चतुर्दश ब्रह्म नाम - ॥ समास छठवां - बद्धमुक्तनिरूपणनाम ॥

श्रीसमर्थ ने ऐसा यह अद्वितीय-अमूल्य ग्रंथ लिखकर अखिल मानव जाति के लिये संदेश दिया है ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
अद्वैत ब्रह्म निरूपित किया । जो कल्पनारहित व्याप्त रहा । क्षण एक तदाकार किया । मुझे इस निरूपण ने ॥१॥
तभी मैं तदाकार हो जाऊं । ब्रह्म ही बनकर रहूं। पुनः संसारमें न आऊं । चंचलता से सर्वथा ॥२॥
कल्पनारहित जो सुख । वहां नहीं संसारदुःख । इस कारण वही एक । होकर रहूं ॥३॥
ब्रह्म ही हो जायें श्रवण से। पुनः वृत्तिपर आना पडे । सदा आना जाना ऐसे । चूकता नहीं ॥४॥
मन अंतरिक्ष में जाये । क्षण एक ब्रह्मही होये । पुनः वहां से गिर जाये । वृत्ति पर पहले जैसे ॥५॥
‍प्रत्यावृत्ति सैरभैर । चक्कर लगाऊं कितनी बार । धागे से बांधकर पैर । कीटक जैसे ॥६॥
उपदेशकाल में तदाकार । होते ही छूटे यह शरीर । अथवा न समझे आपपर । ऐसा होना चाहिये ॥७॥
ऐसे ना होते जो संवाद । वही लगता लज्जास्पद । ब्रह्म होकर संसार में रत। यह भी दिखे विपरीत ॥८॥
जो स्वयं ही ब्रह्म हुआ । वह लौटकर कैसे आया । ऐसा ज्ञान मुझे ही मेरा । न लगे प्रशस्त ॥९॥
ब्रह्म होकर ही रहे । अथवा संसार में ही रहे । दोनो ओर भटके । कितने और कब तक ॥१०॥
निरूपण में ज्ञान प्रबल होये । उठ जाते ही लुप्त होये । फिर से काम क्रोध खौल उठे । ब्रह्मरूप में ॥११॥
ऐसे कैसे ब्रह्म हुआ । दोनों छोर से दूर हुआ । खींचातानी में ही गया । जीवन उसका ॥१२॥
लेते ही ब्रह्मसुख की मधुरता । संसार पीछे खींचता । जब संसार को सम्हालता । प्रीति उपजे ब्रह्म में ॥१३॥
ब्रह्मसुख ले गया संसार । संसार खोया ज्ञान के द्वार । दोनों अधूरे पर । पूरा एक भी नहीं ॥१४॥
इस कारण से मेरा चित्त । चंचल हुआ दुश्चित । क्या करूं निश्चित । कुछ भी नहीं ॥१५॥
ऐसा श्रोता करे विनती । रहूं मै कौन से रीति । कहें अखंड मेरी मति । ब्रह्माकार नहीं ॥१६॥
अब इसका प्रत्युत्तर । वक्ता देगा सुंदर । हो श्रोता निरूत्तर । क्षण एक ॥१७॥
ब्रह्म ही होकर जो मृत हुये । वे ही मुक्त पद पायें। बाकी वे क्या डूब गये । व्यासादि ॥१८॥
श्रोता आगे करे विनती । शुको मुक्तो वामदेवो वा यह श्रुति । आदि अंत में दोनो को ही मुक्ति । कहती है ॥१९॥
वेदों ने किये बद्ध सर्व । मुक्त शुक वामदेव । वेदवचनों में अभाव । कैसे मानें ॥२०॥
ऐसे श्रोता ने वेदाधार से । दिये प्रत्युत्तर ऐसे । दोनों ही मुक्त यह अत्यादर से । प्रतिपादित किया ॥२१॥
वक्ता कहे इस पर । दोनों ही मुक्त इस सृष्टि पर । रह जाता ऐसा कहने पर । कौन है ॥२२॥
बहु ऋषि बहु मुनि । सिद्ध योगी आत्मज्ञानी । हो गये पुरुष समाधानी । असंख्यात् ॥२३॥

॥ श्लोक ॥    
प्रहादनारदपराशरपुंडरीक
व्यासांबरीषशुकशौनक भीष्मदाल्भ्यान् ।
रुक्मांगदार्जुनवसिष्ठविभीषणादीन्
पुण्यानिमान्परम्भागवतात्सरामि ॥१॥

कविर्हरिरंतरिक्षः प्रबुद्धः पिप्पलायनः । आविर्होत्रोऽथद्द्रुमिलश्चमसः करभाजनः ॥२३॥
इनसे महान श्रेष्ठतर । ब्रह्माविष्णुमहेश्वर । आदि से लेकर दिगंबर । विदेहादिक ॥२४॥
शुक वामदेव मुक्त हुये । अन्य ये सभी डूब गये । इस वचन पर विश्वास किये । वे पढतमूर्ख ॥२५॥
तब वेदों में कैसा कहा गया । उसे क्या आपने मिथ्या किया । सुनकर वक्ता ने दिया । प्रत्युत्तर ॥२६॥
वेदों ने कहा पूर्वपक्ष । मूर्ख उसपर ही देते लक्ष। साधु और व्युत्पन्न दक्ष । वे यह मानते नहीं ॥२७॥
तथापि अगर यह मान लिया। तो वेदसामर्थ्य डूब गया । वेदों से उद्धार हुआ । न सुना किसी का ॥२८॥
वेदांगों में सामर्थ्य ना रहता । तो इन वेदों को कौन पूछता । इस कारण वेदों में सामर्थ्य रहता । जन उद्धार का ॥२९॥
वेदाक्षर मिलतें जिसे । पुण्यराशि कहतें उसे । इस कारण वेदों में सामर्थ्य की ऐसे । क्या कमी ॥३०॥
वेदशास्त्रपुराण । भाग्य से होनेपर श्रवण । इससे होते है पावन । ऐसे कहतें है साधु ॥३१॥
श्लोक अथवा श्लोकार्ध । या अन्यथा श्लोकपाद । श्रवण होते ही एक शब्द । जातें नाना दोष ॥३२॥
वेदशास्त्र पुराणों में। सामर्थ्य ऐसे वाक्यों में। अगाध महिमा व्यासवाणी ये। कह गई ॥३३॥
एक अक्षर होते ही श्रवण । तत्काल ही होतें पावन । ऐसे ग्रंथ की महिमान । जगह जगह कही गई ॥३४॥
दोनों को छोड तीसरे का न हो उद्धार । तो महिमा कैसे बची रहे फिर । अस्तु यह जानतें चतुर । अन्यों के लिये उलझन ॥३५॥
वेदशास्त्र और पुराण । कैसे होंगे अप्रमाण । दोनों को छोड़ तीसरे का कौन । करेगा उद्धार ॥३६॥
कहते हो जो गिरा होकर काष्ठवत । वही एक हुआ मुक्त । शुक ने भी किये अनुवादित । नाना निरूपण ॥३७॥
शुक मुक्त ऐसे वचन । वेदों ने कहा यह प्रमाण । मगर वह न थे अचेतन । ब्रह्माकार ॥३८॥
अचेतन ब्रह्माकार । अगर होते शुक योगेश्वर । तो भी सारासार विचार । कहते न बने ॥३९॥
जो ब्रह्माकार हुआ । वह काष्ठ होकर गिरा । शुक ने भागवत कहा। परीक्षित सम्मुख ॥४०॥
निरूपण यह सारासार । कहना चाहिये विचार । खोजे सचराचर । दृष्टांत हेतु ॥४१॥
क्षण एक ब्रह्म ही होये । क्षण एक दृश्य खोजें । नाना दृष्टांतों से संपादन करे । वक्तृत्व को ॥४२॥
अस्तु भागवत निरूपण । शुक ने स्वयं किया कथन । उसे बद्ध का विशेषण । न लगायें ॥४३॥
इस कारण चलते बोलते । निश्चेष्ट ना होकर रहते । सायुज्यता मुक्ति पाते । सद्गुरुबोध से ॥४४॥
एक मुक्त एक नित्यमुक्त । एक जानिये जीवन्मुक्त । एक योगी विदेहमुक्त । समाधानी ॥४५॥
सचेतन वह जीवन्मुक्त । अचेतन वह विदेहमुक्त । दोनों से अलग नित्यमुक्त । जानें योगेश्वर को ॥४६॥
स्वरूपबोध में स्तब्धता । उसे जानिये तटस्थता । तटस्थता और स्तब्धता । ये देहसंबंध से ॥४७॥
यहां अनुभव ही कारण । बाकी सब निःकारण । तृप्ति पायें स्वयं । अपने स्वानुभव से ॥४८॥
आकंठ भोजन किया । उसे भूखा कह दिया । इस शब्द से विचलित हुआ । ये तो होये ना ॥४९॥
स्वरूप में नहीं देह । वहां कैसा संदेह । बद्ध मुक्त ऐसा भाव । देह के पास केवल ॥५०॥
देहबुद्धि के चिंतन से । मुक्त ब्रह्मादि भी न होते । वहां शुक को गति कैसे । मुक्तपन की ॥५१॥
मुक्तपन यही बद्ध । मुक्त बद्ध यह अबद्ध । सस्वरूप स्वतःसिद्ध । बद्ध ना मुक्त ॥५२॥
पेटपर मुक्तपन की शिला । बांधते ही जायेगा पाताला । देहबुद्धि को सम्हाला । तो सस्वरूप में ना शोभे ॥५३॥
मैंपन से छूट गया । वही एक मुक्त हुआ । गूंगा अथवा कुछ बोला । फिर भी वह मुक्त ॥५४॥
जिसे बांधना ही हो व्यर्थ । वहां कैसे मुक्त भावार्थ । देखने जाओ तो सकल व्यर्थ । गुणवार्ता ॥५५॥

॥ श्लोक ॥    
बद्धो मुक्त इति व्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः ।
गुणस्य मायामूलत्वान्न मे मोक्षो न बंधनम् ॥छ ॥

तत्त्वज्ञाता परम शुद्ध । उसके लिये नहीं मुक्त बद्ध । मुक्त बद्ध यह विनोद । मायागुण से ॥५६॥
नामरूप ये हटे जहां से । वहां मुक्तपन बचे कैसे । मुक्त बद्ध ये विस्मरण से भूल गये ॥५७॥
बद्ध मुक्त हुआ कौन । वह तो नहीं मैं स्वयं । बद्धक जानों मैंपन । धारक को बाधा दे ॥५८॥
एवं यह सारा भ्रम । अहंता का हुआ श्रम । मायातीत जो विश्राम । सेवन नहीं हुआ ॥५९॥
अस्तु बद्धता और मुक्तता । आई कल्पना केमाथा । वह कल्पना भी तत्त्वतः । सच है ॥६०॥
इसलिये यह मृगजल । माया झूठी जैसे बादल । स्वप्न मिथ्या तत्काल । जागृति आते ही ॥६१॥
स्वप्न में बद्ध मुक्त हुआ । वह जागृत ही नहीं हुआ। कैसा कौन क्या हुआ। कुछ समझे ना ॥६२॥
इसलिये मुक्त विश्वजन । जिन्हें हुआ आत्मज्ञान । शुद्ध ज्ञान से मुक्तपन । होता समूल ब्यर्थ ॥६३॥
बद्ध मुक्त का संदेह । धरे कल्पना का देह । साधु सदा निःसंदेह । देहातीत वस्तु ॥६४॥
अब रहने दो यह आगे ऐसे । भविष्य में रहें कैसे । यही निरूपण सावधानी से । श्रोता श्रवण करें ॥६५॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे बद्धमुक्तनिरूपणनाम समास छठवा ॥६॥

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Last Updated : December 04, 2023

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