विवेकवैराग्यनाम - ॥ समास आठवां - कालरूपनाम ॥

इस ग्रंथमें प्रत्येक छंद ‘मुख्य आत्मनुभूति से’ एवं सभी ग्रंथों की सम्मति लेकर लिखा है ।   


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
मूलमाया जगदीश्वर । आगे अष्टधा का विस्तार । सृष्टिक्रम का आकार । हुआ आकारित ॥१॥
ये सारा ही न हो तो निर्मल । जैसा गगन अंतराल । निराकार में समयकाल । कुछ भी नहीं ॥२॥
उपाधि का विस्तार हुआ । वहां काल दिखाई दिया । अन्यथा देखें तो काल का । ठांव ही नहीं ॥३॥
एक चंचल एक निश्चल । इससे अलग कहां है काल । जब तक है चंचल । तब तक काल कहें ॥४॥
आकाश याने अवकाश । विलंब को कहते अवकाश । जो काल का विलंबवेष । जान लो उसे ॥५॥
विलंब समझे सूर्य के कारण । सबकी गणना का होता आकलन । पल से लेकर युगपर्यत । होता है ॥६॥
पल घटिका प्रहर दिवस । अहोरात्र पक्षमास । षडमास वर्ष युग तक । माप सके ॥७॥
कृत त्रेता द्वापर कलि । भूमंडल में सख्या चली । देवों की आयु है निराली । शास्त्रों में निरूपित ॥८॥
बह देवत्रय की खटपट । सूक्ष्मरूप में विलगट । दंडक टूटने पर छटपट । लोगों में होती ॥९॥
मिश्रित त्रिगुण पृथक होये ना । उनसे आद्यंत सृष्टिरचना । कौन बडा कौन नन्हा । कैसे कहें ॥१०॥
अस्तु यह काम ज्ञाता के । अज्ञानी व्यर्थ ही उलझे भ्रम से । प्रत्यय से जानकर वर्म ये । ज्ञात करें ॥११॥
उत्पन्नकाल सृष्टिकाल । स्थितिकाल संहारकाल । आद्यंत संपूर्ण काल । विलंबरूपी ॥१२॥
जो जो जिस प्रसंग में हुआ । वह उस काल का नाम हुआ । ठीक से अनुमान न हो पाया । तो सुनो आगे ॥१३॥
पर्जन्यकाल शीतकाल । उष्णकाल संतोषकाल । सुखदुःखआनंदकाल । का प्रत्यय आता ॥१४॥
प्रातःकाल मध्यान्हकाल । सायंकाल वसंतकाल । पर्वकाल कठिन-काल । जानते लोग ॥१५॥
जन्मकाल बाल्यकाल । तारुण्यकाल वृद्धापकाल । अंतकाल विषमकाल । समयरूप में ॥१६॥
सुकाल और दुष्काल । प्रदोषकाल पुण्यकाल । सभी समय मिलाकर काल । कहते उसे ॥१७॥
रहे एक लगता एक । इसका नाम हीन विवेक । नाना प्रवृत्ति के लोक । प्रवृत्ति जानते ॥१८॥
प्रवृत्ति चले अधोमुख से । निवृत्ति दौडे ऊर्ध्वमुख से । नाना सुख ऊर्ध्वमुख से । विवेकी जानते ॥१९॥
ब्रह्मांडरचना जहां से हुई । वहां विवेकी डाले दृष्टि । विवरते विवरते प्राप्त हुई । पूर्वापरिस्थिति ॥२०॥
प्रपंची होकर भी जो परमार्थ देखे । वही इस स्थिति तक पहुंचे । प्रारब्ध योग से रहे । लोगों में ॥२१॥
समस्तों का एक ही मूल । एक ज्ञानी एक वाचाल । विवेक कर तत्काल । परलोक साधे ॥२२॥
तभी जन्म का सार्थक । भले जन देखते उभय लोक । कारण मूल का विवेक । देखना चाहिये ॥२३॥
विवेकहीन जो जन । उन्हें जानें पशुसमान । उनका सुनने पर भाषण । परलोक कैसा ॥२४॥
भला हमारा क्या गया । जो किया उसका फल पाया । वहीं उगा जो था बोया । भोगते अब ॥२५॥
आगे भी करोगे वही पाओगे । भक्तियोग से भगवंत मिलते । देव भक्त मिलने से होये । दुगुना समाधान ॥२६॥
कीर्ति न पाकर मर गये । वे व्यर्थ ही आये और गये । सयाने होकर भूल गये । क्या कहें ॥२७॥
यहां का यहीं सारा ही रहता । ऐसा प्रत्यय में आता । कौन क्या लेकर जाता । कहो तो सही ॥२८॥
पदार्थ के लिये रहें उदास । विवेक देखें विशेष यथावकाश । इस तरह से जगदीश । का अलभ्य लाभ होता ॥२९॥
जगदीश से परे लाभ नहीं । कार्याकरण सर्व ही । संसार करते हुये भी । समाधान ॥३०॥
पहले हो गये जनकादिक । राज्यकर्ता भी अनेक । वैसे अब भी पुण्यश्लोक । हैं कितने सारे ॥३१॥
राजा रहते मृत्यु आई । लक्षकोटि कबूल हुये भी । फिर भी उसे छोड़ा नहीं । मृत्यु ने ॥३२॥
ऐसे यह पराधीन जीना । इसमें दुःखों को बुलाना । नाना उद्वेग चिंता करना । कहां तक ॥३३॥
हाट' भरा है संसार का । नफा देखें देव का । तभी कुछ इस कष्ट का । पर्याय होता ॥३४॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे कालरूपनाम समास आठवां ॥८॥

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Last Updated : December 08, 2023

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