पूर्णदशक - ॥ समास नववां - सूक्ष्मनिरूपणनाम ॥

इस ग्रंथके पठनसे ‘‘उपासना का श्रेष्ठ आश्रय’ लाखों लोगों को प्राप्त हुआ है ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
मृत्तिकापूजन करे । और तुरंत ही विसर्जन करे । यह मान्य ना करे । सहजता से अंतःकरण ॥१॥
देव पूजें और त्याग दें । यह जीव को प्रशस्त ना लगे। इसका विचार देखें । अंतर्याम में ॥२॥
देव तैयार करे ऐसा नहीं । देव छोड दे ऐसा नहीं । इस कारण कुछ इसका भी । विचार देखें ॥३॥
देव नाना शरीर धरता । धरकर बाद में छोड देता । फिर वह देव है कैसा । विवेक से पहचानें ॥४॥
नाना साधन निरूपण । देवशोधन के कारण । सकल अपने अंतःकरण । में समझना चाहिये ॥५॥
ब्रह्मज्ञान का उपाय । समझे बिना देना ना होय । पदार्थ है तो फिर ले जायें । ऐसे कह सके ॥६॥
सारे लोगों के अंतरंग का भाव । मुझे प्रत्यक्ष मिले देव । परंतु विवेक का उपाव । अलग ही है ॥७॥
विचार देखें तो टिके ना । उसे देव कह पाये ना । परंतु जनों से रहा जायेना । क्या करें ॥८॥
महान लोगों की मृत्यु होती। उनकी बनाकर रखते मूर्ति । वैसे ही है यह गति । उपासना की ॥९॥
बड़ा व्यापार न कर सके जन । मजदूरी करते इस कारण । राजसंपदा उसके कारण । प्राप्त हो कैसे ॥१०॥
इसकारण जितना भोलाभाव । उतना अज्ञान का स्वभाव । अज्ञान से देवाधिदेव । मिलेंगे कैसे ॥११॥
अज्ञानी को ज्ञान ना मान्य होये । ज्ञाता को अनुमान ना मान्य होये । इस कारण सिद्धों के चिन्ह ये । पाने चाहिये ॥१२॥
माया त्याग कर मूल तक जायें । तभी फिर समाधान पायें । ऐसे ना हो तो भटक जायें। भलते ही ओर ॥१३॥
माया लांघने के लिये । देव ने किये नाना उपाये । अध्यात्मश्रवणपंथ से ही जायें । प्रत्यय से ॥१४॥
लोगों ने ऐसा न करने पर । सारी ही होती भूल चूक । स्थिति खरी और झूठ । ऐसे पहचानें ॥१५॥
खोटे की राह पर न जायें । खोटे की संगति ना धरें । खोटे का संग्रह ना करें । कुछ भी ॥१६॥
खोटे वे खोटे ही खोटे । खरे के सम्मुख टिके ना आरोप झूठे । मन अधोमुख उल्टा ये । करना चाहिये ॥१७॥
अध्यात्मश्रवण करते जायें । याने सबकुछ मिलते जाये । नाना प्रकार की उलझने । टूट जाती ॥१८॥
सूत उलझा वह सुलझायें । वैसे ही मन को उगायें। मानते मनाते ले जायें । मूल की ओर ॥१९॥
सभी कुछ मिश्रित हुये । उन सभी से सकल हुये । शरीर में विभाजित हुये । सभी कुछ ॥२०॥
जो भी है वह यहीं देखें । कैसा है वह यहीं खोजें । सूक्ष्म के चौदह नाम ये । यहीं समझ लें ॥२१॥
निर्गुण निर्विकारी एक । वह सर्व ही ठाई व्यापक । देह में वह निष्कलंक । है या नहीं ॥२२॥
मूलमाया संकल्परूप । अंतःकरण का स्वरूप । जड चेताये चैतन्यरूप । वह भी शरीर में है ॥२३॥
समानगुण गुणसाम्य । सूक्ष्म विचार वह अगम्य । सूक्ष्म साधु जानते प्रणम्य । उन समस्तों को ॥२४॥
द्विधा भासता शरीर । वामांग दक्षिणांग विचार । वही अर्धनारीनटेश्वर । पिंड में पहचानें ॥२५॥
वही प्रकृतिपुरुष जानिये । शिवशक्ति पहचानिये । षड्गुणेश्वर बोलिये । उसी कर्दम को ॥२६॥
उसी को कहिये महतत्त्व । जहां त्रिगुणों का गूढत्व । अर्धमात्रा शुद्धसत्त्व । गुणक्षोभिणी ॥२७॥
त्रिगुणों से चलता शरीर । प्रत्यक्ष दिखता विचार । मूल का कर्दमयुक्त शरीर । ऐसे जानिये ॥२८॥
मन माया और जीव । यह भी दिखता स्वभाव । चौदह नामों का अभिप्राव । पिंड में देखें ॥२९॥
पिंड गिरते ही सारे जाते । परंतु परब्रह्म रहते । शाश्वत समझकर फिर उसे । दृढता से धरें ॥३०॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे सूक्ष्मनिरूपणनाम समास नववां ॥९॥

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Last Updated : December 09, 2023

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