Dictionaries | References

बृहस्पति

See also :
BṚHASPATI
The name of the regent of the planet Jupiter, the Guru or preceptor of the gods. 2 The planet Jupiter. 3 Applied, appellatively, to an eloquent or a wise man, a Nestor or an Ulysses: also, or बोलून बृहस्पति, to an insolent or a troublesome prater.
 पु. 
देवांचा गुरु . विस्मित जाहला बृहस्पती । आश्चर्य मानिती सुरवर । - एरुस्व ३ . ७ .
नवग्रहांपैकीं पांचवा ग्रह .
( ल . ) उत्तम वक्ता ; विद्वान
( ल . ) मूर्ख . हे बृहस्पती अशा एकेक विपरीत गोष्टी करणारे आहेत कीं अनुमान करतां येत नाहीं . - विक्षिप्त १ . ५२ . [ सं . ]
०वार   बृहस्पतवार - पु . गुरुवार . बोलून बृहस्पति - वि . मूर्खपणाची व बाष्कळ बडबड करणारा .
n.  एक वैदिक देव, जो बुद्धि, युद्ध एवं यज्ञ का अधिष्ठाता माना जाता है । इसे ‘सदसप्ति’, ‘ज्येष्ठराज’ तथा ‘गणपति’ नाम भी दिये गये हैं [ऋ.१.१८.६-७,२.२३.१] । बृहदारण्यक उपनिषद में बृहस्पति को वाणी का पति (बृहती+पति=वाणी+पति) माना गया है [बृ.उ.१.३.२०-२१] । मैत्रायणी संहिता एवं शथपथ ब्राह्मण में इसे ‘वाचस्पति’ (वाच का स्वामी) कहा गया है [मै. सं.२.६];[ श. ब्रा.१४.४.१] । वैदिकोत्तर साहित्त्य में, इसे बुद्धि एवं वाक्पटुता का देवता के रुप में व्यक्त किया गया है । इस देवता का ऋग्वेद में प्रमुख स्थान है, एवं उसमें ग्यारह सम्पूर्ण सूक्तों द्वारा इसकी स्तुति की गयी है । दो सूक्तो में इन्द्र के साथ युगुलरुप में भी इसकी गुणावली गायी गई है [ऐउ.४.४९, ७.९७] । इस ग्रन्थ में बृहस्पति नाम प्रायः एक सौ बीस बार, एवं ‘ब्रह्मणस्पति’ के रुप में इसका नाम लगभग पचास बार आया है । ऋग्वेद के लोकपुत्र नामक सूक्त के प्रणयन का भी श्रेय इसे प्राप्त है [ऋ.१०.७१-७२]
जन्म n.  उच्चतम आकाश के महान् प्रकाश से बृहस्पति का जन्म हुआ था । जन्म होते ही इसने अपनी महान तेजस्वी एवं गर्जना द्वारा अन्धकार को जीत कर उसका हरण किया [ऎउ.४.५०, १०.६८] । इसे दोनों लोगों की सत्नान, तथा त्वष्टु द्वारा उत्पन्न हुआ भी कहा जाता है [ऋ.७.९७, २.२३] । जन्म की कथा के साथ साथ यह भी निर्देश प्राप्त होता है की, यह देवों का पिता है, तथा इसने लुहार की भॉंति देवों को धमन द्वारा उत्पन्न किया है [ऋ.१०.७२]
रुप-वर्णन n.  ऋग्वेद के सूक्तों में इसके दैहिक गुणों का सांगोपांग वर्णन तो नहीं मिलता, फिर भी उसकी एक स्पष्ट झ्लक अवश्य प्राप्त है । यह सप्त-मुख एवं सप्त सप्त-रश्मि, सुन्दर जिह्रावाला, तीक्ष्ण सींघोंवाला, नील पृष्ठवाला तथा शतपंखोंवाला वर्णित किया गया है [ऋ.४.५०,१.१९०, १०.१५५, ५.४३, ९.९७] । इसका वर्ण स्वर्ण के समान अरुणिम आभायुक्त है, तथा यह उज्वल, विशुद्ध तथा स्पष्ट वाणी बोलनेवाला कहा गया है [ऋ.३.६२, ५.४३, ७.९७] । इसके पास एक धनुष्य है, जिसकी प्रत्यंचा ही ‘ऋत’ है; एवं अनेक श्रेष्ठ बाण हैं, जिन्हें शस्त्र के रुप में प्रयोग करता है [ऋ. २.२४];[ अ. वे.५.१८] । यह स्वर्ण कुठार एवं लौह कुठार धारण करता है, जिसे त्वष्टा तीक्ष्ण रखता है [ऋ.७.९७, १०.५३] । इसके पास एक सुन्दर रथ है । यह ऐसे ऋत रुपी रथ पर खडा होता है, जो राक्षसों का वध करनेवाला, गाय के गोष्टों को तोडने वाला, एवं प्रकाश पर विजय प्राप्त करनेवाला है । इसके रथ को अरुणिम अश्व खींचते हैं [ऋ.१०.१०३, २.२३]
गुण-वर्णन n.  बृहस्पति को ‘ब्रह्मणस्पति’ (स्तुतियों का स्वामी) कहा गया है, क्यों कि, यह अपने श्रेष्ठ रथ पर आरुढ होकर देवों तथा स्तुतियों के शत्रुओं को जीतता है [ऋ.२.२३] । इसी कारण यह द्रष्टाओं में सर्वश्रेष्ठ एवं स्तुतियों का श्रेष्ठतम अधिराज कहा गया है [ऋ.२.२३] । यह समस्त स्तुतियों को उत्पन्न एवं उच्चारण करनेवाला है [ऋ.१.१०९, १.४०] । यह मानवीय पुरोहितों को स्तुतियों प्रदान करनेवाला देव है [ऋ.१०.९८.२७] । बृहस्पति एक पारिवारिक पुरोहित है [ऋ.२.२४] । इसे दोनों लोकों में गर्जन करनेवाला, प्रथमजन्मा, पवित्र, पर्वतों में बुद्धिमान, वृत्रों (वृत्राणि) का वध करनेवाला, दुर्गा को छिन्न-भिन्न करनेवाला, तथा शत्रुविजेता कहा गया है [ऋ.६.७३] । यह शत्रुओं को रण में पछाडनेवाला, उनका दमन करने वाला, युद्धभूमि में असाधारण योद्धा है, जिसे कोई जीत नहीं सकता [ऋ.१०.१०३, २.२३, १.४०] । इसीलिए युद्ध के पूर्व आह्रान करनेवाले देवता के रुप में इसका स्मरण किया जाता है [ऋ.२.२३] । इन्द्रपुराणकथा में, गायों को मुक्त करनेवालों में, अग्नि की भॉंति बृहस्पति का भी नाम आता है । बृहस्पति ने जब गोष्ठों को खोला तथा इन्द्र को साथ लेकर अन्धकार द्वारा आवृत जलस्त्रोतों को मुक्त किया तब पर्वत इनके वैभव के आधीन हो गया [ऋ.२.२३] । अपने गायकदल के साथ, इसने गर्जना करते हुए ‘बल’ को विदीर्ण किया; तथा अपने सिंहनाद द्वारा रेंभती गायों को बाहर कर दिया [ऋ.४.५०] । पर्वतों से गायों को ऐसा मुक्त किया गया, जिस प्रकार एक निष्प्राण अण्डे को फोड कर जीवित पक्षी उन्मुक्त किया जाता है [ऋ.१०.६८] । बृहस्पति त्रितायुओं का हरणकर्ता एवं समृद्धि प्रदाता देव के रुप में, अपने भक्तों द्वारा स्मरण किया जाता है [ऋ.२.२५] । यह एक ओर भक्तों को दीर्घव्याधियॉं से मुक्त करता है, उनके समस्त संकटो, विपत्तियों शापों तथा यंत्रणाओं का शमन करता है [ऋ.१.१८, २.२३]; तथा दूसरी ओर उन्हें वांछित फल, सम्पत्ति, बुद्धि तथा यंत्रणाओं का शमन करता है [ऋ.१.१८, २.२३]: तथा यंत्रणाओं का शमन करता है [ऋ.१.१८, २.२३]; तथा दूसरी ओर उन्हें उन्हें वांछित फल, सम्पत्ति, बुद्धि तथा समृद्धि से सम्पन्न करता है [ऋ.७.१०.९७] । बृहस्पति मूलतः यज्ञ को संपन्न करनेवाला पुरोहित है, अतएव इसका एवं अग्नि का सम्बन्ध अविछिन्न है । मैक्स मूलर इसे अग्नि का एक प्रकार मानता है । रौथ कहता है, ‘यह पौरोहित्य प्रधान देवता स्तुति की शक्ति का प्रत्यक्ष प्रतिरुप है’। चतुविंश तथा अन्य याग इसके नाम पर उल्लिखित है [तै. सं.७.४.१] । इसके नाम पर कुछ सोम भी है, जिसके स्वरों के गायन की तुलना क्रौंच पक्षी के शब्दों से की गयी है [छां.उ.१.२.११] । इसके पत्नी का नाम धेना था [गो.ब्रा.२-९] । धेना का अर्थ ‘वाणी’ है । इसकी जुहू नामक एक अन्य पत्नी का भी उल्लेख प्राप्त है । कई अभ्यासकों के अनुसार, आकाश के सौरमंडल में स्थित बृहस्पति नामक नक्षत्र यही था । इसकी पत्नी का भी उल्लेख प्राप्ति है । कई अभ्यासकों के अनुसार, आकाश के सौरमंडल में स्थित बृहस्पति नामक नक्षत्र यही था । इसकी पत्नी का नाम तारा था, जिने सोम के द्वारा अपहार किया गया था । बृहस्पति की पत्नी तारा से सोम को बुध नामक पुत्र भी उत्पन्न हुआ था [वायु.९०.२८-४३];[ ब्रह्म.९.१९-३२];[ म.उ.११५.१३] । ज्योतिर्विदों के अनुसार बृहस्पति के इस कथा में निर्दिष्ट सोम, तारा बुध एवं बृहस्पति ये सारे सौरमंडल में स्थित विभिन्न नक्षत्रों के नाम हैं (बुध देखिये(।
देवगुरु
गुरुग्रह. ( उप.) वाचाट
बडबड्या.
 m  The planet Jupiter. App. appellatively to an eloquent or a wise man.
  |  
  |  
: Folder : Page : Word/Phrase : Person

Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.