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पदे ५१ ते ६०

श्रीकृष्णाचीं पदें - पदे ५१ ते ६०

मध्वमुनीश्वरांची कविता


श्रीकृष्णाचीं पदें - पदे ५१ ते ६०
पद ५१
करुणानिधान गे आणी गे ॥ध्रु०॥
व्रजराज आज लाज । राखो भगवान गे ॥१॥
स्मरबाण जाण प्राण । घेतो अवदान गे ॥२॥
उठी जाय माय काय । पाहासि निदान गे ॥३॥
मध्वनाथ घातपात वारील अदान गे ॥४॥

पद ५२ वें
तो मज दावा जिवलग मेघश्याम ॥ध्रु०॥
हरिविण मजला क्षणहि न कंठे वाटे सर्व विराम ॥ आठवितें मनमोहन याचें रूप सुखाचें धाम ॥१॥
मध्वमुनीश्वर निशिदिनिं ज्याचें गातो केवळ नाम ॥ तो जरि येउनि भेटेल मजला पुरविल सकळहि काम ॥२॥

पद ५३ वें
सये बाई आणी यादवराय । सजणी वंदीन तुझे पाय ॥ध्रु०॥
वसनविभूषणभार न सोसे । चंदन लाउनि काय ॥१॥
हरिविरहानल जाळी मजला । स्मरशर मारी घाय ॥२॥
मध्वमुनीश्वरवरद न ये तरि । त्याविण जीव हा जाय ॥३॥

पद ५४ वें
हा रे कान्हा तुजविण मजलागीं आजि गमेना ॥ध्रु०॥
मंद सुगंध समीर शरीरा । लागतांचि विरहाचा दाह शमेना ॥१॥
जाई जुई चंपक सेंवती मालती । सुमनाचे सेजेवरी जीव रमेना ॥२॥
मध्वनाथा वरदा सखया ये । काय करूं तळमळितें करमेना ॥३॥

पद ५५ वें
कृष्ण म्हणे पिके वेगीं प्राणसखीला आण ॥ध्रु०॥
प्राणाची ही प्राणसखी राधिका वो । तिची मला आहे आण वो वो ॥१॥
माझी तिला आण घाली साजणी वो । नाहीं विरहायेवढी हानि वो वो ॥२॥
आपल्या हातें वेणीफणी घाली तीची । पहिलें मोगरेलें न्हाणी वो वो ॥३॥
मध्वनाथस्वामी म्हणे आवडिनें । माझी चिद्रत्नाची खाणी वो वो ॥४॥

पद ५६ वें
सये आतां चाल वो । बोलावितो नंदलाल ॥ध्रु०॥
वृंदावनीं अवल जागा बागशाई । तेथें जालाहे बेहाल वो ॥१॥
मध्वनाथस्वामीसवें रंगता वो । राधे होसील न्याहाल वो ॥२॥

पद ५७ वें
मनमोहन कोठें सांपडे वो । बाई अर्ध घटिका गे ॥१॥
गंगातीरीं जाउनि राहणें । सेउनी पंचवटिका गे ॥२॥
दासी केली मुख्य विलासिने । ऐसें त्याला हटका गे ॥३॥
मथुरेमध्यें मानत होती । कंसाचिया कटका गे ॥४॥
मोहीत केला तिनें देउनी । अधरामृतरसघुटका गे ॥५॥
कुब्जेपासुनि आतां कैसी । होइल हरिची सुटका गे ॥६॥
उद्धव घेऊनि आला शाहाणा । कागदाचा कुटका गे ॥७॥
कागद पाहातां बरवें कळलें । लोभ हरीचा लटका गे ॥८॥
मध्वमुनीश्वरस्वामी दयानिधी । तोडुनि गेला तटका गे ॥९॥
ऐसें कळतें मजला तरि मी । धरितें त्याचा पटका गे ॥१०॥

पद ५८ वें
काय करावा योग सजणी ॥ध्रु०॥
यादवरायें कागद लिहिला । केवढा आमुचा भोग ॥१॥
रेचक पूरक कुंभक करितां । अंगीं जडती रोग ॥२॥
गंगातीरीं कूप करावा । सांडुनि निर्मळ बोध ॥३॥
मध्वमुनीश्वर म्हणतो त्याचा । कोणासि उपयोग ॥४॥

पद ५९ वें
नवरा नवरीजोगा । घटीत आलें योगा ॥ कपाळाच्या भोगा । गांठी पडली दोघां ॥ध्रु०॥
विद्री बाबरसोटी । चिपडि निबर मोठी ॥ कृष्णें धरिली पाठीं । वेडि आवड मोठी ॥१॥
धन्य कुब्जाराणी । तिला प्रसन्न मायाराणी ॥ जिची कीर्ति पुराणीं । पुरली तिची शिराणी ॥२॥
कुब्जा नवी तरणी । तिनें याला केली करणीं ॥ मध्वमुनीश्वरचरणीं । जडली जैसी धरणी ॥३॥

पद ६० वें
बाईये गे मथुरेमध्यें सांवळा श्रीहरि नांदो । कुब्जा घेउनि चिपडी चांदो ॥१॥
बाईये गे बिजवर नवरी वाढत कैसी होती । चंद्रासहित चंद्रज्योती ॥२॥
बाईये गे आइती याला बायको घरभर जाली । अक्षता लाउनी घरा आली ॥३॥
बाइये गे आमुचा त्याला उपजला होता वीत । धरिला मथुरे मार्ग नीट ॥४॥
बाईये गे हिरव्या चार्‍यावर पडें होतें गुरूं । याचें नवल काय करूं ॥५॥
बाईये गे आयितें तिनें वाटुनी ठेविलें भाणें । याला होईल पालटवाणें ॥६॥
बाईये गे आम्ही घुरटा गौळणी गोपीबाळा । साजुक चंपकमाळा ॥७॥
बाईये गे याचे हातीं कांकण कोण्ही बांधो । याची सोयरिक तेथें सांदो ॥८॥
बाईये गे मध्वनाथस्वामी तो केवळ भोळा । वरील नोवर्‍या सहस्रसोळा ॥९॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2017-05-27T21:38:51.1130000

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पूरु II.

  • n. ‘पौरववंश’ की स्थापना करनेवाला सुविख्यात राजा, जो महाभारत के अनुसार, ययाति राजा के पॉंच पुत्रों में से एक था । ययाति राजा के शेष चार पुत्रों के नाम इस प्रकार थेः---अनु, द्रुहयु, यदु एवं तुर्वशु [म.आ.१.१७६२] । ययाति राजा एवं उनके पॉंच पुत्रों का निर्देश ऋग्वेद में भी प्राप्त है, किन्तु वहॉं ययाति एक ऋषि एवं सूक्तद्रष्टा बताया गया है, एवं अनु, द्रुह्या, यदु, तुर्वशु तथा पूरु का निर्देश स्वतंत्र जातियों के नाते से किया गया है । ‘वैदिक इंडेक्स’ के अनुसार, ऋग्वेद की जानकारी अधिक ऐतिहासिक है, एवं महाभारत तथा पुराणों में दी गयी जानकारी गलत है [वै.इ.२.१८७] । महाभारत के अनुसार, यह ययाति राजा को शर्मिष्ठा के गर्भ से उत्पन्न हुआ था [म.आ.७०.३१] । इसकी राजधानी प्रतिष्ठान नगर में थी । यह अपने पिता के सभी पुत्रो में कनिष्ठ था । किंतु इसने ययाति की जरावस्था लेकर उसे अपनी तारुण्य प्रदान किया था [म.आ.७०.४१] । इस उदारता एवं पितृभक्ति से प्रसन्न होकर, कनिष्ठ होकर भी, ययाति ने इसे अपना समस्त राज्य दे दिया, एवं इसे ‘सार्वभौम राज्यभिषेक’ करवाया । इसके राज्याभिषेक के समय, समाजनों से दृढतापूर्वक कहा, ‘जो पिता की आज्ञा का पालन करता है वहीं उसका वास्तविक पुत्र है, एवं उसे ही राज्याधिकार मिलना चाहिये’। अन्त में ययाति के आदेशानुसार, पूरु का राज्याभिषेक किया गया । इसके अन्य भाइयों को भी राज्य प्रदान किये गये, पर अपने पिता का ‘सार्वभौत्त्व’ पूरु को ही प्राप्त हुआ [भा.९.१९,२३] । सुविख्यात ‘पूरुवंश’ की स्थापना इसने की । इस कारण इसे ‘वंशकर’ भी कहा गया है [म.आ.७०.४५] । कालांतर में, विषयोपभोग से ऊबकर, ययाति ने पूरु का तारुण्य वापस कर दिया [ह.वं.१.३.३६];[ मत्स्य. ३२];[ ब्रह्म.१२];[ वायु.९३.७५];[ विष्णु.४.१०-१६] । महाभारत में पूरु को ‘पुण्यश्लोक’ राजा कहा गया है । यह मॉंसभक्षण का निषेध कर, परावर-तत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर चुका था [म.अनु.११५.५९] । यह यमसभा में रहकर यम की उपासना करता था [म.स.८.८] 
  • पुत्र n. पूरु के कौसल्या तथा पौष्टी नामक दो पत्नियॉं थी । कौसल्या से इसे जनमेजय, तथा पौष्टी से प्रवीर, ईश्वर, तथा रोदाश्व नामक पुत्र हुए । इसके पुत्रो में से जनमेजय वीर एवं प्रतापी था, अतएव वही इसके पश्चात् राजगद्दी का अधिकारी हुआ [म.आ.९०.११] । महाभारत में अन्यत्र, ‘पौष्टी’ कौसल्या का ही नामांतर माना गया है, एवं जनमेजय तथा प्रवीर एक ही व्यक्ति मान कर प्रवीर को ‘वंशकर’ कहा गया है [म.आ.८९.५] । भागवत में प्रवीर को पूरु का नाती कहा गया है [भा.९.२०.२] 
  • पूरुवंश n. पूरु ने सुविख्यात पूरुवंश की स्थापना की । इसलिये इसके वंशज ‘पौरव’ कहलाते है, एवं उनकी विस्तृत जानकारी आठ पुराणों एवं महाभारत में प्राप्त है । [वायु.९९.१२०];[ ब्रह्म. १३.२-८];[ ह.वं.१.२०.३१-३२];[ मस्त्य ४९.१];[ विष्णु.४.१९. ];[भा.९.२०-२१];[ अग्नि.२७८. १];[ गरुड. १.१३९];[ म.आ.८९-९०] । पूरुवंश के तीन प्रमुख विभाग माने जाते हैः---१ (सो.पूरु)-पूरु से लेकर अजमीढ तक के राजा इस विभाग में समाविष्ट किये जाते हैः २. (सो. ऋक्ष) अजमीढ से लेकर कुरु तक के राजा इस विभाग में समाविष्ट होते हैः ३. (सो.कुरु)---कुरु से ले कर पांडवों तक के राज इस विभाग में आते हैं । पूरुवंश के अजमीढ राजा को नील, बृहद्विषु एवं ऋक्ष नामक तीन पुत्र थे । इनमें से ऋक्ष हस्तिनापुर के राजगद्दी पर बैठा । नील एवं बृहदिषु ने उत्तर एवं दक्षिण पांचाल के स्वतंत्र राज्य स्थापित किये । ऋक्ष राजा के वंश में से कुरु राजा ने सुविख्यात कुरु वंश की स्थापना की । कुरु राजा को जह्रु, परीक्षित् एवं सुधन्वन् नामक तीन पुत्र । उनमें से जह्रु, कुरु राजा का उत्तराधिकारी बना, एवं उसने हस्तिनापुर का कुरुवंश आगे चलाया । सुधन्वन् का वंशज वसु ने चेदि एवं मगध में स्वतंत्र राजवंश की स्थापना की । परिक्षित् का पुत्र जनमेजय (दूसरा) ने गार्ग्य ऋषि के पुत्र का अपमान किया, जिस कारण गार्ग्य ने उसे शाप दिया । उस शाप के कारण, उसका एवं उसके श्रुतसेन, उग्रसेन एवं भीमसेन नामक पुत्रों का राज्याधिकार नष्ट हो गया । जह्रु राजा का पुत्र सुरथ था सुरथ से ले कर अभिमन्यु तक की वंशावलि पुराणों एवं महाभारत में विस्तार से दी गयी है । 
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