चतुर्दश ब्रह्म नाम - ॥ समास नववां - श्रवणनिरूपणनाम ॥

श्रीसमर्थ ने ऐसा यह अद्वितीय-अमूल्य ग्रंथ लिखकर अखिल मानव जाति के लिये संदेश दिया है ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
अब श्रवण करें कैसे । वही कहता हूं समस्त ऐसे । श्रोताओं एकचित्त से । अवधान दें ॥१॥
एक वक्तृत्व कानों पर पड़ता । उससे पूर्व समाधान नष्ट होता । किया निश्चय बिगड़ता । अकस्मात् ॥२॥
त्याग करें वक्तृत्व ऐसे । जो मायिक स्वभाव से । जहां निश्चय के नाम से । शून्याकार ॥३॥
एक ग्रंथ से निश्चय किया । वह दूजे ने उड़ा दिया । जिससे संशय ही बढ़ते गया । जन्मभर ॥४॥
जहां संशय टूटते । आशंका निवृत्ति पाते । अद्वैत ग्रंथ परमार्थ में । श्रवण करें ॥५॥
मोक्ष का अधिकारी जो । परमार्थ पंथ धरे वो । प्रीत लगी अंतरंग में उसको । अद्वैतग्रंथ की ॥६॥
जिसने त्यागा इहलोक । जो परलोक का साधक । वह देखे विवेक । अद्वैत शास्त्र में ॥७॥
जिसे चाहिये अद्वैत । उसके सम्मुख रखते ही द्वैत । उससे क्षोभ हो उठे चित्त । उस श्रोता का ॥८॥
मनभाया अगर मिलता । उससे सुख का ज्वार उठता । अन्यथा जी ऊबता । मानस सुनने पर ॥९॥
जिसकी उपासना जैसे । उसे प्रीति होती वैसे । वहां दूसरें का वर्णन करने से । प्रशस्त ना लगे ॥१०॥
प्रीति का लक्षण ऐसे । भीतर उठती अनायास से । पानी ढलान पर जैसे । दौडता स्वयं ही ॥११॥
वैसे जो आत्मज्ञानी नर । उसे न प्रिय लगे इतर । वहां चाहिये सारासार । विचारना ॥१२॥
जहां कुलदेवी भगवती । वहां चाहिये सप्तशती । अन्य देवों की स्तुति । काम ना आये सर्वथा ॥१३॥
अनंत का व्रत जहां होता । वहां न लगे भगवद्गीता । साधुजनों को वार्ता । फलाशा की नहीं ॥१४॥
वीरकंकण नाक में पहने अगर । शोभा न देता वहां पर । जहां का वहां अन्य स्थान पर । काम ना आये सर्वथा ॥१५॥
अनेक महात्म्य कहे गये । जहां के वहां वंद्य हुये । विपरीत कर पढ़े गये । तो भी लगे विलक्षण ॥१६॥
मल्हारी महात्म्य द्वारका में । द्वारका महात्म्य ले गये काशी में । काशी महात्म्य वेंकटेश में । शोभा न पाये ॥१७॥
ऐसा कहने को है बहुत । मगर जहां का वहीं उचित । वैसे ही ज्ञानियों की प्रीत । अद्वैतग्रंथ की ॥१८॥
योगियों समक्ष जादूगरी ज्ञान । पारखी समक्ष पाषाण । पंडितों के समक्ष डफगान । शोभा न पाये ॥१९॥
वेदज्ञों के समक्ष यति । निस्पृह के समक्ष फलश्रुति । ज्ञानियों के सम्मुख पोथी । कोकशास्त्र की ॥२०॥
ब्रह्मचर्य के सम्मुख नचनी । रासक्रीडा निरूपण में कही। राजहंस समक्ष पानी । रखा जैसे ॥२१॥
अंतनिष्ठों के सम्मुख वैसे । रखा शृंगारिक ग्रंथ जैसे । उसका समाधान कैसे । होगा उससे ॥२२॥
राजा से रंक की आशा । तक्र को कहे पीयुषा । संन्यासी को व्रत जैसा । उच्छिष्ट चांडाली का ॥२३॥
कर्मनिष्ठ को वशीकरण । पंचाक्षरी निरूपण । उससे होता भंग अंतःकरण । सहज ही उसका ॥२४॥
वैसे ही परमार्थिक जन । उन्हें न होने पर आत्मज्ञान । ग्रंथवाचन से समाधान । होगा नहीं ॥२५॥
अस्तु अब रहने दो यह कहना । है जिसे स्वहित करना । वह करें सदा विचरना । अद्वैत ग्रंथों में ॥२६॥
आत्मज्ञानी एकचित्त । वह देखें अद्वैत । एकांत स्थल पर शांत । समाधान ॥२७॥
बहुत प्रकार से देखा जाता । ग्रंथ नहीं अद्वैत सा । परमार्थ में तत्त्चतः । तारता ही है ॥२८॥
इतर जो प्रापंचिक । हास्यविनोद नवरसिक । हित नहीं वह पुस्तक । परमार्थ के लिये ॥२९॥
जिससे परमार्थ बढ़े । अंग में अनुताप चढ़े । भक्तिसाधन लगे मीठे । उसका नाम ग्रंथ ॥३०॥
जिसे सुनते ही गर्व गलता । अथवा भ्रांति का अस्त होता । अथवा अचानक झुकता । मन भगवान की ओर ॥३१॥
जिससे हो उपरति । जिससे अवगुणों की स्थिति पलटती । जिससे चूके अधोगति । इसका नाम ग्रंथ ॥३२॥
जिससे धारिष्ट चढे । जिससे परोपकार गढे । जो विषय वासना तोड़े । उसका नाम ग्रंथ ॥३३॥
जिससे परत्र साधन । जिस ग्रंथ से हो ज्ञान । जिससे होतें पावन । इसका नाम ग्रंथ ॥३४॥
है ग्रंथ बहुत ही । नाना विधान फलश्रुति। जिससे न उपजे विरक्ति भक्ति । वह ग्रंथ ही नहीं ॥३५॥
मोक्षबिना फलश्रुति । वह दुराशा की पोथी । सुनते सुनते ही बढ़ती । दुराशा की स्थिति ॥३६॥
श्रवण में लोभ जहां उपजे । वहां हो विवेक कैसे । बैठे दुराशा के भूत उसे । प्राप्त हो अधोगति ॥३७॥
सुनते ही फलश्रुति । कहते आगे तो भी होगी प्राप्ति। उनके जीवन में अधोगति । सहज ही आयी ॥३८॥
नाना फल पक्षी खातें । उनसे ही तृप्त होते । मगर उस चकोर के चित्त में । बसे अमृत ॥३९॥
वैसे संसारिक मनुष्य । करे संसार की आस । मगर जो भगवान के अंश । भगवान की ही इच्छा रखते ॥४०॥
ज्ञानियों को चाहिये ज्ञान । भजनार्थी को चाहिये भजन । साधक को चाहिये साधन । इच्छानुरूप ॥४१॥
परमार्थी को चाहिये परमार्थ । स्वार्थी को चाहिये स्वार्थ । कृपण को चाहिये अर्थ । मन से ॥४२॥
योगियों को चाहिये योग । भोगियों को चाहिये भोग । रोगियों को चाहिये रोग । हरने वाली मात्रा ॥४३॥
कवि को चाहिये प्रबंध । तार्किक को तर्कवाद । भाविक को संवाद । प्रिय लगे ॥४४॥
पंडित को चाहिये व्युत्पत्ति । विद्वानों को अध्ययन प्रीति । कलावंतों की प्रीति । नाना कला ॥४५॥
हरिदास को प्रिय कीर्तन । शुचिष्मंतों को संध्यास्नान । कर्मनिष्ठों को विधिविधान । चाहिये ॥४६॥
प्रेमी को चाहिये करुणा । दक्षता चाहिये विचक्षणा । चातुर्य देखे सयाना । आदरसहित ॥४७॥
भक्त करे मूर्तिध्यान । संगीतज्ञ देखे तालज्ञान । रागज्ञानी तानमान । मूर्च्छना देखे ॥४८॥
योगाभ्यासी पिंडज्ञान । तत्त्वज्ञानी तत्त्वज्ञान । नाडीज्ञानी मात्राज्ञान । देखता है ॥४९॥
कामुक देखे कोकशास्त्र । चेटकी देखे चेटकीमंत्र । यंत्री देखे नाना यंत्र । आदरसहित ॥५०॥
हंसोड को भाता विनोद । उन्मत्त को नाना छंद । तामसी को अप्रमाद । प्रिय लगे ॥५१॥
मूर्ख होता नादलुब्धि । निंदक देखे न्यून संधि । पापी देखे पाप बुद्धि । लाकर शरीर में ॥५२॥
एक को चाहिये रसाल । एक को शब्दों का कोलाहल । एक को चाहिये केवल । भोली भक्ति ॥५३॥
आगमी देखे आगम । शूर देखे संग्राम । कोई देखता नाना धर्म । इच्छानुसार ॥५४॥
मुक्त देखे मुक्तलीला । सर्व देखे सर्व कला । ज्योतिषी भविष्य पिंगला । वर्णन करना चाहे ॥५५॥
ऐसे कहें वे कितने । जो प्रिय लगे वह सुने । नाना पुस्तक पढ़ते । सर्वकाल ॥५६॥
मगर परत्रसाधन के बिन । न कहें उसे श्रवण । जहां नहीं आत्मज्ञान । उसका नाम मनोरंजन ॥५७॥
माधुर्य बिन मीठापन । नाक बिन सुलक्षण। ज्ञान बिन निरूपण । कहो ही नहीं ॥५८॥
अस्तु अब हुआ बहुत । सुनिये परमार्थ ग्रंथ । परमार्थ ग्रंथ बिन व्यर्थ । है सब उलझन ॥५९॥
इस कारण नित्यानित्यविचार । जिसमें है कथित सारासार । वही ग्रंथ भवसागर के पार । ले जाता विवेक से ॥६०॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे श्रवणनिरूपणनाम समास नववां ॥९॥

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Last Updated : December 04, 2023

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