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बलि

See also:  बळि , बळी
A Sanskrit English Dictionary | sa  en |   | 
बलि  m. m. (perhaps fr.भृ) tribute, offering, gift, oblation (in later language always with √ हृ), [RV.] &c. &c.
tax, impost, royal revenue, [Br.]; [Mn.]; [MBh.] &c.
भूत-यज्ञ   any offering or propitiatory oblation (esp. an offering of portions of food, such as grain, rice &c., to certain gods, semi-divine beings, household divinities, spirits, men, birds, other animals and all creatures including even lifeless objects; it is made before the daily meal by arranging portions of food in a circle or by throwing them into the air outside the house or into the sacred fire; it is also called and was one of the 5 महा-यज्ञस्, or great devotional acts; cf.[RTL. 411, 421]), [GṛŚrS.]; Mn. esp. iii, 69, 71; [MBh.] &c. (often ifc. with the object, the receiver, the time, or the place of the offering)
fragments of food at a meal, [W.]
a victim (often a goat or buffalo) offered to दुर्गा, [MW.]
the handle of a chowrie or fly-flapper, [Megh.]
N. of a दैत्य (son of विरोचन; priding himself on his empire over the three worlds, he was humiliated by विष्णु, who appeared before him in the form of a वामन or dwarf. son of कश्यप and अदिति and younger brother of इन्द्र, and obtained from him the promise of as much land as he could pace in three steps, whereupon the dwarf expanding himself deprived him of heaven and earth in two steps, but left him the sovereignty of पाताल or the lower regions), [MBh.]; [Pur.] &c. (cf.[IW. 328])
N. of इन्द्र in the 8th मन्व्-अन्तर, [Pur.]
of a मुनि, [MBh.]
of a king, ib.; [Pañcat.]
वलि   of a son of सु-तपस्, [Hariv.]; [Pur.] (cf.).

बलिः [baliḥ]   [बल्-इन्]
An oblation, a gift or offering (usually religious); नीवारबलिं विलोकयतः [Ś.4.21;] [U.1.5.]
The offering of a portion of the daily meal of rice, grain, ghee &c. to all creatures, (also called भूतयज्ञ), one of the five daily Yajñas to be performed by a householder; see [Ms.3.67,91;] it is usually performed by throwing up into the air, near the housedoor, portions of the daily meal before partaking of it; यासां बलिः सपदि मद्गृहदेहलीनां हंसैश्च सारसगणैश्च विलुप्तपूर्वः [Mk.1.9.]
Worship, adoration; [Rām.2.3.] 8; अवचितबलिपुष्पा वेदिसंमार्गदक्षा [Ku.1.6;] [Me.57;] अव- चितानि बलिकर्मपर्याप्तानि पुष्पाणि [Ś.4.]
Fragments of food left at a meal.
A victim offered to a deity.
A tax, tribute, impost; also 'religious tax'; (cf. सीता, भागो, बलिः, करो......च राष्ट्रम्); [Kau.A.2.6.24;] प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत् [R.1.18;] [Ms.7.8;8.37;] प्रजिघाय बलिं तथा [Śiva.B.29.42;] न चाजिहीर्षीद् बलिमप्रवृत्तम् [Bu. Ch.2.44.]
The handle of a chowrie.
 N. N. of a celebrated demon; येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः Rakṣābandhanamantra. [He was a son of Virochana, the son of Prahlāda. He was a very powerful demon and oppressed the gods very much. They, therefore, prayed to Viṣṇu for succour, who descended on earth as a son of Kaśyapa and Aditi in the form of a dwarf. He assumed the dress of a mendicant, and having gone to Bali prayed him to give him as much earth as he could cover in three steps. Bali, who was noted for his liberality, unhesitatingly acceded to this apparently simple request. But the dwarf soon assumed a mighty form, and began to measure the three steps. The first step covered the earth, the second the heavens; and not knowing where to place the third, he planted it on the head of Bali and sent him and all his legions to the Pātāla and allowed him to be its ruler. Thus the universe was once more restored to the rule of Indra; cf. छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन [Gīt. 1;] [R.7.35;] [Me.59.] Viṣṇu is said to still guard his door in Pātāla. He is one of the seven Chirajivins; cf. चिरजीविन्].
-लिः  f. f.
A fold, wrinkle &c. (usually written वलि q. v.).
The fold of skin in stout persons or females.
The ridge of a thatched roof.-Comp.
-करः   a.
paying tribute.
offering sacrifices.
producing wrinkles.
-करम्भः   a sacrificial cake.
-कर्मन्  n. n.
offering oblations to all creatures.
the act of worshipping.
payment of tribute.-क्रिया a line on the forehead; नतभ्रुवो मण्डयति स्म विग्रहे बलिक्रिया चातिलकं तदास्पदम् [Ki.8.52.]
दानम् presentation of an offering to a deity.
-द्विष्, -ध्वंसिन्  m. m. an epithet of Viṣṇu.-नन्दनः,
-पुत्रः, -सुतः   epithets of Bāṇa, the son of Bali.-पुष्टः a crow; भ्रमेण द्रष्टुं बलिपुष्टलोकः समापतत्याशु तमिस्ररूपः [Rām. Ch.6.25.]
-प्रियः   the Lodhra tree.
-बन्धनः   an epithet of Viṣṇu.
-भुज्  m. m.
a crow; अहो अधर्मः पालानां पीव्नां बलिभुजामिव [Bhāg.1.18.33.]
a sparrow.
a crane.-भृत् a. tributary.
-भोजः, -भोजनः   a crow; द्वितीयो बलिभोजानां (पन्थाः) [Rām.4.58.25.]
-मन्दिरम्, -वेश्मन्, -सद्मन्  n. n. the lower regions, the abode of Bali.
-मुखः   a monkey.
-विधानम्   the offering of an oblation.-व्याकुल a. engaged in worship or in offering oblations to all creatures; आलोके ते निपतति पुरा सा बलिव्याकुला वा [Me.87.]
-षड्भागः   the sixth part as a tribute; अरक्षितारं राजानं बलिषड्भागहारिणम् [Ms.8.38.]
-हन्  m. m. an epithet of Viṣṇu.
-हरणम्   an offering of oblations to all creatures.
-होमः   the offering of oblations.

Shabda-Sagara | sa  en |   | 
बलि  m.  (-लिः)
1. Tax, royal revenue.
2. An oblation, religious offering in general.
3. The handle of a Chowrie or fly-flapper.
4. Presenta- tion of food to all created beings, one of the five great sacraments of the Hindu religion: it consists in throwing a small parcel of the offering Ghee or rice, or the like, into the open air at the back of the house.
5. The sacrifice of an animal, or raw flesh offered to the goddess DURGĀ.
6. Fragments of food left at an oblation or a meal.
7. An animal, or one which is fit for an oblation.
8. Three- folds of skin at the end of the rectum.
9. A king, and Daitya, also MAHĀBALI, the virtuous sovereign of Mahābalipur, tricked out of the dominion he had obtained over earth and heaven, by VISH- ṆU, in the Vāmana or dwarf Avatar, and left in consideration of his merits, the sovereignty of Pātāla, or the infernal regions. f. (-लिः-ली)
1. A wrinkle, skin shrivelled by old age.
2. The fold of skin in stout persons, especially females, upon the upper part of the belly, or between the ensiform cartilage and the navel.
3. The ridge of a thatch.
E. बल् to live, or बध् to hurt or kill, changed to ल, aff. इन् or इ .

A dictionary, Marathi and English | mr  en |   | 
A religious sacrifice or offering in general, an oblation. v दे g. or acc. of o. 2 The flowers and other articles constituting the materials of देवपूजा. 3 also named महाबलि, A king and titan or दैत्य. See महाबलि.

 पु. 
देव , पिशाच यांना अर्पण करावयाचें अन्न , पशु , पक्षी इ० ( क्रि० देणें ).
बलिदानाचे वेळचें देवपूजेचें साहित्य ( पुष्पादिक ).
बलि नामक राजा ; दैत्य ; महाबलि पहा . - वि . बळकट ; सशक्त . [ सं . ]
०दान   प्रदान - न .
बली अर्पण करणें ; दान ; शांति इ० कांत उडीद मिसळलेल्या भातावर किंवा कोहळ्यावर गुलाल टाकून त्यावर जळतां कांकडा लावून तो शिप्तरांत ठेवून तो मनुष्यादिकावरुन ओवाळून देवतांस अर्पण करितात तें भक्ष्य . पीडा निवारुं बळिदान देणें । - दावि १७२ .
नजराणा . कांहीं बळिदान अंगीकारा माझें । - एभा ४ . १०० . [ सं . ]
०प्रतिपदा  स्त्री. कार्तिक शुद्ध प्रतिपदा . [ सं . ]
०हरण  न. भूतयज्ञ .

बलि n.  एक सुविख्यात असुर, जो वामनावतार में श्रीविष्णु द्वारा पाताल में ढकेल दिया गया था (बलि वैरोचन देखिये) ।
बलि (आनव) n.  (सो. अनु.) पूर्व आनव प्रदेश का सुविख्यात राजा, जो सुतपस् राजा का पुत्र था । यह इक्ष्वाकुवंशीय सगर राजा का समकालीन था । आनव प्रदेश शुरु में आधुनिक मोंघीर तथा भागलपुर प्रान्तों में सीमित था । किन्तु अपने पराक्रम के कारण, इसने अपना साम्राज्य काफी बढा कर, पूर्व हिंदुस्तान का सारा प्रदेश उसमें समाविष्ट कराया । हरिवंश के अनुसार, पूर्वजन्म में वह बलि वैरोचन नामक सुविख्यात दैत्य था । अपनी प्रजा में यह अत्यंत लोकप्रिय था, एवं उन्हींके अनुरोध पर इसने अगले जन्म में बलि आनव नाम से पुनः जन्म लिया । इसने ब्रह्मा की कठोर तपस्या की थी, जिस कारण ब्रह्मा ने से वर दिये, ‘तुम महायोगी बन कर कल्पान्त तक जीवित रहोगे । तुम्हारी शक्ति अतुल होगी, एवं युद्ध में तुम सदा ही अजेय रहोगे । अपनी प्रजा में तुम लोकप्रिय रहोगे, एवं लोग सदैव तुम्हारे आज्ञा का पालन करेंगे । धर्म के सारे रहस्य तुम्हे ज्ञात होंगे, एवं तुम्हारे धर्मसंबंधी विचार धर्मविज्ञों में मान्य होगे । धर्म को सुसंगठित रुप दे कर, तुम अपने राज्य में चातुर्वर्ण्य की स्थापना करोगे’ [ह.वं.१.३१.३५-३९] । इसकी पत्नी का नाम सुदेष्णा था । काफी वर्षो तक इसे पुत्र की प्राप्ति न हुयी थी । फिर दीर्घमतस औचथ्य मामतेय नामक ऋषि के द्वारा इसने सुदेष्णा से पॉंच पुत्र उत्पन्न कराये (दीर्घतमस् देखिये) । दीर्घतमस् ऋषि से उत्पन्न इसके पुत्रो के नाम निम्न थेः
बलि (वैरोचन) n.  एक सुविख्यात विष्णुभक्त दैत्य, जो प्रह्राद का पौत्र एवं विरोचन का पुत्र था । इसकी माता का नाम देवी था [म.आ.५९.२०];[ म.स. ९.१२];[ म.शां.२१८.१];[म.अनु.९८];[ भा.६.१८.१६,८.१३];[ वामन. २३.७७] । स्कंद मे इसकी माता का नाम सुरुचि दिया गया है [स्कंद. १.१.१८] । विरोचन का पुत्र होने से, इसे ‘वैरोचन’ अथवा ‘वैरोचनि’ नामान्तर प्राप्त थे । इसे महाबलि नामांतर भी प्राप्त था, एवं इसकी राजधानी महाबलिपुर में थी । ‘आचाररत्न’ में दिये गये सप्तचिरंजीव पुण्यात्माओं में बलि का निर्देश प्राप्त है [आचार. पृ.१०] । बाकी छः चिरंजीव व्यक्तिओं के नाम इस प्रकार हैः
बलि (वैरोचन) n.  बलि दैत्यों का राजा था [वामन.२३] । दैत्यराज होते हुए भी, यह अत्यंत आदर्श, सत्त्वशील एवं परम विष्णुभक्त सम्राट था [ब्रह्म.७३];[ कूर्म. १.१७];[ वामन.७७-९२] । दैत्यलोग एवं उनके राजा पुराण एवं महाभारत में बहुशः असंस्कृत, वन्य एवं क्रूर चित्रित किये जाते है । बाण, गयासुर एवं बलि ये तीन राजा पुराणों में ऐसे निर्दिष्ट है कि, जो परमविष्णुभक्त एवं शिवभक्त होते हुए भी, देवों ने उनके साथ अत्यंत क्रूरता का व्यवहार किया, एवं अंत में अत्यंत निर्घृणता के साथ उनका नाश किया । डॉ. राजेंद्रलाल मित्र, डॉ. वेणिमाधव बारुआ आदि आधुनिक विद्वानों ने पुराणों मे निर्दिष्ट इन असुरकथाओं के इस विसंगति पर काफी प्रकाश डाला है । संभव यही है कि, देव एवं दैत्यों का प्राचेन विरोध सत् एवं असत् का विरोध न होकर, दो विभिन्न ज्ञाति के लोगो का विरोध था, एवं बलि, बाण एवं गयासुर केवल देवों के विपक्ष में होने के कारण देवों ने उनका नाश किया हो ।
बलि (वैरोचन) n.  एक बार श्रीविष्णु ने किंचित्काल के लिये देवों के पक्ष का किया । यह सुसंधी जान कर, दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने बलि को देवों पर आक्रमण करने की प्रेरणा दी । तदनुसार बलि ने स्वर्गपर आक्रमण किया, एवं देवों के छक्के छुडा दिये । बलि से बचने के लिये, देवों अपने मूल रुप बदल कर स्वर्ग से इतस्ततः भाग गये । किन्तु वहॉं भी बलि ने उनका पीछा किया एवं उनको संपूर्णतः हराया । पश्चात् बलि ने अपने पितामह प्रह्राद को बडे सम्मान के साथ स्वर्ग में आमंत्रित किया, एवं उसे स्वर्ग में अत्यधिक श्रेष्ठता का दिव्य पद स्वीकारने की प्रार्थना की । प्रह्राद ने बलि के इस आमंत्रण का स्वीकार किया, एवं बलि को स्वर्ग के राज्यपद का अभिषेक भी कराया । अभिषेक के पश्चात्, बलि ने प्रह्राद की आशिश मॉंगी एवं स्वर्ग का राज्य किस तरह चलाया जाय इस बारे में उपदेश देने की प्रार्थना की । प्रह्राद ने इस उपदेश देते हुए कहा, ‘हमेशा धर्म की ही जीत होती है, इस कारण तुम धर्म से ही राज्य करो’ [वामन.७४] । प्रह्राद के उपदेश के अनुसार, राज्य कर, बलि ने एक आदर्श एवं प्रजाहितदक्ष राजा ऐसी कीर्ति त्रिखंड में संपादित की [वामन.७५]
बलि (वैरोचन) n.  एकबार बलि ने इंन्द्र की सारी संपत्ती हरण की, एवं उसे यह अपने स्वर्ग में ले जाने लगा । किन्तु रास्ते में वह समुद्र में गिर गयी । उसे समुद्र से बाहर निकलाने के लिये श्रीविष्णु ने समुद्रमंथन की सूचना देवों के सम्मुख प्रस्तुत की । समुद्रमंथन के लिए बलि का सहयोग पाने के लिये सारे देव इसकी शरण में आ अये । बलि के द्वारा इस प्रार्थना का स्वीकार किये जाने पर, देव एवं दैत्यों ने मिल कर समुद्रमंथनसमारोह का प्रारंभ किया [भा.८.६];[ स्कंद. १.१.१९] । बलि के विगत संपत्ति को पुनः प्राप्त करना, यह देवों की दृष्टि से समुद्रमंथन का केवल दिखावे का कारण था । उनका वास्तव उद्द्देश तो यह था कि, उस मंथन से अमृत प्राप्त हो एवं उसकी सहाय्यता से देवदैत्यसंग्राम में देवपक्ष विजय प्राप्त सके । दैत्यपक्ष के पास ‘मृतसंजीवनी विद्या’ थी, जिसकी सहाय्यता से युद्ध में मृत हुए सारे असुर पुनः जीवित हो सकते थे । देवों के पास ऐसी कौनसी भी विद्या न होने के कारण, युद्ध में वे पराजित होते थे । इसी कारण देवों ने समुद्रमंथन का आयोजन किया, एवं उसके लिए दैत्यों का सहयोग प्राप्त किया । समुद्रमंथन यह समारोह चाक्षुषमन्वन्तर में हुआ, जिस समय मंत्रद्रुम नामक इंद्र राज्य कर रहा था [भा.८..८];[ विष्णु.१.९];[ मस्त्य.२५०-२५१] । समुद्रमंथन का समारोह एकादशी के दिन प्रारंभ हो कर द्वादशी के दिन समाप्त हुआ । एकादशी के दिन, उस मंथन से सर्व प्रथम ‘कालकूट’ नामक विष उत्पन्न हुआ, जिसका शंकर ने प्राशन किया । पश्चात् अलक्ष्मी नामक भयानक स्त्री उत्पन्न हुई, जिसका विवाह श्रीविष्णु द्वारा उद्दालक नामक ऋषी के साथ किया गया । तत्पश्चात् ऐरावत नामक हाथी, उच्चैःश्रवस‍ नामक अश्व एवं धन्वन्तरि, पारिजातक, कामधेनु, तथा अप्सरा इन रत्नों का उद्‍भव हुआ । द्वादशी के दिन लक्ष्मी उत्पन्न हुई, जिसका श्रीविष्णु ने स्वीकार किया । तपश्चात् चंद्र एवं अमृत उत्पन्न हुए । अमृत से ही तुलसी का निर्माण हुआ [पद्म.ब्र.९.१०]
बलि (वैरोचन) n.  समुद्रमंथन से निर्माण हुए रत्नों के नाम, संख्या एवं उनका क्रम के बारे में पुराणों में एकवाक्यता नहीं है । एक स्कंदपुराण में ही इन रत्नों के नाम एवं निम्नलिखित दो प्रकारों में दिये गये हैः--- १. लक्ष्मी, २.कौस्तुभ, ३. पारिजातक, ४. धन्वन्तरि, ५. चंद्रमा, ६. कामधेनु, ७. ऐरावत, ८. अश्व (सप्तमुख), ९. अमृत, १०. रम्भा, ११. शार्ङ्ग धनुष्य, १२. पांचजन्य शंख, १३. महापद्मनिधि तथा, १४. हालाहलविष [स्कंद ५.१.४४] । १. हालाहलविष, २. चंद्र, ३. सुरभि धेनु, ४. कपवृक्ष, ५. पारिजातक, ६. आम्र, ७. संतानक, ८. कौस्तुभ रत्न (चिंतामणि), ९. उच्चैःश्रवस्, १०. चौसष्ट हथियों के समूह के साथ ऐरावत, ११. मदिरा, १२. विजया, १३. भंग, १४. लहसुन, १५. गाजर, १६. धतूरा, १७. पुष्कर, १८. ब्रह्मविद्या, १९. सिद्धि, २०. ऋद्धि, २१. माया, २२. लक्ष्मी, २३. धन्वन्तरि, २४. अमृत [स्कंद. १.१.९.-१२] । महाभारत एवं मत्स्य में निम्नलिखित केवल सात रत्नों का निर्देश प्राप्त हैः---सोम, श्री (लक्ष्मी), सुरा, तुरग, कौस्तुभ, धन्वन्तरि, एवं अमृत [म.आ.१६.३३-३७];[ मस्त्य.२५०-२५१]
बलि (वैरोचन) n.  समुद्रमंथन हुआ, किंतु राक्षसों को कुछ भी प्राप्त न हुआ । अतएव राक्षसों ने संघठित हो कर देवों पर चढाई कर दी । देवों-दैत्यों के इस भीषण युद्ध में बलि ने अपनी राक्षसी माया से इंद्र के विरोध में ऐसा युद्ध किया कि, उसके हारने की नौबत आ गयी । इस युद्ध में इसने मयासुर द्वारा निर्मित ‘वैहानस’ विमान का प्रयोग किया । इंद्र की शोचनीय स्थिति देख कर विष्णु प्रकट हुए, तथा उन्होंने बलि के मायावी जाल को काट फेंका । पश्चात बलि इंद्र के वज्रद्वारा मारा गया । बलि के मर जाने पर, नारद की आज्ञानुसार, इसका मृत शरीर अस्ताचल ले जाया गया, जहॉं पर शुक्राचार्य के स्पर्श तथा मंत्र से यह पुनः जीवित हो उठा [भा.११.४६-४८]
बलि (वैरोचन) n.  बलि के जीवित हो जाने पर शुक्राचार्य ने विधिपूर्वक इसका ऐन्द्रमहाभिषेक किया, एवं इससे विश्वजित् यज्ञ भी करवाया । पूर्णरुपेण राज्यव्यवस्था को अपने हाथ ले कर इसने सौ अश्वमेध यज्ञ भी किये [भा.८.१५.३४] । विश्वजित् यज्ञ के उपरांत यज्ञदेव ने प्रसन्न हो कर, इसे इंद्ररथ के समान दिव्य रथ, सुवर्णमय धनुष, दो अक्षय तूणीर तथा दिव्य कवच दिये । इसके पितामह प्रह्राद ने कभी न सूखनेवाली माला दी । शुक्राचार्य ने एक दिव्य शंख, तथा ब्रह्मदेव ने भी एक माला इसे अर्पित की [म.शां.२१६.२३]
बलि (वैरोचन) n.  इसप्रकार सारी स्वर्गभूमि बलि के अधिकार में आ गयी । देवतागण भी निराश हो कर देवभूमि छोड कर अन्यत्र चले गये । इसके राज्य में सुख सभी को प्राप्त हुआ, किन्तु ब्राह्मण एवं देव उससे वंचित रहे । उन्हें विभिन्न प्रकार के कष्ट दिये जाने लगे, जिससे ऊब कर वे सभी विष्णु से फरियाद करने के लिये गये । सब ने विष्णु से अपनी दुःखभरी व्यथा कह सुनाई । विष्णु ने कहा, ‘बलि तो हमारा भक्त है, पर तुम्हारे असहनीय कष्टों को देख कर, उनके निवारणार्थ में शीघ्र ही वामनावतार लूँगा’ [ब्रह्म. ७३] । धीरे धीरे बलि के राज्य की व्यवस्था क्षीण होने लगी । राक्षसों का बल घटने लगा । एकाएक इस गिरावट को देख कर, बलि अत्यधिक चिंतत हुआ, तथ ऐसा विचित्र परिवर्तन का कारण जानने के हेतु प्रह्राद के पास गया । कारण पूँछने पर प्रह्राद ने बताया ‘भगवान विष्णु वामनावतार लेने के लिए आदिति के गर्भ में वासी हो गये हैं, यही कारण है कि तुम्हारा आसुरी राज्य दिन पर दिन रसातल को जा रहा है’। प्रह्राद के बचनों को सुन कर इसने उत्तर दिया, ‘उस हरि से हमारे राक्षस अधिक बली है’। बलि के इस अहंकारभरी वाणी को सुन कर प्रह्राद ने क्रोधित हो कर शाप दिया ‘तुम्हारा राज्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायेगा’ प्रह्राद की वाणी सुन कर यह आतंकित हो उठा तथा, तुरंत क्षमा मॉंगते हुए उसकी शरण में आया । किंतु प्रह्राद ने इससे कहा, ‘मेरी शरण में नही, तुम विष्णु की ही शरण जाओ, वहे तुम्हारा कल्याण निहित है’ [वामन.७७]
बलि (वैरोचन) n.  नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित भृगुकच्छ नामक प्रदेश जें जब इसका अन्तिम अश्वमेध यज्ञ चल रहा था, तब एक ब्राह्मणवेषधारी बालक के रुप में वामन भगवान् ने प्रवेश किया । बलि ने वामन का आदरसत्कार कर उनकी पूजा की, तथा कुछ मॉंगने के लिए प्रार्थना की [भा.८.१८.२०-२१] । वामन ने इससे तीन पग भूमि मॉंगा । शुक्राचार्य ने यह देख कर बलि को तुरन्त समझाया, ‘यह ब्राह्मण बालक और कोई नहीं, स्वयं वामनावतारधारी विष्णु हैं । तुम इन्हें कुछ भी न दो’ । किन्तु बलि ने गुरु की वाणी की उपेक्षा करते हुए कहा, ‘नहीं! मैं अवश्य दूँगा! जब प्रत्यक्ष ही परमेश्वर मेरे द्वार पर अतिथि रुप से आया है, तो मैं उसे अवश्य ही इच्छित वस्तु प्रदान करुँगा [वामन.९१] । बलि की इस प्रकार की वाणी सुन कर, शुक्र ने क्रोधित हो कर शाप दिया, ‘बलि तुमने मेरी उपेक्षा की है, मेरे आज्ञा का अवहेलना की है । तुम अपने को अत्यधिक बुद्धिमान समझते हो । तुम्हारा यह ऐश्वर्य, यह राजपाट नष्ट-भ्रष्ट हो जाये’। वामन भगवान् ने इसकी तथा इसके पूर्वजों की यशगाथा का गान किया, और बलि ने उसे तीन पग भूमि दान देने के लिए मंत्र पढते हुए अर्ध्य दिया । हाथों पर जल छोडते ही वामनरुपधारी विष्णु ने विशाल रुप धारण कर प्रथम पग में पृथ्वी, द्वितीय में स्वर्गलोक नापते हुए, इससे प्रश्न किया कि, तीसरा पैर किधर रखूँ [म.स.परि.१.क्र.२१. पंक्ति.३३४-३३५] । बलि को वामन द्वारा इस प्रकार ठगा जाना देख कर इसके सैनिकों ने उद्यत हो कर उस पर आक्रमण करने लगे । किन्तु इसने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘हमारा अन्तिम समय आ गया है, जो हो रहा है उसे होने दो’। पश्चात् वरुन ने विष्णु की इच्छा जान कर, इसे वरुणपाश में बॉंध लिया [वामन.९२] । वामन द्वारा तीसरे पग के लिए भूमि मॉंग जाने पर, गुरु शुक्राचार्य ने एक बार फिर बलि दो दान के लिए रोका, पर बलि न माना । यह देख कर अर्ध्यदान देनेवाले पात्र के अन्दर शुक्र ऐसा बैठा गया कि, जिससे दान देते समय उस पात्र से जल न निकल सके । बलि को शुक्र की यह बात बालूम न थी । जैसे ही पात्र की टोंटी से जल न गिरा, यह कुश के अग्रभाग से उसे साफ करने लगा जिससे शुक्राचार्य की एक ऑख फूट-गयी और तब से शुक्राचार्य को ‘एकाक्ष’ नाम प्राप्त हुआ [नारद १.११]
बलि (वैरोचन) n.  पश्चात् वामन ने कहा, ‘तुमने तीसरे पग की जमीन दे कर अपने बचनों का पालन नहीं किया है । यह सुन कर बलि ने उत्तर दिया ‘तुमने कपट के साथ मेरे साथ व्यवहार किया है, पर मैं अपना वचन निभाऊंगा । भूमि तो बाकी नहीं बची; मैं अपना मस्तक बढाता हूँ, उसमें अपना तीसरा पग रख कर, इच्छित वस्तु प्राप्त करो’[पद्म.पा.५३] । बलि की यह स्थिति देख कर इसकी स्त्री विंध्यावली ने वामन भगवान् से बलि से उद्धार के लिए प्रार्थना की । विंध्यावली की भक्तिपूर्ण मर्मवाणी को सुन कर विष्णु प्रसन्न हो कर वर देते हुए कहा ‘तुम अभी पाताल लोक में निवास करो, वहॉं मैं तुम्हारा द्वारपाल बनूँगा, मेरा सुदर्शन चक्र सदैव तुम्हारी रक्षा करेगा । आगे चल कर सावर्णि मन्वन्तर में तुम इन्द्र बनोगे’। उक्त घटना कृतयुग के पूर्व काल की है । वह दिन कार्तिक शुद्ध प्रतिपदा का था, जब बलि ने वामन को दान दिया था । इस लिए उस दिन को चिरस्मरणीय रखने के लिये वामन ने बलि को वर दिया, ‘यह पुण्यदिन ‘बलि प्रतिपदा’ के नाम से विख्यात होगा, और इस दिन लोग तुम्हारी पूजा करेंगे’ [स्कंद.२४.१०] । इसके पश्चात्, वामन ने इसे वरुण पाश से मुक्त किया, और बलि ब्रह्मा, विष्णु, महेश को नमस्कार कर, पाताललोक चला गया । बलि के जाने के उपरांत विष्णु ने शुक्राचार्य को आदेश दिया कि वह यज्ञ के कार्य को विधिपूर्वक समाप्त करें [भा.८.१५-२३];[ म.स.परि.१. क्र.२१];[ वामन ३१];[ ब्रह्म.७३] । वामन ने बलि का राज्य मन पुत्रो को दे कर, पृथ्वी एवं स्वर्ग को दैत्यों से मुक्त कराया [स्कंद. ७.२.१९] । विष्णुद्वारा, बलि के ‘पातालबंधन’ की पुराणों मे दी गयी कथा ऐतिहासिक, एवं काफी प्राचीन प्रतीत होती है । पतंजलि के व्याकरण महाभाष्य में इस कथा का निर्देश प्राप्त हैं [पा.सू.३.१.२६] । पतंजलि के अनुसार बलि का पातालबंधन काफी प्राचीन काल में हुआ था; फिर भी उसका निर्देश महाभाष्यकाल में ‘बलिगों बन्धयति’ इस वर्तमानकालीन रुप में किया जाता था ।
बलि (वैरोचन) n.  वाल्मीकि रामायण में बलि के पाताल निवास की एक रोचक कथा दी गयी है, जो द्रष्टय है । एक बार रावण ने इसके पास आ कर कहा, ‘मैं तुम्हारी मुक्ति के लिये आया हूँ, तुम हमारी, सहायता प्राप्त कर, विष्णु के बन्धनों से मुक्त हो सकते हो । यह सुन कर बलि ने अग्नि के समान चमकनेवाले दूर पर रक्खे हुए हिरण्यकशिपु के कुंडल उठा कर लाने के लिये रावण से कहा । रावण ने उस कुण्डल को उठाना चाहा, पर वेहोश हो कर गिर पडा, तथा मुँह से खून की उल्टियॉं करने लगा । बलि ने उसे होश में ला कर समझाते हुए कहा, ‘यह एक कुण्डल है, जिसे मेरा प्रपितामह हिरण्य कशिपु धारण करता था ।’ उसे तुम उठा न सके । महान् पराक्रमी भगवान ‍ विष्णु द्वारा ही हिरण्यकशिपु मारा गया, तथा उसी विष्णु को किस बल से चुनौती दे कर तुम मुझे मुक्त कराने आये हो । वह विष्णु परमशक्तिमान् एवं सब का मालिक है’। ऐसा कह कर इसने उसे विष्णुलीला का वर्णन सुनाया [वा.रा.उ.प्रक्षिप्त सर्ग १] । आनंद रामायण में इसी प्रकार की एक और कथा दी गयी है । एक बार रावण बलि को अपने वश में करने के लिए पाताललोक गया । वहॉं बलि अपनी स्त्रियों के साथ पॉंस खेल रहा था । किसी ने रावण की ओर गौर किया । एकाएक एक फॉंसा उछल कर दूर गिरा, तब इसने उस फॉंसे को उठाने के लिये रावण से कहा । रावण ने फॉंसा उठा कर देना चाहा, पर उसे हिला तक सका । तब वहॉं पर फॉंसा खेलती हुयी स्त्रियों ने रावण का ऐसा उपहास किया कि, यह वहॉं से चम्पत हो गया [आ.रा.सार.१३] । महाभारत के अनुसार राज्य से च्युत किये जाने पर बलि को गर्दभयोनि प्राप्त हुयी, एवं यह इधर उधर भटकने लगा । ब्रह्मदेव ने बलि को ढूँढने के लिए इन्द्र से कहा, तथा आदेश दिया की इसका वध न किया जाये । महाभारत में यह भी कहा गया है कि, इसने ब्राह्मणों से मदपूर्ण अनुचित व्यवहार किया, इसी लिए लक्ष्मी ने इसका परित्याग किया [म.शां.२१६.२१८] । योगवसिष्ठ जिसे वेदान्त ग्रन्थों में भी अनासक्ति का प्रतिपादन करने के लिये, इसकी कथा दृष्टान्तरुप में दी गयी है [यो.वा.५.२२.२९] । महाभारत के अनुसार, अपनी मृत्यु के पश्चात् बलि वरुनसभा में अधिष्ठित हो गया [म.स.९.१२] । स्कंद पुराण में बाष्कलि नामक एक दैत्य की एक कथा दी गयी है, जो बलि के जीवनी से बिलकुल मिलती जुलती है [स्कंद.१.१.१८]; बाष्कलि देखिये । उसी पुराण में इसके पूर्वजन्म की कहानी दी गयी है, जिसके अनुसार पूर्वजन्म में इसे कितव बताया गया हैं । भागवत में एक स्थान पर इसे ‘इंद्रसेन’ उपाधि से विभूषित किया गया है [भा.८.२२. ३३]
बलि (वैरोचन) n.  यह बडा तत्त्वज्ञानी था । तत्त्वज्ञान के संबंध में इसके अनेक संवाद महाभारत तथा पुराण में प्राप्त हैं । राजा अपनी राजलक्ष्मी किस प्रकार खो बैठता है, उसके संबंध में बलि तथा इंद्र का संवाद हुआ [म.शां.२१६] । इसके पितामह प्रह्राद से ‘क्षमा श्रेष्ठ अथवा तेज श्रेष्ठ’ पर इसका संवाद हुआ [म.व.२९] । दैत्यगुरु शुक्र से इसका ‘उपासना में पुष्प तथा धूपदीप’ के बारे में संवाद हुआ [म.अनु.९८]
बलि (वैरोचन) n.  बलि की कुल दो पत्नियॉं थीः---(१) विंध्यावलि [भा.८.२०.१७];[ मत्स्य १८७.४००: २] अशना, जिससे इसे बाण प्रभृति सौ पुत्र उत्पन्न हुये थे [भा.६.१८.१७, विष्णु१.२१.२] । भागवत में इसकी कोटरा नामक और एक पत्नी का निर्देश प्राप्त है, जिसे बाणासुर की माता कहा गया है [भा.१०.६३.२०] । बलि के सौ पुत्रों में निम्नलिखित प्रमुख थेः--- बाण (सहस्त्रबाहु), कुंभगर्त (कुंभनाभ), कुष्मांड, मुर, दय, भोज, कुंचि(कुशि), गर्दभाक्ष [वायु.६७.८२-८३] । महाभारत में केवल बलिपुत्र बाण का निर्देश प्राप्त है [म.आ.५९.२०]
बलि (वैरोचन) n.  शकुनी, पूतना [वायु.६७.८२-८३];[ ब्रह्मांड. ३.५. ४२-४४] । बलि के वंशज इस अर्थ से ‘बालेय’ नाम का प्रयोग पुराणों में प्राप्त है । किंतु वहॉं बलि वैश्वानर एवं बलि आनव इन दोनों में से किस के वंशज निश्चित अभिप्रेत है, यह कहना मुष्किल है (बलि आनव देखिये) ।
बलि (वैरोचन) n.  श्रद्धरहित हो कर एवं दोषदृष्टि रखते हुए जो दान किया जाता है, उस निकृष्ट जाति के दान में से कई भागों का स्वामी बलि माना जाता है [म.अनु.९०.२०] । देवीभागवत के अनुसार कौनसा भी धर्मकर्म दक्षिणा के सिवा किया जाये, तो वह देवों तक न पहुँच कर बलि उसका स्वामी बन जाता है । उसी तरह निम्नलिखित हीनजाति के धर्मकृत्यों का पुण्य उपासकों के बदले बलि को प्राप्त होता हैः---श्रद्धारहित दान, अधम ब्राह्मण के द्वारा किया गया यज्ञ, अपवित्र पुरुष का पूजन, अश्रोत्रिय के द्वारा किया गया श्राद्धकर्म, शूद्र स्त्री से संबंध रखनेवाले ब्राह्मण को किया हुआ द्रव्यदान, अश्रद्ध शिष्य के द्वारा की गयी गुरुसेवा [दे.भा९.४५] । बलिप्रतिपदा के दिन बलि की उपासना जाती है । यह उपासना बहुशः राजाओं द्वारा की जाती है, एवं वहॉं बलि, उसकी पत्नी विंध्यावलि एवं उसके परिवार के कुष्मांड, बाण, मुर आदि असुरों के प्रतिमाओं की पूजा बडे ही भक्तिभाव से की जाती है । उस समय निम्नलिखित बलिस्तुति का पाठ ही भक्तिभाव से किया जाता हैः--- बलिराज नमस्तुभ्यं विरोचनसुत प्रभो । भविष्येंद्र सुराराते पूजेयं प्रतिगृह्यतागों ॥ [भविष्योतर.१४०.५४];[ पद्म. उ.१३४.५३]
बलि II. n.  अनु देश का सुविख्यात राजा (बलि आनव देखिये) ।
बलि III. n.  युधिष्ठिर के सभा का एक ऋषि, जो जितेंद्रिय तथा वेदवेदाङ्गों में पारंगत था । इसने युधिष्ठिर को अनेक पुण्यकारक गाथाएँ सुनाई थी [म.स.४.८] । हस्तिनापुर जाते समय, मार्ग में इसकी श्रीकृष्ण से भेंट हुयी थी [म.उ.८१.३८८]
बलि IV. n.  एक शिवावतार, जो वाराहकल्प में से वैवस्वत मन्वन्तर की तेरहवी चौखट में उत्पन्न हुआ था । इसका अवतार गंधमादन पर्वत पर स्थित वालखिल्याश्रम में हुआ था । इसके सुधामन् काश्यप, वसिष्ठ तथा विरजस् नामक चार पुत्र थे [शिव.शत.५]
बलि IX. n.  आंगिरसकुल का एक गोत्रकार ।
बलि V. n.  (आंध्र. भविष्य.) एक राजा, जो भागवत के अनुसार आंध्र वंश का पहला राजा था । इसे शिप्रक, शिशुक एवं सिंधुक नामान्तर भी प्राप्त थे ।
बलि VI. n.  सावर्णि मन्वन्तर का इंद्र ।
बलि VII. n.  (सो. यदु.) एक यादव राजा, जो कृतवर्मन का पुत्र था । रुक्मिणी की कन्या चारुमती इसकी पत्नी थी [भा.१९.६१.४]
बलि VIII. n.  अत्रिकुल का एक गोत्रकार ।
बलि X. n.  ०. रवैत मनु के पुत्रों में से एक ।

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BALI (MAHĀBALI) I   An emperor of the Asuras. He was the son of Virocana and the grandson of Prahlāda.
1) Genealogy and Birth.
The Asuras or the Daityas are the sons born, of his wife Diti, to Kaśyapa Prajāpati, son of Marīci and grandson of Brahmā. There were so many Asuras born as the sons of Diti. But among them Hiraṇyākṣa, Hiraṇyakaśipu, Śūrapadmā, Siṁhavaktra, Tārakāsura and Gomukha were notorious. Of their sisters Siṁhikā and Ajamukhī were famous. Four sons called Prahlāda, Saṁhrāda, Hrāda and Anuhrāda were born to Hiraṇyakaśipu. Virocana was the son of Prahlāda and Mahābali was the son of Virocana. Bāṇa was born from Mahābali and four crores of Asuras called Nivātakavacas were born from Bāṇa.
2) The churning of the ocean.
Once Mahābali had stolen the wealth of Devendra. While he was carrying it to his house, it all fell in the ocean. Mahāviṣṇu ordered the devas (gods) to recover the lost wealth from the ocean. It was impossible to churn the ocean without the help of Mahābali. So the devas went to Mahābali and sought his help. Mahābali agreed to help them. The real aim of the devas was not to regain the lost wealth but to obtain the celestial nectar known as Nectar of Immortality (Amṛta) and to defeat the Asuras in battle. On the side of the Asuras there was the knowledge of the Mṛtasañjīvanī (life-restoring remedy). So the dead were being brought to life. But it was not possible for devas to do so. It was to make up this deficiency, by obtaining Ambrosia from the sea, that the devas tried to churn the sea, under the pretence of recovering the lost wealth. Mention is made in the [Viṣṇu Purāṇa, Aṁśa 1, Chapter 9] and [Matsya Purāṇa, Chapters 250 and 251] that these events took place during the regime of the Indra named Mantradruma in the Cākṣuṣamanvantara (the period of the manu named Cākṣuṣa).
3) War with Indra.
The great teacher Śukra again anointed Bali, who was brought to life again, as Indra. After that he performed the sacrifice of Viśvajit (conqueror of the world) on behalf of Bali. Assuming the responsibilities of government, Bali performed one hundred Aśvamedha yāgas (Horse sacrifices) [Bhāgavata, Skandha 8]. After the Viśvajit sacrifice, Yajñadeva (god of sacrifice) who was greatly pleased at the sacrifice, presented Bali with a divine chariot, equal in all aspects to that of Indra, a golden bow, two quivers, which would never become empty and a divine armour, and his grandfather gave him a garland that would never fade, and the teacher Śukra gave him a divine conch, and Brahmā presented a garland. [M.B., Śānti Parva, Chapter 216].
4) Attainment of the Position of Indra.
Mahāviṣṇu had not been on good terms with the devas, for a time. Taking this opportunity, Śukrācārya the teacher of the Asuras, persuaded Bali to engage the devas in a battle. Bali defeated the devas completely in a pitched battle. Thus the realm of the gods came under the sway of Mahābali. Once, during that period Bali invited his grandfather Prahlāda to heaven and requested him to accept the most honourable seat there. Prahlāda accepted his invitation and anointed Bali as Indra. Bali enquired of Prahlāda as to the method of carrying on the government of heaven. Prahlāda said thus in reply: “Only virtue will always win. Rule the kingdom without deviating from virtue.” [Vāmana Purāṇa, Chapter 74]. Because Bali had ruled his kingdom according to the advice of Prahlāda, he became famous in the three worlds. [Vāmana Purāṇa, Chapter 75]. According to the version of Bhāgavata, Prahlāda when he grew old, left his kingdom in the hands of his son Virocana and went to the forest for penance. Virocana was not as famous as Prahlāda. After the period of Virocana, Mahābali came to the throne. He was a mighty king. Within a short time he became the emperor of the Asuras. It was during this period that the churning of the Milk Sea took place. The Asuras and the Devas (gods) sat on either side and using the mount Mandara as churn-drill, churned the Milk Sea and obtained Amṛta (the celestial nectar of immortality). A battle took place between the Asuras and the Devas for the possession of Amṛtakalaśa [the Ambrosia and the container] and the emperor Mahābali was killed in the battle. The Asuras carried the dead body of Mahā. bali to his capital, where Śukrācārya (their teacher-priest Śukra) brought him to life again by the help of sacred herbs. Mahābali instantly waged another war, fiercer than the previous ones, with the devas, and having defeated them, he drove them out of their realm and brought it under control. [Bhāgavata, Skandha 8].
5) The curse of Prahlāda.
As the whole of heaven came under the sway of Bali, the devas began to leave the country one by one. Everybody was happy and comfortable under the rule of Bali. But the devas and Brāhmaṇas were denied the privileges they deserved. They approached Viṣṇu and represented their grievances. Viṣṇu told them thus: “Bali is devoted to me. Still, to redress your grievances I shall take the incarnation of Vāmana shortly.” In course of time the Asuras and their countries began to be weakened. Seeing the approach of destruction emperor Bali became thoughtful. He approached Prahlāda to learn the reason. Prahlāda told Bali thus: “Lord Viṣṇu is now staying in the womb of Aditi for his incarnation as Vāmana. That is why the country and the Asuras are subjected to destruction. Hearing this Mahābali said: “Our Rākṣasas are more powerful than that Viṣṇu.” Hearing these haughty words of Bali, Prahlāda got angry and cursed Bali “Let your country be destroyed.” Bali requested Prahlāda to pardon him. Prahlāda advised Bali “You will get salvation only by relying on Viṣṇu”. [Vāmana Purāṇa 77].
6) Defeated by Vāmana.
The defeated devas had taken refuge in forests. Aditi the mother of the devas was very sorry at this. She shed tears before her husband Kaśyapa Prajāpati, who advised his wife to take a fast of twelve days, and taught her the rules and rituals of the fast. Accordingly she took the fast, Viṣṇu appeared before her and asked her what boon she wanted. She requested Viṣṇu to take birth as her son, to drive away Bali and to restore her sons, the devas (gods), to their kingdom of heaven. Mahāviṣṇu agreed. Aditi became pregnant and gave birth to the son Vāmana. He was an incarnation of Mahāviṣṇu. [The 5th incarnation (avatāra) of Viṣṇu]. At this time Mahābali was performing a sacrifice on the bank of the river Narmadā. Vāmana came to the place of sacrifice in the dress of a hermit boy and told Mahābali that he was a helpless hermit boy and requested that he might be given three steps of ground. Mahābali was pleased with the boy and told him that he was willing to give the boy even the country called Bhṛṅgāraka and that he was prepared to forego the kingly pleasures for the boy. The hermit boy did not show any desire for them. So many gathered round them to witness this sight. The teacher Śukrācārya called Mahābali and said that the boy was a cheat and that his request should not be granted. But Mahābali decided to grant the wish of the boy and as a token of his gift he began to offer the boy water from a waterpot. Then the teacher got into the mouth of the pot in the shape of a mote and water would not flow freely out of the mouth of the pot. Knowing this Vāmana took a grass of Darbha and pushed it at the mouth of the pot. The grass pierced one eye of Śukrācārya. From that time onwards Śukrācārya had only one eye. Water flowed freely into the hands of Vāmana. Śukra got angry and cursed Bali. Vāmana began to measure the ground and simultaneously began to grow. The asuras who were horrified at this, began to attack Vāmana with anything they could lay hands on. Still Vāmana was growing. Finally he became an immensely large being. With one step he measured the whole of earth and with the second step he took the whole of heaven. Then he asked Bali, where to place the third step. Mahābali said that he had only his body left, as his own, and that Vāmana might take it and complete three steps. Vāmana placed his foot on the head of Bali and pushed him down to Pātāla (the Netherworld). Thenceforward the asuras became the inhabitants of Pātāla. [Bhāgavata, Skandha 8].
7) Bali and Rāvaṇa.
Once Rāvaṇa visited Bali who was under custody in Pātāla, and said to him, “I have come to save you from here. So get yourself free from the custody of Mahāviṣṇu, with my help.” Hearing this, Bali asked Rāvaṇa to fetch the two earrings of Hiraṇyakaśipu, which were shining like blazing fire a little away from them. Rāvaṇa moved forward to take them. But he fell unconscious. Bali caused him to recover and said: “These earrings were worn by my great grandfather Hiraṇyakaśipu. How could you, who are not even capable of taking his earrings, save me from his slayer, Viṣṇu? Viṣṇu is Almighty and All-powerful and Supreme Lord of everything.” Hearing this, Rāvaṇa was filled with shame and he returned. [Vālmīki Rāmāyaṇa, Uttara Kāṇḍa, Prakṣipta Sarga].
8) Bali born as a Gardabha (Ass).
Bali, who was fallen from power took birth in the womb of an ass and roamed about. Brahmā instructed Indra to find out Bali. [M.B., Śānti Parva, Chapters 216-218].
9) Other information.
(1) Mahābali shines in the durbar of Varuṇa. [M.B., Sabhā Parva, Chapter 9, Stanza 12].
(2) Once Mahābali went to Prahlāda and repented of his sins and begged for pardon. Then he began to make enquiries on spiritual matters. [M.B., Vana Parva, Chapter 28, Stanza 3].
(3) From his childhood Mahābali was a hater of the Brāhmanas. [M.B., Śānti Parva, Chapter 90, Stanza 24].
(4) Once Mahābali was engaged in a serious contest with Indra. [M.B., Śānti Parva, Chapter 223].
(5) After having lost his kingdom Mahābali ridiculed Indra in various ways. [M.B., Śānti Parva, Chapter 225, Stanza 30].
(6) Once Mahābali talked with Śukrācārya about giving gifts of flower, smoke and light. [M.B., Anuśāsana Parva, Chapter 98, Stanza 15].
(7) Lakṣmī Devī had forsaken Mahābali because he behaved haughtily towards Brāhmaṇas. [M.B., Śānti Parva, Chapters 216-218].
(8) In the religious Books such as Yogavāsiṣṭha the story of Mahābali is given to illustrate disinterestedness (Anāsakti).
BALI II   A hermit. It is mentioned in the [Mahābhārata, Sabhā Parva, Chapter 4, Stanza 10], that this hermit lived in Hastināpura.
BALI III   An incarnation of Śiva. Śiva incarnated in the hermitage of the Bālakhilyas in the mount of Gandhamādana during the period of Varāha Kalpa (Kalpa--one day of Brahmā or the period of 14 manus). It is seen in [Śiva Purāṇa];[ Śatapatha Brāhmaṇa] that Bali had four sons, called Sudhāmā, Kaśyapa, Vasiṣṭha and Virajas.
BALI IV   A king of the Yādavas. He was the son of Kṛtavarman. Bali married Cārumatī, the daughter of Rukmiṇī. [Bhāgavata, Skandha 10].
BALI V   A famous monkey-king of the country of Ānava. This King who was the son of Sutapas was a contemporary of the great King Sagara. Bali did penance and Brahmā appeared before him, and blessed him and said, “You will become a great sage and will live till the end of the Kalpa (a period of world age). Your power will be inimitable. Nobody will overthrow you in battle. You will be loved by your subjects and they will obey you. You will be wellversed in the knowledge of law and its observance and the learned will recognize your knowledge. You will re-establish caste system in your kingdom.” [Harivaṁśa, 1. 31.35.39]. Sudeṣṇā was the wife of Bali. The couple had no children. At last they appealed to Dīrghatamas a hermit, from whom they got five sons called Aṅga, Vaṅga, Kaliṅga, Pāṇḍu and Suhma [Brahma Purāṇa]. In [Bhāgavata] it is mentioned that he had one more son called Andhra. Bali left his body at the end of the Kalpa and entered heaven. Before his death he had divided his kingdom equally among his sons. [Bhāgavata, Skandha 9];[ Mahābhārata, Ādi Parva, Chapter 92].

Aryabhushan School Dictionary | mr  en |   | 
 m  A religious offering in general, an oblation.

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बलि   
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  • आरुणि
    भक्तों और महात्माओंके चरित्र मनन करनेसे हृदयमे पवित्र भावोंकी स्फूर्ति होती है ।
  • बलि
    भक्तो और महात्माओंके चरित्र मनन करनेसे हृदयमे पवित्र भावोंकी स्फूर्ति होती है ।
  • बलिप्रतिपदा
    दिपावली म्हणजे दीपोत्सव. हा उत्सव साजरा करुन भोवतालचा अंधार नाहीसा करणे. ‘तमसो मा ज्योर्तिगमय’ म्हणजेच दिवाळी साजरी करणे दिवा ज्ञानाचे प्रतिक आहे.
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