अखंडध्याननाम - ॥ समास दूसरा - भिक्षानिरूपणनाम ॥

‘संसार-प्रपंच-परमार्थ’ का अचूक एवं यथार्थ मार्गदर्शन इस में है ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
ब्राह्मण की मुख्य दीक्षा । मांगनी चाहिये भिक्षा । 'ॐ भवति' इस पक्ष की रक्षा करनी चाहिये ॥१॥
भिक्षा मांगकर जिसने खाया। वह निराहारी कहलाया । प्रतिग्रह से मुक्त हुआ । भिक्षा मांगने पर ॥२॥
संतासंत जो जन । वहां कोरान्न मांगकर करे भोजन । उसने किया अमृतप्राशन । प्रतिदिन ॥३॥

॥ श्लोक ॥ भिक्षाहारी निराहारी भिक्षा नैव प्रतिग्रहः ।
असन्तो वापि सन्तो वा सोमपानं दिने दिने ॥छ॥

ऐसी भिक्षा की महिमा । भिक्षा माने सर्वोत्तमा । ईश्वर की अगाध महिमा । वह भी भिक्षा मांगे ॥४॥
दत्त गोरक्ष आदि करके । सिद्ध भिक्षा मांगते जनों में । निस्पृहता भिक्षा से । प्रकट होती ॥५॥
दिन तय करके बैठा । फिर वह पराधीन हुआ । वैसे ही रोज खाया पराया । तब स्वातंत्र्य कहां ॥६॥
आठ दिनों का अनाज जमाया । फिर भी वह हुआ ऊबाने वाला । प्राणी एकाएक विचलित हुआ । नित्यनूतनता से ॥७॥
नित्य नूतन करें भ्रमण । उदंड करें देशाटन । तभी फिर भिक्षा मांगने पर भलापन । श्लाघ्य होता ॥८॥
अखंड भिक्षा का अभ्यास । उसे लगे ना परदेश । जहां वहां स्वदेश । लोकत्रयों में ॥९॥
भिक्षा मांगने में किरकिर न करें । भिक्षा मांगने में ना लजायें । भिक्षा मांगने से ना थक जायें । परिभ्रमण करें ॥१०॥
भिक्षा और चमत्कार । छोटे बड़े करते अचरज । कीर्ति बखानते निरंतर । भगवंत की ॥११॥
भिक्षा याने कामधेनु । सदा फलदायिनी नहीं सामान्यु । भिक्षा को करे जो अमान्यु । वह अभागा जोगी ॥१२॥
भिक्षा से परिचय होते । भिक्षा से भ्रम टूटते । सामान्य भिक्षा मान्य करते । सकल प्राणी ॥१३॥
भिक्षा याने निर्भय स्थिति । भिक्षा से प्रकट होती महंती । स्वतंत्रता ईश्वर प्राप्ति। भिक्षा की गुणों से ॥१४॥
भिक्षा में नहीं बंधन कुछ । भिक्षाहारी वह मुक्त । भिक्षा से होता काल सार्थक । समय बीते ॥१५॥
भिक्षा याने अमरवल्ली । जहां वहां फैली । कठिन काल में फलदायिनी हुई। निर्लज्ज को ॥१६॥
पृथ्वी में देश नाना । भ्रमण करते भूखा मरे ना । किसी एक स्थान पर जन । को भारी न होता ॥१७॥
गोरज्य वाणिज्य कृषि । इनसे बडी प्रतिष्ठा भिक्षा की । भूलें न झोली । कभी भी ॥१८॥
भिक्षा समान नहीं वैराग्य । वैराग्य से परे नहीं भाग्य । वैराग्य न होने पर अभाग्य । एकदेशी ॥१९॥
कुछ भिक्षा है कहें ऐसे । रहे अल्पसंतोष से । बहुत लाने पर लें । मुठ्ठी भर ॥२०॥
सुखरूप भिक्षा मांगना । ऐसे निस्पृहता के लक्षण । मृद वाग्विलास करना। परम सौख्यकारी ॥२१॥
ऐसी भिक्षा की स्थिति । अल्प कही यथामति । भिक्षा बचाती विपत्ति । होने वाले समय में ॥२२॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे भिक्षानिरूपणनाम समास दूसरा ॥२॥

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Last Updated : December 09, 2023

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