भीमदशक - ॥ समास दसवां - निस्पृहवर्तणुकनाम ॥

३५० वर्ष पूर्व मानव की अत्यंत हीन दीन अवस्था देख, उससे उसकी मुक्तता हो इस उदार हेतु से श्रीसमर्थ ने मानव को शिक्षा दी ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
मूर्ख एकदेशी रहता । चतुर सर्वत्र देखता । जैसे बहुधा होकर भोगता । नाना सुख ॥१॥
वही अंतरात्मा महंत । वह क्यों होगा संकुचित । प्रशस्त जानकार समस्त । विख्यात योगी ॥२॥
कर्ता भोक्ता तत्त्वता । भूमंडल पर सर्व सत्ता । उससे अलग उसका ज्ञाता । देखो तो कौन ॥३॥
महंत हों इस प्रकार । खोजकर लें सर्व सार । न मिले खोजने पर । एकाएक ॥४॥
कीर्तिरूप में उदंड ख्यात । जानते छोटे बड़े समस्त । वेष देखें तो शाश्वत । एक भी नहीं ॥५॥
प्रगट कीर्ति ढलेना । बहुत लोगों को समझेना । देखने जाओ तो मिलेना । क्या है कैसा ॥६॥
वेषभूषण वह दूषण । कीर्तिभूषण वह भूषण । मंथन बिन एक भी क्षण । गवायें ना ॥७॥
त्यागें परिचित जन । सर्वकाल नित्यनूतन । लोग खोजकर देखते मन । मगर इच्छा दिखेना ॥८॥
पूर्ता किसी को देखे ना । पूर्ता किसी से बोले ना । पूर्ता एक स्थल पर रहे ना । जाता उठकर ॥९॥
गंतव्य स्थल वह कहे ना । कहे तो फिर वहां जाये ना । निज स्थिति का अनुमान भी ना । होने दे ॥१०॥
लोगों ने किये वह गलत ठहराये । लोगों को भाये वह पलटाये । लोगों के तर्क को दिखाये । निर्फल बनाकर ॥११॥
लोगों को दर्शन का आदर । वहां इसका अनादर । लोग सर्वकाल तत्पर । वहां इसकी अनिच्छा ॥१२॥
एंव कल्पना में कल्पेना । तर्क में तर्के ना । कदापि भाव में भावे ना । योगेश्वर ॥१३॥
ऐसा अंतरंग मिलेना । शरीर से एक जगह पर रहेना । क्षण एक थमे ना । कथाकीर्तन ॥१४॥
लोग संकल्पविकल्प करते । वे सारे ही निर्फल होते । जनों से जनों की वृत्ति लजाये । तब योगेश्वर ॥१५॥
बहुतों ने ढूंढकर देखा । बहुतों के मन को भाया । तभी फिर जानो साधा । महत्कृत्य ॥१६॥
अखंड एकांत सेवन करें । अभ्यास करते ही जायें । काल सार्थक ही करें । जनों के साथ ॥१७॥
उत्तम गुण उतने लें । लेकर जनों को सिखलायें । उदंड समुदाय करें । मगर गुप्त रूप में ॥१८॥
कार्य की तत्परता अखंड । उपासना में लगाये जग । लोग समझकर तब । चाहते आज्ञा ॥१९॥
पहले कष्ट फिर फल । कष्ट ही नहीं वह निर्फल । उद्योग बिना केवल । वृथा पुष्ट ॥२०॥
लोग बहुत ढूंढे । उनके अधिकार जानें । जान जानकर रखें । निकट दूर ॥२१॥
अधिकारानुसार कार्य होता । अधिकार बिना व्यर्थ जाता । जानकर खोजें चित्त । नाना प्रकार से ॥२२॥
अधिकार देख कार्य सौंपे । साक्षेप देख विश्वास करें । अपना मगज रखें । कुछ तो ॥२३॥
यह प्रचिति का बोला गया । पहले किया फिर कहा । मानें तो फिर लेना । चाहिये किसी एक ने ॥२४॥
महंत मंहत करें । युक्ति बुद्धि से भरें । ज्ञाता वितरित करें । नाना देशों में ॥२५॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे निस्पृहवर्तणुकनाम समास दसवां ॥१०॥

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Last Updated : December 05, 2023

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