मराठी मुख्य सूची|मराठी साहित्य|मराठी संत साहित्य|संत श्रीरोहिदासांची पदे|संत रोहिदास कविता| १ ते १० संत रोहिदास कविता १ ते १० ११ ते २० २१ ते ३० ३१ ते ४० संत रोहिदास कविता - १ ते १० संत रोहिदास (इ.स. १३७६ - इ.स. १५२७) हे मध्ययुगीन भारतातील हिंदू संत होते. यांच्या गुरूंचे नाव रामानंद स्वामी होते. कबीर यांचे समकालीन होत; तर मीराबाई यांच्या शिष्या होत्या. Tags : abhangdohemarathirohidasअभंगदोहेमराठीरोहिदास संत रोहिदास कविता - १ ते १० Translation - भाषांतर १. बेगम पुरा सहर को नाउबेगम पुरा सहर को नाउ ॥दूखु अंदोहु नही तिहि ठाउ ॥नां तसवीस खिराजु न मालु ॥खउफु न खता न तरसु जवालु ॥१॥अब मोहि खूब वतन गह पाई ॥ऊहां खैरि सदा मेरे भाई ॥१॥ रहाउ ॥काइमु दाइमु सदा पातिसाही ॥दोम न सेम एक सो आही ॥आबादानु सदा मसहूर ॥ऊहां गनी बसहि मामूर ॥२॥तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै ॥महरम महल न को अटकावै ॥कहि रविदास खलास चमारा ॥जो हम सहरी सु मीतु हमारा ॥३॥२. दूधु त बछरै थनहु बिटारिओदूधु त बछरै थनहु बिटारिओ ॥फूलु भवरि जलु मीनि बिगारिओ ॥१॥माई गोबिंद पूजा कहा लै चरावउ ॥अवरु न फूलु अनूपु न पावउ ॥१॥ रहाउ ॥मैलागर बेर्हे है भुइअंगा ॥बिखु अम्रितु बसहि इक संगा ॥२॥धूप दीप नईबेदहि बासा ॥कैसे पूज करहि तेरी दासा ॥३॥तनु मनु अरपउ पूज चरावउ ॥गुर परसादि निरंजनु पावउ ॥४॥पूजा अरचा आहि न तोरी ॥कहि रविदास कवन गति मोरी ॥५॥३. माटी को पुतरा कैसे नचतु हैमाटी को पुतरा कैसे नचतु है ॥देखै देखै सुनै बोलै दउरिओ फिरतु है ॥१॥ जब कछु पावै तब गरबु करतु है ॥माइआ गई तब रोवनु लगतु है ॥१॥मन बच क्रम रस कसहि लुभाना ॥बिनसि गइआ जाइ कहूं समाना ॥२॥कहि रविदास बाजी जगु भाई ॥बाजीगर सउ मुहि प्रीति बनि आई ॥३॥४.मेरी संगति पोच सोच दिनु रातीमेरी संगति पोच सोच दिनु राती ॥मेरा करमु कुटिलता जनमु कुभांती ॥१॥राम गुसईआ जीअ के जीवना ॥मोहि न बिसारहु मै जनु तेरा ॥१॥ रहाउ ॥मेरी हरहु बिपति जन करहु सुभाई ॥चरण न छाडउ सरीर कल जाई ॥२॥कहु रविदास परउ तेरी साभा ॥बेगि मिलहु जन करि न बिलांबा ॥३॥५.नामु तेरो आरती मजनु मुरारेनामु तेरो आरती मजनु मुरारे ॥हरि के नाम बिनु झूठे सगल पासारे ॥१॥ रहाउ ॥नामु तेरो आसनो नामु तेरो उरसा नामु तेरा केसरो ले छिटकारे ॥नामु तेरा अम्मभुला नामु तेरो चंदनो घसि जपे नामु ले तुझहि कउ चारे ॥१॥नामु तेरा दीवा नामु तेरो बाती नामु तेरो तेलु ले माहि पसारे ॥नाम तेरे की जोति लगाई भइओ उजिआरो भवन सगलारे ॥२॥नामु तेरो तागा नामु फूल माला भार अठारह सगल जूठारे ॥तेरो कीआ तुझहि किआ अरपउ नामु तेरा तुही चवर ढोलारे ॥३॥दस अठा अठसठे चारे खाणी इहै वरतणि है सगल संसारे ॥कहै रविदासु नामु तेरो आरती सति नामु है हरि भोग तुहारे ॥४॥६. तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसातोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा ॥कनक कटिक जल तरंग जैसा ॥१॥जउ पै हम न पाप करंता अहे अनंता ॥पतित पावन नामु कैसे हुंता ॥१॥ रहाउ ॥तुम्ह जु नाइक आछहु अंतरजामी ॥प्रभ ते जनु जानीजै जन ते सुआमी ॥२॥सरीरु आराधै मो कउ बीचारु देहू ॥रविदास सम दल समझावै कोऊ ॥३॥७. तुम चंदन हम इरंड बापुरे संगि तुमारे बासातुम चंदन हम इरंड बापुरे संगि तुमारे बासा ॥नीच रूख ते ऊच भए है गंध सुगंध निवासा ॥१॥माधउ सतसंगति सरनि तुम्हारी ॥हम अउगन तुम्ह उपकारी ॥१॥ रहाउ ॥तुम मखतूल सुपेद सपीअल हम बपुरे जस कीरा ॥सतसंगति मिलि रहीऐ माधउ जैसे मधुप मखीरा ॥२॥जाती ओछा पाती ओछा ओछा जनमु हमारा ॥राजा राम की सेव न कीनी कहि रविदास चमारा ॥३॥८. घट अवघट डूगर घणा इकु निरगुणु बैलु हमारघट अवघट डूगर घणा इकु निरगुणु बैलु हमार ॥रमईए सिउ इक बेनती मेरी पूंजी राखु मुरारि ॥१॥को बनजारो राम को मेरा टांडा लादिआ जाइ रे ॥१॥ रहाउ ॥हउ बनजारो राम को सहज करउ ब्यापारु ॥मै राम नाम धनु लादिआ बिखु लादी संसारि ॥२॥उरवार पार के दानीआ लिखि लेहु आल पतालु ॥मोहि जम डंडु न लागई तजीले सरब जंजाल ॥३॥जैसा रंगु कसुमभ का तैसा इहु संसारु ॥मेरे रमईए रंगु मजीठ का कहु रविदास चमार ॥४॥९. कूपु भरिओ जैसे दादिरा कछु देसु बिदेसु न बूझकूपु भरिओ जैसे दादिरा कछु देसु बिदेसु न बूझ ॥ऐसे मेरा मनु बिखिआ बिमोहिआ कछु आरा पारु न सूझ ॥१॥सगल भवन के नाइका इकु छिनु दरसु दिखाइ जी ॥१॥ रहाउ ॥मलिन भई मति माधवा तेरी गति लखी न जाइ ॥करहु क्रिपा भ्रमु चूकई मै सुमति देहु समझाइ ॥२॥जोगीसर पावहि नही तुअ गुण कथनु अपार ॥प्रेम भगति कै कारणै कहु रविदास चमार ॥३॥१०. सतजुगि सतु तेता जगी दुआपरि पूजाचारसतजुगि सतु तेता जगी दुआपरि पूजाचार ॥तीनौ जुग तीनौ दिड़े कलि केवल नाम अधार ॥१॥पारु कैसे पाइबो रे ॥मो सउ कोऊ न कहै समझाइ ॥जा ते आवा गवनु बिलाइ ॥१॥ रहाउ ॥बहु बिधि धरम निरूपीऐ करता दीसै सभ लोइ ॥कवन करम ते छूटीऐ जिह साधे सभ सिधि होइ ॥२॥करम अकरम बीचारीऐ संका सुनि बेद पुरान ॥संसा सद हिरदै बसै कउनु हिरै अभिमानु ॥३॥बाहरु उदकि पखारीऐ घट भीतरि बिबिधि बिकार ॥सुध कवन पर होइबो सुच कुंचर बिधि बिउहार ॥४॥रवि प्रगास रजनी जथा गति जानत सभ संसार ॥पारस मानो ताबो छुए कनक होत नही बार ॥५॥परम परस गुरु भेटीऐ पूरब लिखत लिलाट ॥उनमन मन मन ही मिले छुटकत बजर कपाट ॥६॥भगति जुगति मति सति करी भ्रम बंधन काटि बिकार ॥सोई बसि रसि मन मिले गुन निरगुन एक बिचार ॥७॥अनिक जतन निग्रह कीए टारी न टरै भ्रम फास ॥प्रेम भगति नही ऊपजै ता ते रविदास उदास ॥८॥ N/A References : N/A Last Updated : September 07, 2026 Comments | अभिप्राय Comments written here will be public after appropriate moderation. Like us on Facebook to send us a private message. TOP