शिवानन्दलहरी - श्लोक १६ ते २०

शिवानंदलहरी में भक्ति -तत्व की विवेचना , भक्त के लक्षण , उसकी अभिलाषायें और भक्तिमार्ग की कठिनाईयोंका अनुपम वर्णन है । `शिवानंदलहरी ' श्रीआदिशंकराचार्य की रचना है ।


१६

विरिच्चिर्दीर्घायुर्भवतु भवता तत्परशिर -

श्वतुष्कं संरक्ष्यं स खलु भुवि दैन्यं लिखितवान्

विचा रः को वा मां विशद कृपया पाति शिव ते

कटाक्षव्यापा रः स्वयमपि च दीनावनप रः॥१६॥

१७

फलाद्वा पुण्यानां मयि करुणया वा त्वपि विभो

प्रसन्नेऽपि स्वामिन् भवदमलपादाब्जयुगलम् ।

कथं पश्येयं मां स्थगयति नमः संभ्रमजुषां

निलिम्पानां श्रेणिर्निजकनकमाणिक्यमुकु टैः ॥१७॥

 

१८

त्वमेको लोकानां पतमफलदो दिव्यपदवीं

वहन्तस्त्वन्मूलां पुनरपि भजन्ते हरिमु खाः ।

कियद्वा दाक्षिण्यं तव शिव मदाशा च कियती

कदा वा मद्रक्षां वहसि करुणापूरितदृशा ॥१८॥

 

१९

दुराशामूयिष्ठे दुरधिपगृहद्वारघटके

दुतन्तें संसारे दुरितनिलये दुःखजनके ।

मदायासं किं न व्यपनयसि कस्योपकृतये

वदेयं प्रीतिश्चेत्तव शिव कृता र्थाः खलु वयम् ॥१९॥

 

२०

सदा मोहाटव्यां चरति युवतीनां कुचगिरौ

नटत्याशाशाखास्वटति झटिति स्वैरमभि तः ।

कपालिन् भिक्षो मे ह्रदयकपिमत्यन्तचपलं

दृढ़ं भक्त्या वद्ध्वा शिव भवदधीनं कुरु विभो ॥२०॥

भाग्य -विधाता ब्रह्या चिरायु हों , उनके बचे हुए चार शिर रक्षा करने योग्य हैं । उन्होंने तो इस संसार में दु ःख ही दु ःख लोगों के भाग्य में लिखे हैं । लेकिन चिन्ता की कोई बात नहीं । हे शिवशम्भो ! आप का कृपा -कटाक्ष तो अपने -आप ही दीन -दुखियों की रक्षा में तत्पर रहता है । ॥१६॥

हे सर्वव्यापी परमेश्वर ! मेरे पुण्यों के फलस्वरुप अथवा मेरे ऊपर आपकी कृपा के कारण , आपके प्रसन्न होने पर भी , आपके दिव्य चरण कमलों को मैं कैसे देखूँ ? स्वामी ! आपकी वन्दना में पंक्तिवद्व देवताओं के सोने और लालमणियों से जुड़े मुकुटों की चकाचौंध मुझे आपके -चरण कमलों का दर्शन करने से रोकती है । ॥१७॥

हे परमेश्वर शिव ! लोगों के लिये परमफल -मुक्ति -केवल आप ही प्रदान करते हैं । विश्णु आदि देवगण , आपसे दिव्य पदवी प्राप्त कर , और अधिक ऊँची पदवी के लिये , फिर प्रार्थना करते हैं । आपकी कितनी बड़ी दयालुता है , और मेरी कितनी बड़ी अभिलाषा ! अपनी करुणाभरी दृष्टि से मेरी ओर कब आपका कृपाकटाक्ष होगा , और मेरी रक्षा का भार आप कब स्वीकार करेंगे ॥१८॥

हे शिवशंकर ! यह संसार दुर्वासनाओं से भरा है । यहाँ दुर्जन स्वामियों के द्वार पर माथा टेकना पड़ता है । इसका कोई अन्त नहीं है (अथवा इसका दुःख में अन्त होता है, यह आपदाओं का घर है , और दुःख उत्पन्न करनेवाला है । ऐसी अवस्था में आप मेरा दुःख , किसे उपकृत करने के लिये , दूर नहीं कर रहे हैं ? बताइये यदि मेरी यही स्थिति आपको अच्छी लगती है तो , हे शिव ! मैं इसमें भी कृतार्थ हूँ , आपकी इच्छा मुझे स्वीकार्य है । ॥१९॥

हे खप्पड़धारी भिक्षु ! मेरा यह मन बंदर के समान बड़ा चंचल है । बंदर की भाँति यह मोहरुपी जंगल में घूमता रहता है । काल्पनिक युवतियों के कुच शिखरों पर नाचता रहता है , और मनमाने उच्छ्रंखल , भाव से आशारुपी शाखाओं में इधर -उधर कूदता -फाँदता रहता है । हे सर्वव्यापी शिव ! मेरे इस ह्रदयरुपी चंचल बन्दर को अपनी भक्ति में पक्का बाँधकर अपने वश में कर लीजिये । ॥२०॥


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Last Updated : November 11, 2016

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