मराठी मुख्य सूची|मराठी साहित्य|मराठी संत साहित्य|संत श्रीरोहिदासांची पदे|संत रोहिदास कविता| ११ ते २० संत रोहिदास कविता १ ते १० ११ ते २० २१ ते ३० ३१ ते ४० संत रोहिदास कविता - ११ ते २० संत रोहिदास (इ.स. १३७६ - इ.स. १५२७) हे मध्ययुगीन भारतातील हिंदू संत होते. यांच्या गुरूंचे नाव रामानंद स्वामी होते. कबीर यांचे समकालीन होत; तर मीराबाई यांच्या शिष्या होत्या. Tags : abhangdohemarathirohidasअभंगदोहेमराठीरोहिदास संत रोहिदास कविता - ११ ते २० Translation - भाषांतर ११. म्रिग मीन भ्रिंग पतंग कुंचर एक दोख बिनासम्रिग मीन भ्रिंग पतंग कुंचर एक दोख बिनास ॥पंच दोख असाध जा महि ता की केतक आस ॥१॥माधो अबिदिआ हित कीन ॥बिबेक दीप मलीन ॥१॥ रहाउ ॥त्रिगद जोनि अचेत स्मभव पुंन पाप असोच ॥मानुखा अवतार दुलभ तिही संगति पोच ॥२॥जीअ जंत जहा जहा लगु करम के बसि जाइ ॥काल फास अबध लागे कछु न चलै उपाइ ॥३॥रविदास दास उदास तजु भ्रमु तपन तपु गुर गिआन ॥भगत जन भै हरन परमानंद करहु निदान ॥४॥१२. संत तुझी तनु संगति प्रानसंत तुझी तनु संगति प्रान ॥सतिगुर गिआन जानै संत देवा देव ॥१॥संत ची संगति संत कथा रसु ॥संत प्रेम माझै दीजै देवा देव ॥१॥ रहाउ ॥संत आचरण संत चो मारगु संत च ओल्हग ओल्हगणी ॥२॥अउर इक मागउ भगति चिंतामणि ॥जणी लखावहु असंत पापी सणि ॥३॥रविदासु भणै जो जाणै सो जाणु ॥संत अनंतहि अंतरु नाही ॥४॥१३. कहा भइओ जउ तनु भइओ छिनु छिनुकहा भइओ जउ तनु भइओ छिनु छिनु ॥प्रेमु जाइ तउ डरपै तेरो जनु ॥१॥तुझहि चरन अरबिंद भवन मनु ॥पान करत पाइओ पाइओ रामईआ धनु ॥१॥ रहाउ ॥स्मपति बिपति पटल माइआ धनु ॥ता महि मगन होत न तेरो जनु ॥२॥प्रेम की जेवरी बाधिओ तेरो जन ॥कहि रविदास छूटिबो कवन गुन ॥३॥१४. हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरेहरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे ॥हरि सिमरत जन गए निसतरि तरे ॥१॥ रहाउ ॥हरि के नाम कबीर उजागर ॥जनम जनम के काटे कागर ॥१॥निमत नामदेउ दूधु पीआइआ ॥तउ जग जनम संकट नही आइआ ॥२॥जन रविदास राम रंगि राता ॥इउ गुर परसादि नरक नही जाता ॥३॥१५. जब हम होते तब तू नाही अब तूही मै नाहीजब हम होते तब तू नाही अब तूही मै नाही ॥अनल अगम जैसे लहरि मइ ओदधि जल केवल जल मांही ॥१॥माधवे किआ कहीऐ भ्रमु ऐसा ॥जैसा मानीऐ होइ न तैसा ॥१॥ रहाउ ॥नरपति एकु सिंघासनि सोइआ सुपने भइआ भिखारी ॥अछत राज बिछुरत दुखु पाइआ सो गति भई हमारी ॥२॥राज भुइअंग प्रसंग जैसे हहि अब कछु मरमु जनाइआ ॥अनिक कटक जैसे भूलि परे अब कहते कहनु न आइआ ॥३॥सरबे एकु अनेकै सुआमी सभ घट भुगवै सोई ॥कहि रविदास हाथ पै नेरै सहजे होइ सु होई ॥४॥१६. जउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बधनि तुम बाधेजउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बधनि तुम बाधे ॥अपने छूटन को जतनु करहु हम छूटे तुम आराधे ॥१॥माधवे जानत हहु जैसी तैसी ॥अब कहा करहुगे ऐसी ॥१॥ रहाउ ॥मीनु पकरि फांकिओ अरु काटिओ रांधि कीओ बहु बानी ॥खंड खंड करि भोजनु कीनो तऊ न बिसरिओ पानी ॥२॥आपन बापै नाही किसी को भावन को हरि राजा ॥मोह पटल सभु जगतु बिआपिओ भगत नही संतापा ॥३॥कहि रविदास भगति इक बाढी अब इह का सिउ कहीऐ ॥जा कारनि हम तुम आराधे सो दुखु अजहू सहीऐ ॥४॥१७. दुलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेकैदुलभ जनमु पुंन फल पाइओ बिरथा जात अबिबेकै ॥राजे इंद्र समसरि ग्रिह आसन बिनु हरि भगति कहहु किह लेखै ॥१॥न बीचारिओ राजा राम को रसु ॥जिह रस अन रस बीसरि जाही ॥१॥ रहाउ ॥जानि अजान भए हम बावर सोच असोच दिवस जाही ॥इंद्री सबल निबल बिबेक बुधि परमारथ परवेस नही ॥२॥कहीअत आन अचरीअत अन कछु समझ न परै अपर माइआ ॥कहि रविदास उदास दास मति परहरि कोपु करहु जीअ दइआ ॥३॥१८. सुख सागरु सुरतर चिंतामनि कामधेनु बसि जा केसुख सागरु सुरतर चिंतामनि कामधेनु बसि जा के ॥चारि पदार्थ असट दसा सिधि नव निधि कर तल ता के ॥१॥हरि हरि हरि न जपहि रसना ॥अवर सभ तिआगि बचन रचना ॥१॥ रहाउ ॥नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अखर मांही ॥बिआस बिचारि कहिओ परमारथु राम नाम सरि नाही ॥२॥सहज समाधि उपाधि रहत फुनि बडै भागि लिव लागी ॥कहि रविदास प्रगासु रिदै धरि जनम मरन भै भागी ॥३॥१९. जउ तुम गिरिवर तउ हम मोराजउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा ॥जउ तुम चंद तउ हम भए है चकोरा ॥१॥माधवे तुम न तोरहु तउ हम नही तोरहि ॥तुम सिउ तोरि कवन सिउ जोरहि ॥१॥ रहाउ ॥जउ तुम दीवरा तउ हम बाती ॥जउ तुम तीर्थ तउ हम जाती ॥२॥साची प्रीति हम तुम सिउ जोरी ॥तुम सिउ जोरि अवर संगि तोरी ॥३॥जह जह जाउ तहा तेरी सेवा ॥तुम सो ठाकुरु अउरु न देवा ॥४॥तुमरे भजन कटहि जम फांसा ॥भगति हेत गावै रविदासा ॥५॥२०. जल की भीति पवन का थ्मभा रक्त बुंद का गाराजल की भीति पवन का थ्मभा रक्त बुंद का गारा ॥हाड मास नाड़ीं को पिंजरु पंखी बसै बिचारा ॥१॥प्रानी किआ मेरा किआ तेरा ॥जैसे तरवर पंखि बसेरा ॥१॥ रहाउ ॥राखहु कंध उसारहु नीवां ॥साढे तीनि हाथ तेरी सीवां ॥२॥बंके बाल पाग सिरि डेरी ॥इहु तनु होइगो भसम की ढेरी ॥३॥ऊचे मंदर सुंदर नारी ॥राम नाम बिनु बाजी हारी ॥४॥मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी ओछा जनमु हमारा ॥तुम सरनागति राजा राम चंद कहि रविदास चमारा ॥५॥ N/A References : N/A Last Updated : September 07, 2026 Comments | अभिप्राय Comments written here will be public after appropriate moderation. Like us on Facebook to send us a private message. TOP