भीमदशक - ॥ समास सातवां - चंचलनदीनिरूपणनाम ॥

३५० वर्ष पूर्व मानव की अत्यंत हीन दीन अवस्था देख, उससे उसकी मुक्तता हो इस उदार हेतु से श्रीसमर्थ ने मानव को शिक्षा दी ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
चंचल नदी गंगा गुप्त । स्मरण से करें जग पवित्र । देखें इसकी रोकडी प्रचित । अन्यथा नहीं ॥१॥
केवल अचंचल से निर्माण हुई । अधोमुख दिशा में वेग से चली । अखंड बहे पर देखी । नहीं किसी ने ॥२॥
बल मोड़ भंवरि । उफान तरंग झरी । भारी लहरें काटती । जगह जगह ॥३॥
शुष्क जल के प्रवाह । धारा प्रपात खलखल । संकरा उथला चौडा प्रवाह । चंचल पानी ॥४॥
झाग बुलबुले लहराये । इधर उधर उदक दौड़े । बूंद तुपार गिने । अणु रेणु कितने ॥५॥
कचरा बहता उदंड । प्रपात पत्थर कपार । चट्टान टापू को चक्कर । लगाती बहे ॥६॥
मृद भूमि टूट गई । कठिन वैसी ही रही । जगह जगह उदंड दिखी । सृष्टि में ॥७॥
कुछ तो बहते ही गये । कुछ चक्कर में पड़े । कुछ संकरी जगह में फस गये । अधोमुख ॥८॥
कुछ पटक पटककर मर गये । कुछ दबकर मर गये । कई एक फूल गये । पानी भरते ही ॥९॥
कुछ बलशाली चुने । वे तैरकर उगम तक पहुंचे । उगम दर्शन से पवित्र हुये । तीर्थरूप ॥१०॥
वहां ब्रह्मादिकों के भुवन । ब्रह्माड देवताओं के स्थान । उलटी गंगा देखने पर मिलन । सबका होता बहा ॥११॥
उस जल जैसा नहीं निर्मल । उस जल जैसा नहीं चंचल । आपोनारायण केवल । कहते उसे ही ॥१२॥
है महानदी पर अंतराल में । सर्वकाल प्रत्यक्ष बहे । स्वर्गमृत्युपाताल में । फैली देखो ॥१३॥
अधोर्ध अष्ट दिशायें । उसका उदक चक्कर लगाये । ज्ञानी जानते उसे । जगदीश समान ही ॥१४॥
अनंत पात्रों में उदक भरा । कुछ झरकर निकल गया । बहुत सारा खर्च हो गया । संसार में ॥१५॥
एक के संग में कडवा । एक के संग में मीठा । एक के संग में तीखा । कसैला क्षार ॥१६॥
जिस जिस पदार्थ से होता मिलाप । उससे हो जाता तद्रूप । सखोल भूमि में होता संचित । सखोलता से ॥१७॥
दिष में विष ही होता । अमृत में मिल जाता । सुगंध में सुगंध होता। दुर्गंधी में दुर्गंध ॥१८॥
गुणी अवगुणी से मिलता । स्वभावानुसार अनुभूत होता । उस उदक का महत्त्व ना समझता । उदकबिना ॥१९॥
उदक बहे अपरंपार । न समझे नदी या सरोवर । जलवास करके रहते नर । कई एक ॥२०॥
उगम के गये पार । वहां देखा पलटकर । तो उदक ही सूख गया आखिर । कुछ नहीं ॥२१॥
वृत्तिशून्य योगेश्वर । उनका देखे विचार । दास कहे बार बार । कितना कहूं ॥२२॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे चंचलनदीनिरूपणनाम समास सातवां ॥७॥

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Last Updated : December 05, 2023

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