मराठी मुख्य सूची|मराठी साहित्य|मराठी संत साहित्य|संत श्रीरोहिदासांची पदे|संत रोहिदास कविता| ३१ ते ४० संत रोहिदास कविता १ ते १० ११ ते २० २१ ते ३० ३१ ते ४० संत रोहिदास कविता - ३१ ते ४० संत रोहिदास (इ.स. १३७६ - इ.स. १५२७) हे मध्ययुगीन भारतातील हिंदू संत होते. यांच्या गुरूंचे नाव रामानंद स्वामी होते. कबीर यांचे समकालीन होत; तर मीराबाई यांच्या शिष्या होत्या. Tags : abhangdohemarathirohidasअभंगदोहेमराठीरोहिदास संत रोहिदास कविता - ३१ ते ४० Translation - भाषांतर ३१. जे ओहु अठसठि तीर्थ न्हावैजे ओहु अठसठि तीर्थ न्हावै ॥जे ओहु दुआदस सिला पूजावै ॥जे ओहु कूप तटा देवावै ॥करै निंद सभ बिरथा जावै ॥१॥साध का निंदकु कैसे तरै ॥सरपर जानहु नरक ही परै ॥१॥ रहाउ ॥जे ओहु ग्रहन करै कुलखेति ॥अरपै नारि सीगार समेति ॥सगली सिम्रिति स्रवनी सुनै ॥करै निंद कवनै नही गुनै ॥२॥जे ओहु अनिक प्रसाद करावै ॥भूमि दान सोभा मंडपि पावै ॥अपना बिगारि बिरांना सांढै ॥करै निंद बहु जोनी हांढै ॥३॥निंदा कहा करहु संसारा ॥निंदक का परगटि पाहारा ॥निंदकु सोधि साधि बीचारिआ ॥कहु रविदास पापी नरकि सिधारिआ ॥४॥३२. पड़ीऐ गुनीऐ नामु सभु सुनीऐ अनभउ भाउ न दरसैपड़ीऐ गुनीऐ नामु सभु सुनीऐ अनभउ भाउ न दरसै ॥लोहा कंचनु हिरन होइ कैसे जउ पारसहि न परसै ॥१॥देव संसै गांठि न छूटै ॥काम क्रोध माइआ मद मतसर इन पंचहु मिलि लूटे ॥१॥ रहाउ ॥हम बड कबि कुलीन हम पंडित हम जोगी संनिआसी ॥गिआनी गुनी सूर हम दाते इह बुधि कबहि न नासी ॥२॥कहु रविदास सभै नही समझसि भूलि परे जैसे बउरे ॥मोहि अधारु नामु नाराइन जीवन प्रान धन मोरे ॥३॥३३. ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करैऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै ॥गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै ॥१॥ रहाउ ॥जा की छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढरै ॥नीचह ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै ॥१॥नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै ॥कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरि जीउ ते सभै सरै ॥२॥१॥११०६॥३४. सुख सागर सुरितरु चिंतामनि कामधेन बसि जा के रेसुख सागर सुरितरु चिंतामनि कामधेन बसि जा के रे ॥चारि पदार्थ असट महा सिधि नव निधि कर तल ता कै ॥१॥हरि हरि हरि न जपसि रसना ॥अवर सभ छाडि बचन रचना ॥१॥ रहाउ ॥नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अछर माही ॥बिआस बीचारि कहिओ परमारथु राम नाम सरि नाही ॥२॥सहज समाधि उपाधि रहत होइ बडे भागि लिव लागी ॥कहि रविदास उदास दास मति जनम मरन भै भागी ॥३॥३५. खटु करम कुल संजुगतु है हरि भगति हिरदै नाहिखटु करम कुल संजुगतु है हरि भगति हिरदै नाहि ॥चरनारबिंद न कथा भावै सुपच तुलि समानि ॥१॥रे चित चेति चेत अचेत ॥काहे न बालमीकहि देख ॥किसु जाति ते किह पदहि अमरिओ राम भगति बिसेख ॥१॥ रहाउ ॥सुआन सत्रु अजातु सभ ते क्रिस्न लावै हेतु ॥लोगु बपुरा किआ सराहै तीनि लोक प्रवेस ॥२॥अजामलु पिंगुला लुभतु कुंचरु गए हरि कै पासि ॥ऐसे दुरमति निसतरे तू किउ न तरहि रविदास ॥३॥३६. बिनु देखे उपजै नही आसाबिनु देखे उपजै नही आसा ॥जो दीसै सो होइ बिनासा ॥बरन सहित जो जापै नामु ॥सो जोगी केवल निहकामु ॥१॥परचै रामु रवै जउ कोई ॥पारसु परसै दुबिधा न होई ॥१॥ रहाउ ॥सो मुनि मन की दुबिधा खाइ ॥बिनु दुआरे त्रै लोक समाइ ॥मन का सुभाउ सभु कोई करै ॥करता होइ सु अनभै रहै ॥२॥फल कारन फूली बनराइ ॥फलु लागा तब फूलु बिलाइ ॥गिआनै कारन करम अभिआसु ॥गिआनु भइआ तह करमह नासु ॥३॥घ्रित कारन दधि मथै सइआन ॥जीवत मुकत सदा निरबान ॥कहि रविदास परम बैराग ॥रिदै रामु की न जपसि अभाग ॥४॥३७. तुझहि सुझंता कछू नाहितुझहि सुझंता कछू नाहि ॥पहिरावा देखे ऊभि जाहि ॥गरबवती का नाही ठाउ ॥तेरी गरदनि ऊपरि लवै काउ ॥१॥तू कांइ गरबहि बावली ॥जैसे भादउ खूमबराजु तू तिस ते खरी उतावली ॥१॥ रहाउ ॥जैसे कुरंक नही पाइओ भेदु ॥तनि सुगंध ढूढै प्रदेसु ॥अप तन का जो करे बीचारु ॥तिसु नही जमकंकरु करे खुआरु ॥२॥पुत्र कलत्र का करहि अहंकारु ॥ठाकुरु लेखा मगनहारु ॥फेड़े का दुखु सहै जीउ ॥पाछे किसहि पुकारहि पीउ पीउ ॥३॥साधू की जउ लेहि ओट ॥तेरे मिटहि पाप सभ कोटि कोटि ॥कहि रविदास जु जपै नामु ॥तिसु जाति न जनमु न जोनि कामु ॥४॥३८. नागर जनां मेरी जाति बिखिआत चमारंनागर जनां मेरी जाति बिखिआत चमारं ॥रिदै राम गोबिंद गुन सारं ॥१॥ रहाउ ॥सुरसरी सलल क्रित बारुनी रे संत जन करत नही पानं ॥सुरा अपवित्र नत अवर जल रे सुरसरी मिलत नहि होइ आनं ॥१॥तर तारि अपवित्र करि मानीऐ रे जैसे कागरा करत बीचारं ॥भगति भागउतु लिखीऐ तिह ऊपरे पूजीऐ करि नमसकारं ॥२॥मेरी जाति कुट बांढला ढोर ढोवंता नितहि बानारसी आस पासा ॥अब बिप्र प्रधान तिहि करहि डंडउति तेरे नाम सरणाइ रविदासु दासा ॥३॥३९. हरि जपत तेऊ जना पदम कवलास पति तास सम तुलि नही आन कोऊहरि जपत तेऊ जना पदम कवलास पति तास सम तुलि नही आन कोऊ॥एक ही एक अनेक होइ बिसथरिओ आन रे आन भरपूरि सोऊ ॥ रहाउ ॥जा कै भागवतु लेखीऐ अवरु नही पेखीऐ तास की जाति आछोप छीपा ॥बिआस महि लेखीऐ सनक महि पेखीऐ नाम की नामना सपत दीपा ॥१॥जा कै ईदि बकरीदि कुल गऊ रे बधु करहि मानीअहि सेख सहीद पीरा ॥जा कै बाप वैसी करी पूत ऐसी सरी तिहू रे लोक परसिध कबीरा ॥२॥जा के कुट्मब के ढेढ सभ ढोर ढोवंत फिरहि अजहु बंनारसी आस पासा ॥आचार सहित बिप्र करहि डंडउति तिन तनै रविदास दासान दासा ॥३॥२॥१२९३॥४०. मिलत पिआरो प्रान नाथु कवन भगति तेमिलत पिआरो प्रान नाथु कवन भगति ते ॥साधसंगति पाई परम गते ॥ रहाउ ॥मैले कपरे कहा लउ धोवउ ॥आवैगी नीद कहा लगु सोवउ ॥१॥जोई जोई जोरिओ सोई सोई फाटिओ ॥झूठै बनजि उठि ही गई हाटिओ ॥२॥कहु रविदास भइओ जब लेखो ॥जोई जोई कीनो सोई सोई देखिओ ॥३॥ N/A References : N/A Last Updated : September 07, 2026 Comments | अभिप्राय Comments written here will be public after appropriate moderation. Like us on Facebook to send us a private message. TOP