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भगवतीपद्यपुष्पांजलिस्तोत्र

देवी स्तोत्र - भगवतीपद्यपुष्पांजलिस्तोत्र

देवी आदिशक्ती माया आहे. तिची अनेक रूपे आहेत. जसे ती जगत्‌कल्याण्कारी तसेच दुष्टांचा संहार करणारीही आहे.

The concept of Supreme mother Goddess is very old in India. The divine mother has been worshipped as 'Shakti' since vedic times.


भगवतीपद्यपुष्पांजलिस्तोत्र

॥श्री त्रिपुरसुन्दर्यै नमः ॥

भगवती भगवत्पदपङ्कजं भ्रमरभूतसुरासुरसेवितम ।

सुजनमानसहंसपरिस्तुतं कमलयाऽमलया निभृतं भजे ॥१॥

ते उभे अभिवन्देऽहं विघ्नेशकुलदैवते ।

नरनागाननस्त्वेको नरसिंह नमोऽस्तुते ॥२॥

हरिगुरुपदपद्मं शुद्धपद्येऽनुरागाद विगतपरमभागे सन्निधायादरेण ।

तदनुचरि करोमि प्रीतये भक्तिभाजां भगवति पदपद्मे पद्यपुष्पाञ्जलिं ते ॥३॥

केनैते रचिताः कुतो न निहिताः शुम्भादयो दुर्मदाः केनैते तव पालिता इति हि तत प्रश्ने किमाचक्ष्महे ।

ब्रह्माद्या अपि शंकिताः स्वविषये यस्याः प्रसादावधि प्रीता सा महिषासुरप्रमथिनीच्छ्द्यादवद्यानि मे ॥४॥

पातु श्रीस्तु चतुर्भुजा किमु चतुर्बाहोर्महौजान्भुजान धत्तेऽष्टादशधा हि कारणगुणान्कार्ये गुणारम्भकाः ।

सत्यं दिक्पतिदन्तिसंख्यभुजभृच्छम्भुः स्वय्म्भूः स्वयं धामैकप्रतिपत्तये किमथवा पातुं दशाष्टौ दिशः ॥५॥

प्रीत्याऽष्टादशसंमितेषु युगपद्द्वीपेषु दातुं वरान् त्रातुं वा भयतो बिभर्षि भगवत्यष्टादशैतान् भुजान् ।

यद्वाऽष्टादशधा भुजांस्तु बिभृतः काली सरस्वत्युभे मीलित्वैकमिहानयोः प्रथयितुं सा त्वं रमे रक्षमाम् ॥६॥

अयि गिरिनंदिनि नंदितमेदिनि विश्वविनोदिनि नंदनुते गिरिवर विंध्य शिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।

भगवति हे शितिकण्ठकुटुंबिनि भूरि कुटुंबिनि भूरि कृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥७॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।

दनुज निरोषिणि दितिसुत रोषिणि दुर्मद शोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥८॥

अयि जगदंब मदंब कदंब वनप्रिय वासिनि हासरते शिखरि शिरोमणि तुङ्ग हिमालय शृंग निजालय मध्यगते ।

मधु मधुरे मधु कैटभ गंजिनि कैटभ भंजिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥३॥॥९॥

अयि शतखण्ड विखण्डित रुण्ड वितुण्डित शुण्ड गजाधिपते रिपु गज गण्ड विदारण चण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते ।

निज भुज दण्ड निपातित खण्ड विपातित मुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥४॥॥१०॥

अयि रण दुर्मद शत्रु वधोदित दुर्धर निर्जर शक्तिभृते चतुर विचार धुरीण महाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।

दुरित दुरीह दुराशय दुर्मति दानवदूत कृतांतमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥५॥॥११॥

अयि शरणागत वैरि वधूवर वीर वराभय दायकरे त्रिभुवन मस्तक शूल विरोधि शिरोधि कृतामल शूलकरे ।

दुमिदुमि तामर दुंदुभिनाद महो मुखरीकृत तिग्मकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥६॥॥१२॥

अयि निज हुँकृति मात्र निराकृत धूम्र विलोचन धूम्र शते समर विशोषित शोणित बीज समुद्भव शोणित बीज लते ।

शिव शिव शुंभ निशुंभ महाहव तर्पित भूत पिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥७॥॥१३॥

धनुरनु संग रणक्षणसंग परिस्फुर दंग नटत्कटके कनक पिशंग पृषत्क निषंग रसद्भट शृंग हतावटुके ।

कृत चतुरङ्ग बलक्षिति रङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१४॥

सुरललनाततथेयितथेयितथाभिनयोत्तरनृत्यरते हासविलासहुलासमयि प्रणतार्तजनेऽमितप्रेमभरे ।

धिमिकिटधिक्कटधिकटधिमिध्वनिघोरमृदंगनिनादरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥८॥॥१५॥

जय जय जप्य जयेजय शब्द परस्तुति तत्पर विश्वनुते भण भण भिञ्जिमि भिंकृत नूपुर सिंजित मोहित भूतपते ।

नटित नटार्ध नटीनट नायक नाटित नाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥९॥॥१६॥

अयि सुमनः सुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहर कांतियुते श्रित रजनी रजनी रजनी रजनी रजनीकर वक्त्रवृते ।

सुनयन विभ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१०॥॥१७॥

सहित महाहव मल्लम तल्लिक मल्लित रल्लक मल्लरते विरचित वल्लिक पल्लिक मल्लिक भिल्लिक भिल्लिक वर्ग वृते ।

सितकृत पुल्लिसमुल्ल सितारुण तल्लज पल्लव सल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥११॥॥१८॥

अविरल गण्ड गलन्मद मेदुर मत्त मतङ्गज राजपते त्रिभुवन भूषण भूत कलानिधि रूप पयोनिधि राजसुते ।

अयि सुद तीजन लालसमानस मोहन मन्मथ राजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१२॥॥१९॥

कमल दलामल कोमल कांति कलाकलितामल भाललते सकल विलास कलानिलयक्रम केलि चलत्कल हंस कुले ।

अलिकुल सङ्कुल कुवलय मण्डल मौलिमिलद्भकुलालि कुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१३॥॥२०॥

कर मुरली रव वीजित कूजित लज्जित कोकिल मञ्जुमते मिलित पुलिन्द मनोहर गुञ्जित रंजितशैल निकुञ्जगते ।

निजगुण भूत महाशबरीगण सद्गुण संभृत केलितले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१४॥॥२१॥

कटितट पीत दुकूल विचित्र मयूखतिरस्कृत चंद्र रुचे प्रणत सुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुल सन्नख चंद्र रुचे ।

जित कनकाचल मौलिपदोर्जित निर्भर कुंजर कुंभकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१५॥॥२२॥

विजित सहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते कृत सुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।

सुरथ समाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१६॥॥२३॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं स शिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।

तव पदमेव परंपदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१७॥॥२४॥

कनकलसत्कल सिन्धु जलैरनु सिञ्चिनुते गुण रङ्गभुवं भजति स किं न शचीकुच कुंभ तटी परिरंभ सुखानुभवम् ।

तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवं जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१८॥॥२५॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूत पुरीन्दुमुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।

मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१९॥॥२६॥

अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथाऽनुमितासिरते ।

यदुचितमत्र भवत्युररि कुरुतादुरुतापमपाकुरुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२०॥॥२७॥

स्तुतिमितस्तिमितः सुसमाधिना नियमतोऽयमतोऽनुदिनं पठेत । परमया रमयापि निषेव्यते परिजनोऽरिजनोऽपि च तं भजेत् ॥२८॥

रमयति किल कर्षस्तेषु चित्तं नराणामवरजवर यस्माद्रामकृष्णः कवीनाम् । अकृत सुकृतिगम्यं रम्यपद्दैकहर्म्यं स्तवनमवनहेतुं प्रीतये विश्वमातुः ॥२९॥

इन्दुरम्यो मुहुर्बिन्दुरम्यो मुहुर्बिन्दुरम्यो यतः सोऽनवद्यः स्मृतः । श्रीपतेः सूनूना कारितो योऽधुना विश्वमातुः पदे पद्यपुष्पाञ्जलिः ॥३०॥

इति श्रीभगवतीपद्यपुष्पाञ्जलिस्तोत्रम ॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2008-04-10T21:30:18.8600000

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मरामर

  • f  The dying or falling sick in great numbers (of men or beasts). 
  • स्त्री. मरणाची , आजाराची फार मोठी साथ . ( क्रि० चालणें ; लागणें ; होणें ). [ मरणें ] 
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