शिवानन्दलहरी - श्लोक ९१ ते ९५

शिवानंदलहरी में भक्ति -तत्व की विवेचना , भक्त के लक्षण , उसकी अभिलाषायें और भक्तिमार्ग की कठिनाईयोंका अनुपम वर्णन है । `शिवानंदलहरी ' श्रीआदिशंकराचार्य की रचना है ।


९१

आद्याविद्या ह्रद्रता निर्गतासी -

द्विद्या ह्रद्या ह्रद्रता त्वत्प्रसादात् ।

सेवे नित्यं श्रीकरं त्वत्पदाव्जं

भावे मुक्तेभजिनं राजमौले ॥९१॥

 

९२

दूरीकृतानि दुरितानि दुरक्षराणि

दौर्भाग्यदुःखदुरहंकृतिदुर्वचांसि ।

सारं त्वदीयचरितं नितरां पिबन्तं

गौरीश मामिह समुद्वर सत्कटाक्षैः ॥९२॥

 

९३

सोमकलाधरमौलौ

कोमलधनकन्धरे महामहसि ।

स्वामिनि गिरिजानाथे

मामकह्रदयं निरन्तरं रमताम् ॥९३॥

 

९४

सा रसना ते नयने

तावेव करौ स एव कृतकृत्यः ।

या ये यौ यो भर्ग

वदतीक्षेते सदार्चतः स्मरति ॥९४॥

 

९५

अतिमृदुलौ मम चरणा -

वतिकठिनं ते मनो भवानीश ।

इति विचिकित्सां संत्यज

शिव कथमासीद्‍ गिरौ तथा प्रवेशः ॥९५॥

हे राजशेखर ! आपकी कृपा से अनादि अविद्या ह्रदय से दुर हो गई , और ह्रदय के लिये हितैषी विद्या ह्रदय में समा गई । अब मैं सदा शुभकारी और मुक्तिदायक आपके चरणकमलों का ध्यान करता हूँ और उनकी सेवा करता हूँ । ॥९१॥

हे गौरीपति ! आपके चरित्रों का निरन्तर पूर्णरुप से रसपान करते हुए मेरे दुःख , दुर्भाग्य , कष्ट बुरी दृष्टि , और बुरे वचन -सब दूर हो गये हैं । अपने कृपा कटाक्षों से मेरा उद्वार किजिये । ॥९२॥

जिन गिरिजापति शिव के मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है , नवीन मेघ के समान अत्यन्त सुन्दर नीली ग्रीवा है , उन स्वामी में मेरा ह्रदय निरन्तर रमता रहे ।

इन पद्यों में फलश्रुति के रुप में भगवान् शिव की भक्ति का प्रताप वर्णन किया जा रहा है। अब प्रार्थना से अधिक अहोभाग्य का प्रदर्शन है । ॥९३॥

रसना वही जो उनका गुणगान करे , दो नेत्र वही जो उनका दर्शन करें , वे ही हाथ हैं जो उनकी अर्चना करें , और उनका स्मरण ही करने योग्य कार्य है । ॥९४॥

" मेरे चरण कोमल हैं , इसका ह्रदय कठोर है " इस सोच विचार को , हे गिरिजा पति ! त्याग दीजिये । हे शिव ! पर्वतों पर आपका प्रवेश कैसे हुआ ॥९५॥


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Last Updated : November 11, 2016

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