ज्ञानदशक मायोद्भवनाम - ॥ समास छठवां - दुश्चितनिरूपणनाम ॥

३५० वर्ष पूर्व मानव की अत्यंत हीन दीन अवस्था देख, उससे उसकी मुक्तता हो इस उदार हेतु से श्रीसमर्थ ने मानव को शिक्षा दी ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
श्रोता करें विनती वक्ता से । सत्संग की महिमा कैसे । मोक्षलाभ कितने दिनों में । यह मुझे निरूपित करें ॥१॥
धरने पर साधु की संगति । कितने दिनों में होती मुक्ति । यह निश्चय कृपामूर्ति । मुझ दीन को करायें ॥२॥
मुक्ति मिले तत्क्षण ही । निरूपण में विश्वास करते ही । दुश्चितपन से हानी । होती है ॥३॥
सुचितपन से दुश्चित । मन होता अकस्मात् । उसे करें शांत । किस तरह ॥४॥
मन के मोह को तोड़कर । श्रवण में बैठे मन लगाकर । सावधानी से घड़ी हर । काल सार्थक करें ॥५॥
अर्थ प्रमेय ग्रंथांतर में। खोज कर लें अभ्यंतर में। दुश्चितपन आने पर भी करें । पुनः श्रवण ॥६॥
अर्थातर देखे बिन । व्यर्थ ही जो करे श्रवण । वह श्रोता नहीं पाषाण । मनुष्यवेष में ॥७॥
यहां श्रोता गये बुरा मान । हमें किया पाषाण । फिर भी उस पाषाण के लक्षण । सुनो सावधानी से ॥८॥
आड़ा तेढा फोड़ा । पाषाण को सुंदर गढा । दूसरे ही क्षण देखा । तो वह वैसे ही रहता ॥९॥
टांकी से खपरी फोड़ी । वह वापस नहीं जुड़ी । मनुष्य की कुबुद्धि झाड़ी। फिर भी वह पुनः चिपके ॥१०॥
कहने से गया अवगुण । पुनः जुड़ा अगले क्षण । महाभला इस कारण । पाषाणगोटा ॥११॥
जिसका झड़ेना अवगुण । वह पाषाण से भी न्यून। अलग ही जानिये पाषाण । कोटिगुना ॥१२॥
कोटिगुना कैसा पाषाण । उसके भी सुनें लक्षण । श्रोतां करें श्रवण । सावधान होकर ॥१३॥
माणिक मोती प्रवाल । पन्ना वैडूर्य वज्रनील । गोमेदमणी पारस केवल । पाषाण कहिये ॥१४॥
इनसे भी अलग बहुत । सूर्यकांत सोमकांत । नाना मोहरें सप्रचित । औषध के कारण ॥१५॥
इनसे भी अलग पाषाण भले । नाना तीर्थों में जो लगे । वापी कूप अंत में हुये । हरिहर मूर्ति ॥१६॥
इसका देखने पर विचार । पाषाण जैसा नहीं सार । मनुष्य वह तो क्या पामर । पाषाण सम्मुख ॥१७॥
फिर भी ऐसा नहीं पाषाण । जो अपवित्र निःकारण । उसके समान देह जान । दुश्चित अभक्तों की ॥१८॥
अब रहने दो यह कथन । घात करता दुश्चितपन । दुश्चितपन के कारण । प्रपंच ना परमार्थ ॥१९॥
दुश्चितपन से कार्य नष्ट होये । दुश्चितपन से चिंता बसे । स्मरण न रहे दुश्चितपन से। क्षण एक देखो तो ॥२०॥
दुश्चितपन से शत्रु की जीत । दुश्चितपन से जन्म मरण । दुश्चितपन के कारण। हानि होती ॥२१॥
दुश्चितपन से न हो साधन । दुश्चितपन से न हो भजन । दुश्चितपन से न हो ज्ञान । साधक को ॥२२॥
दुश्चितपन से न हो निश्चय । दुश्चितपन से न हो जय। दुश्चितपन से होता क्षय । अपने स्वहित का ॥२३॥
दुश्चितपन से न होता श्रवण । दुश्चितपन से न होता विवरण । दुश्चितपन से निरूपण । हांथ का निकल जाता ॥२४॥
दुश्चित बैठा सा दिखे । पर वह होकर भी न रहे । चंचल चक्र में पड़ा रहे । मन उसका ॥२५॥
पागल पिशाच निरतंर । अंधे गूंगे और बधिर । वैसा जानियें संसार । दुश्चित प्राणियों का ॥२६॥
सावध होकर भी उमजेना । श्रवण होकर भी सुने ना । ज्ञान रहकर भी समझेना । सारासार ॥२७॥
ऐसा जो दुश्चित आलसी । परलोक प्राप्ति उसे कैसी । जिसके जीव में अहर्निशी । आलस बसे ॥२८॥
दुश्चितपन से छूटा जो । तो तुरंत ही आलस आया देखो । आलस के हांथो प्राणियो कों । फुरसत ही नहीं ॥२९॥
आलस से रह गया विचार । आलस से डूबा आचार । आलस से न हो मुखाग्र । कुछ भी ॥३०॥
आलस से न होता श्रवण । आलस से न हो निरूपण । आलस से परमार्थ की पहचान । मलिन हुई ॥३१॥
आलस से नित्य नियम रह गया । आलस से अभ्यास डूब गया । आलस से आलस बढ़ गया । असंभाव्य ॥३२॥
आलस से गई धारणा धृति । आलस से मलिन हुई वृत्ति । आलस से विवेक की गति । मंद हुई ॥३३॥
आलस से निद्रा बढ़ी । आलस से वासना फैली । आलस से शून्याकार हुई । सद्बुद्धि निश्चय की ॥३४॥
दुश्चितपन के साथ आलस । आलस से निद्राविलास । निद्रा विलास से केवल नाश । आयुष्य का ॥३५॥
निद्रा आलस दुश्चितपन । यही मूर्ख का लक्षण । इसके कारण निरूपण । उमजे ही नहीं ॥३६॥
यह तीनों लक्षण जहां । विवेक कैसे रहेगा वहां । अज्ञानी को इसके सिवा । सुख ही नहीं ॥३७॥
क्षुधा लगते ही खाया। खाकर उठा तो आलस आया । आलस आते ही सोया । सावकाश ॥३८॥
सोकर उठते ही दुश्चित । कभी नहीं सावचेत । वहां कैसे आत्महित । निरूपण में ॥३९॥
मर्कट के पास दिया रत्न । पिशाच के हांथ में निधान । दुश्चित के समक्ष निरूपण । का वही होता ॥४०॥
अब रहने दो यह उपपत्ति । आशंका की कौन गति । कितने दिनों मे होती मुक्ति । सज्जन के संग में ॥४१॥
सुनो इसका प्रत्युत्तर । श्रोता होंयें निरूत्तर । संतसंग का विचार । ऐसा है ॥४२॥
लोहा पारस से लगता । बूंद सागर से मिलता । गंगा सरिता संगम होता । तत्क्षण ॥४३॥
सावध साक्षेपी और दक्ष । उसे तत्काल ही मोक्ष । इतरों को वह अलक्ष्य । लक्ष्य करते न बने ॥४४॥
यहां शिष्यप्रज्ञा ही केवल । प्रज्ञावंत को न लगे समयकाल । अनन्य को तत्काल । मोक्षलाभ होता ॥४५॥
प्रज्ञावंत और अनन्य । उसे न लगे एक क्षण । अनन्य भावार्थ बिन । प्रज्ञा खोटी ॥४६॥
प्रज्ञाबिन अर्थ न समझे । विश्वासबिन वस्तु न समझे । प्रज्ञा विश्वास से गले । देहाभिमान ॥४७॥
देहाभिमान के अंत में । सहजही वस्तुप्राप्ति है । सत्संग से सद्गति में । विलंब नहीं ॥४८॥
सावधान साक्षेपी विशेष । प्रज्ञावंत और विश्वास । उसे साधनों का सायास । करना ही न पडे ॥४९॥
इतर भाविक और भोले । उन्हें भी साधनों से मोक्ष मिले । साधुसंग से तत्काल खुले । विवेकदृष्टि ॥५०॥
पर वे साधन तोडें नहीं । निरूपण का उपाय । निरूपण से राह मिलती । सर्वत्रों को ॥५१॥
अब मोक्ष है कैसा । कैसे स्वरूप की दशा । उसके प्राप्ति का भरोसा । सत्संग से कब होता ॥५२॥
ऐसे निरूपण प्रांजल । आगे बोला गया सकल । श्रोताओं होकर निश्चल । अवधान दें ॥५३॥
अवगुण त्यागवाने के कारण से । न्याय निष्ठुर बोलना पडे । श्रोता कोप न धरें। ऐसे वचनों का ॥५४॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे दुश्चितनिरूपणनाम समास छठवां ॥६॥

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Last Updated : December 06, 2023

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