तुलसीदास कृत दोहावली - भाग २३

रामभक्त श्रीतुलसीदास सन्त कवि आणि समाज सुधारक होते. तुलसीदास भारतातील भक्ति काव्य परंपरेतील एक महानतम कवि होत.


प्रतिष्ठा दुःखका मूल है

मागि मधुकरी खात ते सोवत गोड़ पसारि ।
पाप प्रतिष्ठा बढ़ि परी ताते बाढ़ी रारि ॥
तुलसी भेड़ी की धँसनि जड़ जनता सनमान ।
उपजत ही अभिमान भो खोवत मूढ़ अपान ॥

भेड़ियाधँसानका उदाहरण

लही आँखि कब आँधरे बाँझ पूत कब ल्याइ ।
कब कोढ़ी काया लही जग बहराइच जाइ ॥

ऐश्वर्य पाकर मनुष्य अपनेको निडर मान बैठते हैं

तुलसी निरभय होत नर सुनिअत सुरपुर जाइ ।
सो गति लखि ब्रत अछत तनु सुख संपति गति पाइ ॥
तुलसी तोरत तीर तरु बक हित हंस बिडारि ।
बिगत नलिन अलि मलिन जल सुरसरिहू बढ़िआरि ॥
अधिकरी बस औसरा भलेउ जानिबे मंद ।
सुधा सदन बसु बारहें चउथें चउथिउ चंद ॥

नौकर स्वामीकी अपेक्षा अधिक अत्याचारी होते है

त्रिबिध एक बिधि प्रभु अनुग अवसर करहिं कुठाट ।
सूधे टेढ़े सम बिषम सब महँ बारहबाट ॥
प्रभु तें प्रभु गन दुखद लखि प्रजहिं सँभारै राउ ।
कर तें होत कृपानको कठिन घोर घन घाउ ॥
ब्यालहु तें बिकराल बड़ ब्यालफेन जियँ जानु ।
वहि के खाए मरत है वहि खाए बिनु प्रानु ॥
कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर ।
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ॥
काल बिलोकत ईस रुख भानु काल अनुहारि ॥
रबिहि राउ राजहिं प्रजा बुध ब्यवहरहिं बिचारि ॥
जथा अमल पावन पवन पाइ कुसंग सुसंग ।
कहिअ कुबास सुबास तिमि काल महीस प्रसंग ॥
भलेहु चलत पथ पोच भय नृप नियोग नय नेम ।
सुतिय सुभूपति भूषिअत लोह सँवारित हेम ॥

राजाको कैसा होना चाहिये ?

माली भानु किसान सम नीति निपुन नरपाल ।
प्रजा भाग बस होहिंगे कबहुँ कबहुँ कलिकाल ॥
बरषत हरषत लोग सब करषत लखै न कोइ ।
तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होइ ॥

राजनीति

सुधा सुजान कुजान फल आम असन सम जानि ।
सुप्रभु प्रजा हित लेहिं कर सामादिक अनुमानि ॥
पाके पकए बिटप दल उत्तम मध्यम नीच ।
फल नर लहैं नरेस त्यों करि बिचारि मन बीच ॥
रीझि खीझि गुरु देत सिख सखा सुसाहिब साधु ।
तोरि खाइ फल होइ भल तरु काटें अपराधु ॥

धरनि धेनु चारितु चरत प्रजा सुबच्छ पेन्हाइ ।
हाथ कछू नहिं लागिहै किएँ गोड़ कि गाइ ॥
चढ़े बधूरें चंग ज्यों ग्यान ज्यों सोक समाज ।
करम धरम सुख संपदा त्यों जानिबे कुराज ॥
कंटक करि करि परत गिरि साखा सहस खजूरि ।
मरहिं कृनृप करि करि कुनय सों कुचालि भव भूरि ॥
काल तोपची तुपक महि दारू अनय कराल ।
पाप पलीता कठिन गुरु गोला पुहुमी पाल ॥

किसका राज्य अचल हो जाता है ?

भूमि रुचिर रावन सभा अंगद पद महिपाल ।
धरम राम नय सीय बल अचल होत सुभ काल ॥
प्रीति राम पद नीति रति धरम प्रतीति सुभायँ ।
प्रभुहि न प्रभुता परिहरै कबहुँ बचन मन कायँ ॥
कर के कर मन के मनहिं बचन बचन गुन जानि ।
भूपहि भूलि न परिहरै बिजय बिभूति सयानि ॥
गोली बान सुमंत्र सर समुझि उलटि मन देखु ।
उत्तम मध्यम नीच प्रभु बचन बिचारि बिसेषु ॥
सत्रु सयानो सलिल ज्यों राख सीस रिपु नाव ।
बूड़त लखि पग डगत लखि चपरि चहूँ दिसि घाव ॥
रैअत राज समाज घर तन धन धरम सुबाहु ।
सांत सुसचिवन सौंपि सुख बिलसइ नित नरनाहु ॥
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ॥
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ ।
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ ॥
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस ।
राज धर्म तन तीनी कर होइ बेगिहीं नास ॥
रसना मन्त्री दसन जन तोष पोष निज काज ।
प्रभु कर सेन पदादिका बालक राज समाज ॥
लकड़ी डौआ करछुली सरस काज अनुहारि ।
सुप्रभु संग्रहहिं परिहरहिं सेवक सखा बिचारि ॥
प्रभु समीप छोटे बड़े रहत निबल बलवान ।
तुलसी प्रगट बिलोकिऐ कर अँगुली अनुमान ॥

आज्ञाकारी सेवक स्वामी से बड़ा होता है

साहब तें सेवक बड़ो जो निज धरम सुजान ।
राम बाँधि उतरे उदधि लाँघि गए हनुमान ॥

मूलके अनुसार बढ़नेवाला और बिना अभिमान किये
सबको सुख देनेवाला पुरुष ही श्रेष्ठ है

तुलसी भल बरतरु बढ़त निज मूलहिं अनुकुल ।
सबहि भाँति सब कहँ सुखद दलनि फलनि बिनु फूल ॥

त्रिभुवनके दीप कौन है ?

सघन सगुन सधरम सगन सबल सुसाइँ महीप ।
तुलसी जे अभिमान बिनु ते तिभुवन के दीप ॥

कीर्ति करतूतिसे ही होती है

तुलसी निज करतूति बिनु मुकुत जात जब कोइ ।
गयो अजामिल लोक हरि नाम सक्यो नहिं धोइ ॥

बड़ो का आश्रय भी मनुष्यको बड़ा बना देता है

बड़ो गहे ते होत बड़ ज्यों बावन कर दंड ।
श्रीप्रभु के सँग सों बढ़ो गयो अखिल ब्रह्मंड ॥

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Last Updated : January 18, 2013

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