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चैत्र कृष्णपक्ष व्रत - संकष्टचतुर्थीव्रत

व्रतसे ज्ञानशक्ति, विचारशक्ति, बुद्धि, श्रद्धा, मेधा, भक्ति तथा पवित्रताकी वृद्धि होती है ।


संकष्टचतुर्थीव्रत

संकष्टचतुर्थीव्रत ( भविष्यपुराण ) -

यदि निकट भविष्यमें किसी अमिट संकटकी शङ्का हो या पहलेसे ही संकटापन्न अवस्था बनी हुई हो तो उसके निवारणके निमित्त संकटचतुर्थीका व्रत करना चाहिये । यह सभी महीनोंमें कृष्ण चतुर्थीको किया जाता है । इसमें चन्द्रोदयव्यापिनी चतुर्थी ली जाती है । यदि वह दो दिन चन्द्रोदय - व्यापिनी हो तो प्रथम दिनका व्रत करे । व्रतीको चाहिये कि वह उक्त चतुर्थीको प्रातः स्त्रानादि करनेके अनन्तर दाहिने हाथमें गन्ध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर

' मम वर्तमानागामिसकलसंकटनिरसनपूर्वकसकलाभीष्टसिद्धये संकटचतुर्थी व्रतमहं करिष्ये '

यह संकल्प करके दिनभर मौन रहे और सायंकालके समय पुनः स्त्रान करके चौकी या वेदीपर

' तीव्रायै , ज्वालिन्यै, भोगदायै, कामरुपिण्यै, उग्रायै, तेजोवत्यै, सत्यायै च दिक्षु विदिक्षु, मध्ये विघ्रनाशिन्यै सर्वशक्तिकमलासनायै नमः'

इन मन्त्रोंसे पीठपूजा करनेके बाद वेदीके बीचमें स्वर्णादिनिर्मित गणेशजीका - १ ' गणेशाय नमः' से आवाहन, २ ' विघ्रनाशिने नमः' से आसन, ३ ' लम्बोदराय नमः ' से पाद्य, ४ ' चन्द्रार्घधारिणे नमः' से अर्घ्य, ५ ' विश्वाप्रियाय नमः' से आचमन, ६ ' ब्रह्मचारिणे नमः' से स्त्रान, ७ ' कुमारगुरवे नमः' से वस्त्र, ८ ' शिवात्मजाय नमः' से यज्ञोपवीत, ९ ' रुद्रपुत्राय नमः' से गन्ध, १० ' विघ्रहत्रें नमः' से अक्षत, ११ ' परशुधारिणे नमः' से पुष्प, १२ ' भवानीप्रीतिकत्रें नमः ' से धूप, १३ ' गजकर्णाय नमः' से दीपक, १४ ' अघनाशिने नमः ' से नैवेद्य ( आचमन ), १५ ' सिद्धिदाय नमः ' से ताम्बूल और १६ ' सर्वभोगदायिने नमः ' से दक्षिणा अर्पण करके ' षोडशोपचारपूजन ' करे और कर्पूर अथवा घीकी बत्ती जलाकर नीराजन करे । इसके पीछे दूर्वाके दो अड्कर लेकर ' गणाधिपाय नमः २, उमापुत्राय नमः २, अघनाशाय नमः २, विनायकाय नमः २, ईशपुत्राय नमः २, सर्वसिद्धिप्रदाय नमः २, कुमारगुरवे नमः २ और

' गणाधिप नमस्तेऽस्तु उमापुत्राघनाशन । एकदन्तेभवक्त्रेति तथा मूषकवाहन । विनायकेशपुत्रेति सर्वसिद्धिप्रदायक । कुमारगुरवे तुभ्यं पूजयामि प्रतत्नतः ॥'

इनमें आरम्भसे १० मन्त्रोंद्वारा दो - दो और अन्तके पुरे मन्त्रसे एक दूर्वा अर्पण करके - ' यज्ञेन यज्ञ ०' से मन्त्र - पुष्पाञ्जलि अर्पण करे और

' संसारपीडाव्यथितं हि मां सदा संकष्टभूतं सुमुख प्रसीद । त्वं त्राहि मां मोचय कष्टसंघात्रमो नमो विघ्रविनाशनाय ॥ '

से नमस्कार करके

' श्रीविप्राय नमस्तुभ्यं साक्षाद्देवस्वरुपपिणे । गणेशप्रीतये तुभ्यं मोदकान् वै ददाम्यहम् ॥ '

से मोदक, सुपारी, मूँग और दक्षिणा रखकर वायन ( बायना ) दे । .........इसके बाद चन्द्रोदय होनेपर चन्द्रमाका गग्ध - पुष्पादिसे विधिवत् पूजन करके

' ज्योत्स्त्रापने नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषां पते । नमस्ते रोहिणीकान्त गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥'

से चन्द्रमाको अर्घ्य देकर

' नभोमण्डलदीपाय शिरोरत्नाय धूर्जटेः । कलाभिर्वर्धमानाय नमश्चन्द्राय चारवे ॥'

से प्रार्थना करे । फिर

' गणेशाय नमस्तुभ्यं सर्वसिद्धिप्रदायक । संकष्टं हर मे देव गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तुते ॥'

से गणेशजीको तीन अर्घ्य देकर -

' तिथीनामुत्तमे देवि गणेशप्रियवल्लभे । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं सर्वसिद्धिप्रदायिके ॥'

से तिथिको अर्घ्यं दे । पीछे सुपूजित गणेशजीका

'आयातस्त्वमुमापुत्र ममानुग्रहकाम्यया । पूजितोऽसि मया भक्त्या गच्छ स्थानं स्वकं प्रभो ॥'

से विसर्जन कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और स्वयं तैलवर्जित एक बार भोजन करे । .......हाँ, यह व्रत तो गणेशजीका है, फिर इसमें चन्द्रमाका प्राधान्य क्यों माना गया है ? तो इस विषयमें ब्रह्माण्डपुराणमें लिखा है कि पार्वतीने गणेशजीको प्रकट किया, उस समय इन्द्र - चन्द्रादि सभी देवताओंने आकर उनका दर्शन किया; किंतु शनिदेव दूर रहे । कारण यह था कि उनकी दृष्टिसे प्रत्येक प्राणी और पदार्थके टुकड़े हो जाते थे । परंतु पार्वतीके रुष्ट होनेसे शनिने गणेशजीप\र दृष्टि डाली । फल यह हुआ कि गणेशजीका मस्तक उड़कर अमृतमय चन्द्रमण्डलमें चला गया ।........दूसरी कथा यह है कि पार्वतीने अपने शरीरके मैलसे गणेशजीको उत्पन्न करके उनको द्वारपर बैठा दिया । जब थोड़ी देर बाद शिवजी आकर अंदर जाने लगे, तब गणेशजीने उनको नहीं जाने दिया । तब उन्होंने अनजानमें अपने त्रिशूलसे उनका मस्तक काट डाला और वह चन्द्रलोकमें चला गया । इधर पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये शिवजीने हाथीके सद्योजात बच्चेका मस्तक मँगवाकर गणेशजीके जोड़ दिया । विज्ञानियोंका विश्वास है कि गणेशजीका असली मस्तक चन्द्रमामें है और इसी सम्भावनासे चन्द्रमाका दर्शन किया जाता है । .....यह व्रत ४ या १३ वर्षतक करनेका है । अतः अवधि समाप्त होनेपर इसका उद्यापन करे । उसमें सर्वतोभद्रमण्डलपर कलश स्थापन करके उसपर गणेशजीकी स्वर्णमयी मूर्तिका पुजन करे । ॠतुकालके गन्ध - पुष्पादि धारण कराये । उसी जगह चाँदीके चन्द्रमाका अर्चन करे । नैवेद्यमें

' इक्षवः सक्तवो रम्भाफलानि चिमटास्तथा । मोदका नारिकेलानि लाजा द्रव्याष्टकं स्मृतम् ॥'

का ग्रहण करे । घी, तिल, शर्करा और बिजोरेक टुकड़ोंको एकत्र करके इनका यथाविधि हवन करे । इसके पीछे २१ मोदक लेकर १ गणञ्जय, २ गणपति, ३ हेरम्ब, ४ धरणीधर, ५ महागणाधिपति, ६ यज्ञेश्वर, ७ शीघ्रप्रसाद, ८ अभङ्गसिद्धि, ९ अमृत्म १० मन्त्रज्ञ, ११ किन्नाम, १२ द्विपद, १३ सुमङ्गल, १४ बीज, १५ आशापूरक, १६ वरद, १७ शिव, १८ कश्यप, १९ नन्दन, २० सिद्धिनाथ और २१ ढुण्ढिराज - इन नामोंसे एक - एक मोदक अर्पण करे । इसके अतिरिक्त गोदान, शय्यादान आदि देकर और ब्राह्मणभोजन कराकर स्वयं भोजन करे । उक्त २१ मोदकोंमे १ गणेशजीके लिये छोड़ दे, १० ब्राह्मणोंको दे और दस अपने लिये रखे । .........कथाका सार यह है कि प्राचीन कालमें मयूरध्वज नामका राजा बड़ा प्रभावशाली और धर्मज्ञ था । एक बार उसका पुत्र कहीं खो गया और बहुत अनुसंधान करनेपर भी न मिला । तब मन्त्रिपुत्रकी धर्मवती स्त्रीके अनुरोधसे राजाके सम्पूर्ण परिवाने चैत्र कृष्ण चतुर्थीका बड़े समारोहसे यथाविधि व्रत किया । तब भगवान् गणेशजीकी कृपासे राजपुत्र आ गया और उसने मयूरध्वजकी आजीवन सेवा की ।

१. यदा संक्लेशितो मत्यों नानादुःखैश्च दारुणैः ।

तदा कृष्णे चतुर्थ्यां वै पूझनीयो गणाधिपः ॥ ( भविष्यपुराण )

२. चतुर्थी गणनाथस्य मातृविद्धा प्रशस्यते ।

मध्याह्णव्यापिनी चेत् स्यात् परतश्चेत् परिऽहनि ॥ ( बृहस्पति )

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2009-01-16T00:40:51.2400000

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