संत रोहिदास कविता - २१ ते ३०

संत रोहिदास (इ.स. १३७६ - इ.स. १५२७) हे मध्ययुगीन भारतातील हिंदू संत होते. यांच्या गुरूंचे नाव रामानंद स्वामी होते. कबीर यांचे समकालीन होत; तर मीराबाई यांच्या शिष्या होत्या.


२१.
चमरटा गांठि न जनई
चमरटा गांठि न जनई ॥
लोगु गठावै पनही ॥१॥ रहाउ ॥
आर नही जिह तोपउ ॥
नही रांबी ठाउ रोपउ ॥१॥
लोगु गंठि गंठि खरा बिगूचा ॥
हउ बिनु गांठे जाइ पहूचा ॥२॥
रविदासु जपै राम नामा ॥
मोहि जम सिउ नाही कामा ॥३॥
२२.
हम सरि दीनु दइआलु न तुम सरि अब पतीआरु किआ कीजै
हम सरि दीनु दइआलु न तुम सरि अब पतीआरु किआ कीजै ॥
बचनी तोर मोर मनु मानै जन कउ पूरनु दीजै ॥१॥
हउ बलि बलि जाउ रमईआ कारने ॥
कारन कवन अबोल ॥ रहाउ ॥
बहुत जनम बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुम्हारे लेखे ॥
कहि रविदास आस लगि जीवउ चिर भइओ दरसनु देखे ॥२॥१॥६९४॥
२३. चित सिमरनु करउ नैन अविलोकनो स्रवन बानी सुजसु पूरि राखउ
चित सिमरनु करउ नैन अविलोकनो स्रवन बानी सुजसु पूरि राखउ ॥
मनु सु मधुकरु करउ चरन हिरदे धरउ रसन अमृत राम नाम भाखउ ॥१॥
मेरी प्रीति गोबिंद सिउ जिनि घटै ॥
मै तउ मोलि महगी लई जीअ सटै ॥१॥ रहाउ ॥
साधसंगति बिना भाउ नही ऊपजै भाव बिनु भगति नही होइ तेरी ॥
कहै रविदासु इक बेनती हरि सिउ पैज राखहु राजा राम मेरी ॥२॥
२४.
नाथ कछूअ न जानउ
नाथ कछूअ न जानउ ॥
मनु माइआ कै हाथि बिकानउ ॥१॥ रहाउ ॥
तुम कहीअत हौ जगत गुर सुआमी ॥
हम कहीअत कलिजुग के कामी ॥१॥
इन पंचन मेरो मनु जु बिगारिओ ॥
पलु पलु हरि जी ते अंतरु पारिओ ॥२॥
जत देखउ तत दुख की रासी ॥
अजौं न पत्याइ निगम भए साखी ॥३॥
गोतम नारि उमापति स्वामी ॥
सीसु धरनि सहस भग गांमी ॥४॥
इन दूतन खलु बधु करि मारिओ ॥
बडो निलाजु अजहू नही हारिओ ॥५॥
कहि रविदास कहा कैसे कीजै ॥
बिनु रघुनाथ सरनि का की लीजै ॥६॥
२५.
सह की सार सुहागनि जानै
सह की सार सुहागनि जानै ॥
तजि अभिमानु सुख रलीआ मानै ॥
तनु मनु देइ न अंतरु राखै ॥
अवरा देखि न सुनै अभाखै ॥१॥
सो कत जानै पीर पराई ॥
जा कै अंतरि दरदु न पाई ॥१॥ रहाउ ॥
दुखी दुहागनि दुइ पख हीनी ॥
जिनि नाह निरंतरि भगति न कीनी ॥
पुर सलात का पंथु दुहेला ॥
संगि न साथी गवनु इकेला ॥२॥
दुखीआ दरदवंदु दरि आइआ ॥
बहुतु पिआस जबाबु न पाइआ ॥
कहि रविदास सरनि प्रभ तेरी ॥
जिउ जानहु तिउ करु गति मेरी ॥३॥
२६.
जो दिन आवहि सो दिन जाही
जो दिन आवहि सो दिन जाही ॥
करना कूचु रहनु थिरु नाही ॥
संगु चलत है हम भी चलना ॥
दूरि गवनु सिर ऊपरि मरना ॥१॥
किआ तू सोइआ जागु इआना ॥
तै जीवनु जगि सचु करि जाना ॥१॥ रहाउ ॥
जिनि जीउ दीआ सु रिजकु अम्मबरावै ॥
सभ घट भीतरि हाटु चलावै ॥
करि बंदिगी छाडि मै मेरा ॥
हिरदै नामु सम्हारि सवेरा ॥२॥
जनमु सिरानो पंथु न सवारा ॥
सांझ परी दह दिस अंधिआरा ॥
कहि रविदास निदानि दिवाने ॥
चेतसि नाही दुनीआ फन खाने ॥३॥
२७.
ऊचे मंदर साल रसोई
ऊचे मंदर साल रसोई ॥
एक घरी फुनि रहनु न होई ॥१॥
इहु तनु ऐसा जैसे घास की टाटी ॥
जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी ॥१॥ रहाउ ॥
भाई बंध कुट्मब सहेरा ॥
ओइ भी लागे काढु सवेरा ॥२॥
घर की नारि उरहि तन लागी ॥
उह तउ भूतु भूतु करि भागी ॥३॥
कहि रविदास सभै जगु लूटिआ ॥
हम तउ एक रामु कहि छूटिआ ॥४॥
२८.
दारिदु देखि सभ को हसै ऐसी दसा हमारी
दारिदु देखि सभ को हसै ऐसी दसा हमारी ॥
असट दसा सिधि कर तलै सभ क्रिपा तुमारी ॥१॥
तू जानत मै किछु नही भव खंडन राम ॥
सगल जीअ सरनागती प्रभ पूरन काम ॥१॥ रहाउ ॥
जो तेरी सरनागता तिन नाही भारु ॥
ऊच नीच तुम ते तरे आलजु संसारु ॥२॥
कहि रविदास अकथ कथा बहु काइ करीजै ॥
जैसा तू तैसा तुही किआ उपमा दीजै ॥३॥
२९.
जिह कुल साधु बैसनौ होइ
जिह कुल साधु बैसनौ होइ ॥
बरन अबरन रंकु नही ईसुरु बिमल बासु जानीऐ जगि सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
ब्रह्मन बैस सूद अरु ख्यत्री डोम चंडार मलेछ मन सोइ ॥
होइ पुनीत भगवंत भजन ते आपु तारि तारे कुल दोइ ॥१॥
धंनि सु गाउ धंनि सो ठाउ धंनि पुनीत कुट्मब सभ लोइ ॥
जिनि पीआ सार रसु तजे आन रस होइ रस मगन डारे बिखु खोइ ॥२॥
पंडित सूर छत्रपति राजा भगत बराबरि अउरु न कोइ ॥
जैसे पुरैन पात रहै जल समीप भनि रविदास जनमे जगि ओइ ॥३॥
३०.
मुकंद मुकंद जपहु संसार
मुकंद मुकंद जपहु संसार ॥
बिनु मुकंद तनु होइ अउहार ॥
सोई मुकंदु मुकति का दाता ॥
सोई मुकंदु हमरा पित माता ॥१॥
जीवत मुकंदे मरत मुकंदे ॥
ता के सेवक कउ सदा अनंदे ॥१॥ रहाउ ॥
मुकंद मुकंद हमारे प्रानं ॥
जपि मुकंद मसतकि नीसानं ॥
सेव मुकंद करै बैरागी ॥
सोई मुकंदु दुर्बल धनु लाधी ॥२॥
एकु मुकंदु करै उपकारु ॥
हमरा कहा करै संसारु ॥
मेटी जाति हूए दरबारि ॥
तुही मुकंद जोग जुग तारि ॥३॥
उपजिओ गिआनु हूआ परगास ॥
करि किरपा लीने कीट दास ॥
कहु रविदास अब त्रिसना चूकी ॥
जपि मुकंद सेवा ताहू की ॥४॥

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Last Updated : September 07, 2026

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