कैसे हुआ, इस संबंध में एक रुपकात्मक कथा पुराणों में प्राप्त है । स्वायंभुव मनु के यज्ञ के समय, ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन तीन देवों में से श्रेष्ठ कौन, इसका निर्णय करने का कार्य भृगु ऋषि पर सौंपा गया । इस संबंध में एवं जाँच लेने के लिए तीनों देवो के पास भृगु स्वयं गया । उस समय, ब्रह्मा एवं शिव ने भृगु का बूरी प्रकार से अपमान किया । केवल विष्णु ने ही भृगु का उचित आदरसत्कार किया, एवं भृगु के द्वारा छाती पर किया गया लत्ताप्रहार भी शांति से स्वीकार कर, उसे ‘श्रीवत्सलांछन’ के रुप में अपने वक्ष:स्थल पर धारण किया [भा. १०.८९.१-१२] । इस कारण, भृगु अत्यधिक प्रसन्न हुआ, एवं उसके द्वारा दिये गये ‘श्रीवत्सलांछन’ के रूप में लक्ष्मी हमेशा के लिए श्रीविष्णु के वक्ष:स्थल पर निवास करने लगी । ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवों से भी भृगु जैसे ब्राह्मण अधिक श्रेष्ठ है, एवं पृथ्वी के लक्ष्मी के जनक भी वे ही है, ऐसा उपर्युक्त रूपकात्मक कथा का अर्थ प्रतीत होता है । साक्षात् श्रीविष्णु को लक्ष्मी प्रदान करनेवाले भृगु ऋषि की इस कथा से ही, ब्राह्मणों की सेवा पूजन आदि से लक्ष्मी प्राप्त होती है, यह जनश्रुति का जन्म हुआ होगा ।
लक्ष्मी n.  एक बार लक्ष्मी ने लक्ष्मीनगर नामक नगर का निर्माण कर, जो इसने अपने पिता भृगु ऋषि को प्रदान किया । कालेपरांत इसने भृगु से वह नगर लौट लेना चाहा, किंतु उसने एक बार प्राप्त हुआ नगर लौट देने से इन्कार कर दिया । इसी संबंध में मध्यस्थता करने के लिए आये हुए श्रीविष्णु की भी भृगु ने एक न सुनी, एवं क्रुद्ध हो कर उसे शाप दिया, ‘पृथ्वी पर दस मानवी अवतार लेने पर तुम विवश होगे’ [पद्म.स. ४] भृगु ऋषि के उपर्युक्त शाप के अनुसार, विष्णु ने पृथ्वी पर दस अवतार लिये । जिन समय लक्ष्मी ने पत्नीधर्म के अनुसार दस अवतार ले कर श्रीविष्णु को साथ दिया ।
लक्ष्मी n.  लक्ष्मी के इन दस अवतारों में निम्नलिखित अवतार प्रमुख है---१. कमलोद्भव लक्ष्मी वामनावतार; २. भूमि परशुरामवातार; सीता रामावतार; ४. रुक्मिणी कृष्णावतार [विष्णु, १.९.१४०-१४१];[ भा. ५.१८.१५,८.८.८] ब्रह्मवैवर्त में लक्ष्मी के अवतार विभिन्न प्रकार से दिये गयें है । वहाँ निर्दिष्ट लक्ष्मीके अवतार, एवं उनके प्रकट होने के स्थान निम्नप्रकार है---१ महालक्ष्मी वैकुंट २. स्वर्गलक्ष्मी स्वर्ग; ३, राधा गोलोक ४. राजलक्ष्मी पाताल, भूलोक; ५. गृहलक्ष्मी गृह ६, सुरभि गोलोक ७. दक्षिणा यज्ञ ८. शोभा (वस्तुमात्र) [ब्रह्मवें, २.३५] । महालक्ष्मी के अवतार में, भृगुऋषि के शाप के कारण, इसे हाथी का शीर्ष प्राप्त हुआ था, जिसे काट कर ब्रह्मा ने इसे महालक्ष्मी नाम प्रदान किया था [स्कंद. ६.८५] । पद्म में गोकुल की भानु ग्वाले की कन्या राधा को भी लक्ष्मी का ही अवतार कहा गया है । राधा जन्म से ही अंधी, गुंगी एवं लूली थी, कितु उसे लक्ष्मी का अवतार जान कर, नारद ने उसका दर्शन लिया था [पद्म. पा. ७१]
लक्ष्मी n.  ब्रह्म में लक्ष्मी एवं दरिद्रता अलक्ष्मी के दरम्यान हुआ एक कल्पनारम्य संवाद प्राप्त है. जो गोदाबरी नदी के तट पर स्थित लक्ष्मीतीर्थ का माहात्म्य बताने के लिए दिया गया है [ब्रह्म.१३७] इस संवाद में लक्ष्मी की अत्यंत कठोर शब्दों में निर्भर्त्सना की गई है । एक बार लक्ष्मी एवं अलक्ष्मी के दरम्यान श्रेष्ठ कौन इस संबंध में संवाद हुआ था । इस समय लक्ष्मी ने अपना श्रेष्ठत्व बताते हुए कहा, ‘मैं जिसके साथ रहूँ. उसका इस संसार में सर्वत्र सत्कार होता है, एवं मेरे अनुपस्थिति में निर्धन एवं याचक लोगों की सर्वत्र अबहेलना होती है । इस दुर्गति से शिव जैसा देवाधिदेव भी न बच सका, जिस कारण उसकी सर्वत्र उपेक्षा एवं अवहेलना हुई’। इस पर लक्ष्मी के दोष बताते हुए अलक्ष्मी ने कहा, ‘तुम सदैव पापी, विश्वासघाती, एवं दुराचारी लोगों में रहती हो, तथा मद्य से भी अधिक अनर्थ पैसा करती हो । राजाश्रित, पाणी, खल, निष्ठुर, लोभी एवं कायर लोगों के घर तुम्हारा निवास रहता है, एवं अनार्य, कृतघ्न, धर्मघातकी, मित्रद्रोही एवं अविचारी लोगों से तुम्हारी उपासना की जाती है’। अलक्ष्मी ने आगे कहा, ‘मेरा निवास धर्मशील. पापभीरू, कृतज्ञ, विद्वान् एवं साधु लोगों में रहता है, एवं पवित्र ब्राह्मण, संन्यासी एवं ध्येयनिष्ठ लोगो से मेरी उपासना की जाती है । इसी कारण काम, क्रोध, औद्धत्य आदि तामसी विकारों को मैं दूर रखती हूँ, एवं अपने भक्तों को मुक्ति प्रदान करती हूँ’ [ब्रह्म. १३७] भर्तृहरि के अनुसार, उपर्युक्त संवाद में लक्ष्मी एवं अलक्ष्मी का संकेत संपन्नता एवं दरिद्रता से नही, किन्तु लक्ष्मी की तामस उपासना करनेवाले बुभुक्षित लोग एवं दरिद्रता में ही तृप्त रहनेवाले सात्विक लोगों की ओर अभिप्रेत है ।
लक्ष्मी n.  विष्णु से इसे बल एवं उन्माद नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए थे । श्रीसूक्त में इसके निम्नलिखित पुत्रों का निर्देश प्राप्त है---आनंद, कर्दम, श्रीद और चिक्लित । इसके धातृ एवं विधातृ नामक दो भाई भी थे, जो इसीके तरह भृगु ऋषि एवं ख्याति के पुत्र थे ।
लक्ष्मी n.  इन सूक्तो में निम्नलिखित दो ग्रंथ प्रमुख माने जाते हैं---१. श्रीसूक्त [ऋ. परि.११] २. इंद्रकृत लक्ष्मीस्तोत्र, जो विष्णु पुराण मे प्राप्त है [विष्णु १.९.११५-१३७]
लक्ष्मी II. n.  दक्ष प्रजापति की एक कन्या, जो धर्मप्रजापति की पत्नी थी [म. आ. ६०-१३]
लक्ष्मी III. n.  वीर नामक ब्राह्मण की पत्नी, जो अपने पूर्वजन्म में तोण्डमान नामक राजा की पद्या नामक पत्नी थी (भीम. २४. देखिये)

Puranic Encyclopaedia  | en  en |   | 
LAKṢMĪ I   Consort of Mahāviṣṇu.
1) Origin.
Devī originated from the left side of Paramātmā (Supreme Being). The beautiful Devī by a command from the Supreme Being divided herself into two enchanting damsels both equal in figure, splendour, age, majesty, adornment and love. One of these was Lakṣmīdevī and the other Rādhādevī. That born of the left was Ramā and that of the right, Rādhā. Rādhā wedded herself to the two-handed Śrī Kṛṣṇa and Lakṣmī also wanted the same person and so Bhagavān himself became two, Śri Kṛṣṇa from the left side as a two-handed person and as four-handed Viṣṇu from the right side. [9th Skandha. Devī Bhāgavata].
2) Different incarnations of Lakṣmī.
Lakṣmī had many incarnations and she had been on earth in different forms at different times. They are given below:
(i) Birth from the ocean of milk.
Once the Devas became aged and afflicted with rugosity and grey hairs by a curse of Durvāsas. Indra lost his majesty and was ousted from Svarga. Svargalakṣmī deserted Devaloka and went to Vaikuṇṭha and merged with Mahālakṣmī. The Devas were greatly aggrieved on account of this plight of theirs and they went to Satyaloka and appealed to Brahmā to find a solution to their difficulties. Brahmā was helpless in the matter and so they all together went to Vaikuṇṭha and represented their grievances before Mahāviṣṇu. Viṣṇu smiled and told Mahālakṣmī thus: “You go and be born as Kṣīrasāgarakanyakā using a part of your inherent power and do give relief to the Devas.” Accordingly when the Devas conducted the churning of the ocean of milk (Kṣīrābdhimathana) Mahālakṣmī, the goddess of beauty, wealth and prosperity arose from the ocean as Kṣīrasāgarakanyakā (Daughter of the ocean of milk) and blessed the Devas and put a Vanamālā (garland of wild flowers) on Mahāviṣṇu. The Devas got back all their lost wealth and prosperity and they, on going to Devaloka, worshipped Lakṣmīdevī properly. [9th Skandha, Devī Bhāgavata].
(ii) Mahālakṣmī was born as a mare. (See under Ekavīra, Para 2).
(iii) Mahālakṣmī was born as the Tulasī plant (Holy Basil. (See under Tulasī.)
(iv) Mahālakṣmī was born as Sītā and Vedavatī. (See under Sītā).
(v) Other births:
Mahālakṣmī was born as a daughter to the sage Bhṛgu of Khyāti. When Mahāviṣṇu incarnated as Sūrya, Lakṣmī rose up from the lotus. When Viṣṇu became Paraśurāma, Lakṣmī became the earth. When Mahāviṣṇu incarnated as Śrī Rāma, Lakṣmī became Sītā and when Viṣṇu was born as Kṛṣṇa Lakṣmī became Rādhā. Thus whenever and wherever Mahāviṣṇu changed his form, Mahālakṣmī also changed hers to form part of the changed life. [Chapter 9, Aṁśa 1, Viṣṇu Purāṇa].
3) Mahālakṣmī cursed Viṣṇu.
Once Mahālakṣmī cursed Mahāviṣṇu, her husband, that his head would drop off from his body. (See under Cital).
4) Two forms of Lakṣmī.
Mahālakṣmī has two forms, Viṣṇu-priyā Lakṣmī and Rājyalakṣmī. The former is the embodiment of chastity and virtuousness. The latter goes about courting Kings. Rājyalakṣmī is fickle and unsteady. This Lakṣmī enters all places where virtue and charity are found and as soon as these two vanish from any place Rājyalakṣmī will also vanish from that place.
5) Lakṣmī in cow-dung.
The people of Bhārata consider cow dung as very sacred and there is a story in the 82nd Chapter of Anuśāsana Parva as to how cow-dung became so sacred; Once a herd of cows was grazing in a large grassy ground when Lakṣmī happened to pass that way. Mahālakṣmī was pleased at the cows and bade them ask for any boon they wanted. The cows were prosperity incarnate and contented and they rejected the offer of Lakṣmī and when pressed again by her, said that they would like to have prosperity deposited in their dung also. Mahālakṣmī did so and so even today it is believed that the cowdung is embedded with prosperity. 6). Other details:
(i) Lakṣmī stays in the court of Kubera. [Śloka 19, Chapter 10, Sabhā Parva].
(ii) Mahālakṣmī is installed in temples as an idol carrying a lotus in her right hand and a Bilva fruit in her left hand. [Chapter 50, Agni Purāṇa].
(iii) Lakṣmīdevī stays in the court of Brahmā also. [Śloka 41, Chapter 11, Sabhā Parva].
LAKṢMĪ II   A daughter of Dakṣaprajāpati. She was married to Dharmadeva. [Śloka 14, Chapter 66, Ādi Parva].

Aryabhushan School Dictionary | mr  en |   | 
 f  The wife of विष्णु. Fortune. Beauty लक्ष्मीचा होरा The season of prosperity.

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लक्ष्मी   लक्ष्मी नामाभिधान, दर्शन जाहल्या न मिळे अन्न   ऐरावती लक्ष्मी   नांव लक्ष्मी व गवर्‍या वेची   नांव लक्ष्मी व गोर्‍या वेची   लक्ष्मी पुसेना शंखाला, तो भीक मागे पोटाला   अमरसिंग तो मरगये भीक मागे धनपाळ । लक्ष्मी तो गांवर्‍या वेंची भलेबिचारे ठणठणपाळ ॥   लक्ष्मी मोरीवाटें येणें   अंतरंग लक्ष्मी   चिंतासे चतुराई घटे, दुःखसे घटे शरीर। पापसे घटे लक्ष्मी, कहे दास कबीर।।   लक्ष्मी अवतरणें   द्रव्याचा उपभोग घेत नाहीं, त्यास लक्ष्मी शोभत नाहीं   हात फिरे, तेथें लक्ष्मी ठरे   लक्ष्मी आली घरा, तडका आड करा   हात फिरे, तेथें लक्ष्मी फिरे   कडक लक्ष्मी   जेथें मनुष्‍य तेथें द्रव्य, द्रव्य तेथें लक्ष्मी, लक्ष्मी तेथें परमानंद   आधीं बुद्धि जाते मग लक्ष्मी जाते   खपेल त्‍याचें शेत, जपेल त्‍याची लक्ष्मी व भारील त्‍याची तलवार   बळेंच करणी करावी अन्‍ ओढून लक्ष्मी आणावी   साहसाशिवाय लक्ष्मी मिळत नाहीं   आधीं बुद्धि जाते, मग लक्ष्मी   अगुणिया स्तव न करी, लक्ष्मी जरी त्याचे घरीं पाणी भरी   अचाट बुद्धि चालवावी (खेळवावी) आणि बळेंच लक्ष्मी मिळवावी   धाडसाला लक्ष्मी वश   नांव लक्ष्मी, वेंचिते गोवर्‍या   हात फिरे तेथें लक्ष्मी फिरे व तोंड फिरे तेथें अवदसा फिरे   जेथे फिरे केरसुणी, तेथें वावरे लक्ष्मी   उद्योग्याचे घरीं, लक्ष्मी नांदे परोपरी   उपभोग घेतो त्याची लक्ष्मी, संग्रही ठेवतां न पडे कामीं   आली ती लक्ष्मी, गेली ती बला   अचाट बुद्धि चालवावी (खेळवावी) आणि बळेंच लक्ष्मी मागवावी   गतश्री लक्ष्मी   आली ती लक्ष्मी गेलें ते पाप   आयत्या द्रव्यावर लक्ष्मी नारायण   जेथे केरसुणी फिरे, तेथें लक्ष्मी ठरे   अचाट बुद्धि चालवावी (खेळवावी) आणि बळेंच लक्ष्मी मेळवावी   अक्कल बडी कां लक्ष्मी (म्हैस) बडी   आधी जाते बुद्धि, मग जाते लक्ष्मी   अभ्यास करील त्याची विद्या, जपेल त्याची लक्ष्मी, खपेल त्याचें शेत व मारील त्याची तलवार   
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