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प्रियव्रत

A Sanskrit English Dictionary | sa  en |   | 
प्रिय—व्रत  mfn. mfn. (प्रिय॑-) having desirable ordinances or fond of obedience (said of the gods), [RV.]; [ŚBr.]; KātyŚr.
प्रिय—व्रत  m. m.N. of a king (a son of मनु and शत-रूपा), [Hariv.]; [Pur.]
of a man, [Br.]

प्रियव्रत n.  एक राजा, जो स्वायंभुव मनु के पुत्रों में से एक था । इसकी माता का नाम शतरुपा था । इसके पराक्रम के कारण, पृथ्वी पर सात द्वीप एवं सात समुद्रों का निर्माण हुआ [भा.३.१२.५५,४.७.८];[ पद्म. सृ.३];[ भवि. ब्राह्म ११७] । इसके द्वारा सात द्वीपों एवं सात समुद्रों के निर्माण की चमत्कारपूर्ण कथा भागवत में निम्न रुप से वर्णित है । प्रियव्रत राजा अत्यंत पराक्रमी था । एकबार अपने एक पहियेवाले रथ में बैठ कर अत्यंत वेग से इसने मेरु के चारों ओर प्रदक्षिणा की । इसका वेग इतना अधिक था कि, सूर्य मेरु के जिस भाग पर प्रकाश डालता था, उसके विपरीत दिशा में हमेशा यह रथ घुमा लेता था । इसलिये मेरु पर्वत की जो दिशासूर्य के अभाव में अंधकारमय रहनी चाहिये, वह भी इसके प्रकाश के योग से आलोकित रहती थी । इसलिये इसके राज्यकाल में पृथ्वी पर कभी भी अंधकार न रहा । इसके रथ के पहियों के कारण मेरु के चारों ओर जो सात गडढे हुए, वे ही बाद में सप्तसमुद्र के नाम से प्रसिद्ध हुए, तथा प्रत्येक दो गडढों के बीच में जो जगह बची, वे द्वीप बन गये । इस प्रकार प्रियव्रत के रथ के कारण, मेरु पर्वत के चारों ओर सात समुद्र तथा सप्तद्वीप बने । प्रियव्रत को विश्वकर्म की कन्या बर्हिष्मती दी गयी थी । उससे इसे इध्मजिह्र, यज्ञबाहु, महावीर, अग्नीध्र, सवन, वीतिहोत्र, मेधातिथि, घृतपृष्त, कवि तथा हिरण्य रेतस् नामक दस पुत्र था ऊर्जस्वती नामक कन्या हुयी । उनमें से महावीर, कवि तथा सवन नामक तीन पुत्र बचपन में ही तपस्या के लिये वन में चले गये । बाकी बचे सात पुत्रों को इसने एक एक द्वीप बॉंट दिये [भा.५.१];[ वराह.७४] । इसके पुत्रों में बॉंट गये सप्तद्वीप इस प्रकार थेः इध्मजिर-प्लक्षद्वीप, यज्ञबाहु-शाल्मलिद्वीप, अग्नीध्र-जंबुद्वीप, वीतिहोत्र-पुष्करद्वीप, मेधातिथि-शाकद्वीप, घृतपृष्ठ-क्रौंचद्वीप, हिरण्यरेतस्-कुशद्वीप । इसकी ऊर्जस्वती नामक कन्या का विवाह कविपुत्र उशनस् ऋषि से हुआ था । ब्रह्मांड में इसकी पत्नी का नाम काम्या बताया गया है, एवं उसे पुलहवंशीय कहा गया है । काम्या से उत्पन्न हुए प्रियव्रत राजा के दस पुत्रों ने आगे चल कर क्षत्रियत्व को स्वीकार किया, एवं वे सप्तद्वीपों के स्वामी बन गये [ब्रह्मांड. २.१२.३०-३५] । इसे बर्षिष्मती (काम्या) के अतिरिक्त और भी एक पत्नी थी, जिससे इसे उत्तम, तापस एवं रैवत नामक तीन पुत्र हुए । वे पुत्र स्वायंभव एवं स्वारोचिष मन्वन्तंरी के पश्चात् संपन्न हुए उत्तम, तामस तथा रवत मन्वन्तरीं के स्वामी बन गये । प्रियव्रत अत्यंत धर्मशील था, एवं देवर्षि नारद इसका गुरु था । इसने ग्यारह अर्बुद (दशकोटि) वर्षो तक राज्य किया । बाद में राज्यभार पुत्रों को सौंप कर, यह नारद द्वारा उपदेशित योगमार्ग का अनुसरण कर, अपनी पत्नी के साथ साधना में निमग्न हुआ । इसक मेधातिथि नामक पुत्र शाकद्वीप का राजा था । वहॉं इसने सूर्य का एक देवालय बनवाया । किन्तु शाकद्वीप में एक भी ब्राह्मण न होने के कारण, अब समस्या यह थी कि, मूर्ति की स्थापना किस प्रकार की जाय । तब इसने सूर्य का आवाहन कर उससे सहायता के लिए याचना की । सूर्य ने इसे दर्शन दे कर ‘मग’ नामक आठ ब्राह्मणों का निर्माण किया, तथा उनके सन्मान की इसे रीति बतायी [भविष्य. ब्राह्म.११७]; मग देखिये ।
प्रियव्रत (रौहिणायन) n.  शतपथ ब्राह्मण में निर्दिष्ट एक आचार्य [श. ब्रा.१०.३.५.१४]
प्रियव्रत II. n.  आद्य देवों में से एक ।
प्रियव्रत III. n.  मद्र देश का राजा । इसे कीर्ति तथा प्रबह नामक दो स्त्रियॉं श्रीं । इसके दो प्रधानों का नाम धूर्त तथा कुशल था । इसके पुत्र का नाम क्षिप्रसादन था, जो परम गणेशभक्त था । इसे गणेशजी द्वारा परशु प्राप्त होने के कारण, परशुबाहु भी कहा जाता है (गणेश.) ।

Puranic Encyclopaedia  | en  en |   | 
PRIYAVRATA   The eldest son of Svāyambhuva Manu. He had another son named Uttānapāda and three daughters named Ākūti, Devahūti and Prasūti. The daughters were married to Ruci, Kardama and Dakṣa respectively. [8th Skandha, Devī Bhāgavata]. Priyavrata married Barhiṣmatī daughter of Kardamaprajāpati. He got of her two daughters named Samrāṭ and Kukṣi and ten sons named Agnīdhra, Agnibāhu, Vapuṣmān, Dyutimān, Medhas, Medhātithi, Bhavya, Savana, Putra and Jyotiṣmān. Of these Jyotiṣmān was really possessing jyotis (brilliance). All the sons, Medhas, Agnibāhū and Putra, were interested in the practice of yoga and were aware of their previous births. Priyavrata disributed seven islands to seven of his sons as follows: Jambūdvīpa to Agnīdhra; Plakṣadvīpa to Medhātithi; Śālmalīdvīpa to Vapuṣmān; Kuśadvīpa to Jyotiṣmān; Krauñcadvīpa to Dyutimān; Śākadvīpa to Bhavya; and Puṣkaradvīpa to Savana. Agnīdhra had nine sons named Nābhi, Kimpuruṣa, Harivarṣa, Ilāvṛta, Ramya, Hiraṇvān, Kuru, Bhadrāśva and Ketumāla. [Chapter 1, Aṁśa 2, Viṣṇu Purāṇa]. Priyavrata once circled round Meru in his chariot. As if competing with the Sun Priyavrata started his circling along with sunrise and ended it at sunset. He did so seven days making nights look like day and the sun appear dim and faded. The Sun was dejected and it was at the request of the Trimūrtis that Priyavrata stopped his circumambulation. It was the path of Priyavrata's circling for seven days that later became the seven oceans of Purāṇic fame. [Yuddha Kāṇḍa, Kamba Rāmāyaṇa].

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    भक्तो और महात्माओंके चरित्र मनन करनेसे हृदयमे पवित्र भावोंकी स्फूर्ति होती है ।
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