विवेकवैराग्यनाम - ॥ समास चौथा - विवेकवैराग्यनाम ॥

इस ग्रंथमें प्रत्येक छंद ‘मुख्य आत्मनुभूति से’ एवं सभी ग्रंथों की सम्मति लेकर लिखा है ।   


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
महद्भाग्य हांथ आया । परंतु भोगना न जान पाया । वैसे वैराग्य उत्पन्न हुआ । परंतु विवेक नहीं ॥१॥
गिरना टकराना । कष्ट सहना दुःखी होना । सुनना देखना । आता वैराग्य उससे ॥२॥
नाना प्रपंच की खींचातान । नाना संकट उलझन । संसार त्याग कर देशभ्रमण । होता उससे ॥३॥
चिंता से छूटा । पराधीनता से भागा । दुःख त्याग कर मुक्त हुआ । रोगी जैसा ॥४॥
परंतु वह ना बने स्वच्छंद । नष्ट भ्रष्ट वाहियात । मर्यादा ही नहीं मुक्त अचार । गुरु जैसे ॥५॥
विवेक बिन वैराग्य किया । फिर अविवेक से अनर्थ हुआ । सारा व्यर्थ ही गया । दोनों ओर ॥६॥
ना प्रपंच ना परमार्थ । सारा जीवन हुआ व्यर्थ । अविवेक ने अनर्थ । ऐसा किया ॥७॥
अथवा व्यर्थ ही ज्ञान बडबड़ाया । परंतु वैराग्य योग नहीं ॥ जैसे कारागृह में अटका हुआ । पुरुषार्थ बताये ॥८॥
वैराग्यबिन हुआ । ज्ञान । वह व्यर्थ ही साभिमान । लोभ दंभ की पटकन । से तड़पने लगा ॥९॥
श्वान को बांधा फिर भी भौंके । वैसे स्वार्थ के कारण चीखे । पराधिक देख न सके । साभिमान वश ॥१०॥
यह एक के बिन एक । उससे व्यर्थ ही बढ़े शोक । अब वैराग्य और विवेक । योग सुनें ॥११॥
अंतरंग विवेक से छूटा । प्रपंच वैराग्य से टूटा । अंतर्बाह्य हुई मुक्तता । निःसंग योगी ॥१२॥
जैसे मुख से ज्ञान कहे । वैसे ही सर्व क्रिया चले । दीक्षा देख चकित हुये । शुचिष्मत ॥१३॥
आस्था नहीं त्रैलोक्य की । स्थिति दृढ हुई वैराग्य की । यत्नविवेकधारणा की । सीमा नहीं ॥१४॥
संगीत रसदार हरिकीर्तन । तालबद्ध तानमान । प्रेम से पसंद का भजन । अंतरंग से ॥१५॥
तत्काल ही सन्मार्ग लगे । ऐसा अंतरंग में विवेक जागे । वक्तृत्व करे तो ना भंगे । साहित्य प्रत्यय का ॥१६॥
सन्मार्ग से जग से मिला । याने जगदीश कृपावंत हुआ । प्रसंग चाहिये समझना । किसी एक को ॥१७॥
प्रखर वैराग्य उदासीन । प्रत्यय का ब्रह्मज्ञान । स्नानसंध्या भगवद्भजन । पुण्यमार्ग ॥१८॥
विवेक वैराग्य यह ऐसा । केवल वैराग्य ढोंगी पागल जैसा । शब्दज्ञान खोखला जैसा । स्वयं को ही लगे ॥१९॥
इस कारण विवेक और वैराग्य । वही जानिये महद्भाग्य । रामदास कहे योग्य । साधु जानते ॥२०॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे विवेकवैराग्यनाम समास चौथा ॥४॥

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Last Updated : December 08, 2023

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