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वराह

A Sanskrit English Dictionary | sa  en |   | 
वराह  m. m. (derivation doubtful) a boar, hog, pig, wild boar, [RV.] &c. &c. (ifc. it denotes, ‘superiority, pre-eminence’; See g.व्याघ्रा-दि)
a cloud, [Naigh. i, 10]
a bull, [Col.]
a ram, [L.]
Delphinus Gangeticus, [L.]
वराहावतार   N. of विष्णु in his third or boar-incarnation (cf.), [TĀr.]; [MBh.] &c.
an array of troops in the form of a boar, [Mn. vii, 187]
a partic. measure, [L.]
Cyperus Rotundus, [L.]
yam, manioc-root, [L.]
वराह-पुराण   = and °हो-पनिषद् (q.v.)
N. of a दैत्य, [MBh.]
of a मुनि, ib.
पण्डित   of various authors (also with and शर्मन्), [Cat.]
वराह-मिहिर   abridged fr., ib.; [Uṇ.] Sch.
of the son of a guardian of a temple, [Rājat.]
of a mountain, [MBh.]; [R.]
of one of the 18 द्वीपs, [L.]

वराहः [varāhḥ]   [वराय अभीष्टाय मुस्तादिलाभाय आहन्ति भूमिम् आ-हन्-ड [Tv.]]
A boar, hog; विस्रब्धं क्रियतां वराहततिभिर्मुस्ताक्षतिः पल्वले [Ś.2.6.]
A ram.
A bull.
A cloud.
A crocodile.
An array of troops in the form of a boar.
 N. N. of Viṣṇu in the third or boar incarnation; cf. वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना शशिनि कलङ्ककलेव निमग्ना । केशव धृतशूकररूप जय जगदीश हरे [Gīt.1.]
A particular measure.
 N. N. of Varāhamihira
 N. N. of one of the 18 Purāṇas.
A mountain; L. D. B.
A coin; L. D. B.
A kind of grass; L. D. B. -Comp.
-अवतारः   the boar or third incarnation of Viṣṇu.
-कन्दः   a kind of esculent root.
-कर्णः   a kind o arrow; वराह- कर्णैर्नालोकैविकर्णैश्चाभ्यवीवृषत् [Mb.7.166.24.]
-कर्णिका   a kind of missile.
-कल्पः   the period of the boar incarnation, the period during which Viṣṇu assumed the form of a boar.
-क्रान्ता   the sensitive plant.
-द्वादशी   a festival held on the 12th day in the bright half of Māgha in honour of Viṣṇu.
-नामन्  n. n. an esculent root.
-पुराणम्  N. N. of one of the 18 major purāṇas.
-मिहिरः  N. N. of a celebrated astronomer, author of बृहत्संहिता (supposed to be one of the 'nine gems' at the court of king Vikrama).
-शृङ्गः  N. N. of Śiva.

Shabda-Sagara | sa  en |   | 
वराह  m.  (-हः)
1. A hog.
2. A name of VISHṆU in the third Avatār or descent, in which be assumed the shape of a boar.
3. A bull.
4. A ram.
5. A cloud.
6. A crocodile.
7. An array of troops in the form of a hog.
8. A mountain.
9. A fragrant grass, (Cyperus.)
10. A particular measure.
11. One of the eighteen smaller Dwīpas or divisions of the universe.
E. वर best, हन् to injure,
See also: वर - हन्
with आङ् prefix, and aff.

A dictionary, Marathi and English | mr  en |   | 
A boar. 2 The boar-avatár of Vishn̤u.

 पु. 
डुक्कर .
विष्णूचा एक अवतार . - ज्ञा ११ . ६२ .

वराह n.  विष्णु का तृतीय अवतार, जो हिरण्याक्ष नामक असुर के वध के लिए उत्पन्न हुआ था । इसे ‘ यज्ञवराह ’ नामांतर भी प्राप्त था [म. स. परि. १ क्र. २१ पंक्ति. १४०]
वराह n.  वराह अवतार का अस्पष्ट निर्देश वैदिक साहित्य में प्राप्त है । किन्तु वहॉं कौनसी भी जगह वराह - अवतार को विष्णु का अवतार नहीं बताया गया है । ऋग्वेद में इंद्र के द्वारा वराह का वध होने की कथा दी गई है [ऋ. १०.९९.६] । प्रजापति के द्वारा वराह, का रुप लेने की कथा तैत्तिरीय - संहिता में प्राप्त है । पृथ्वी के उत्पत्ति के पूर्वकाल में प्रजापति वायु का रुप धारण कर अंतरिक्ष में घूम रहा था । उस समय समुद्र के पानी में डूबी हुई पृथ्वी उसने सहजवश देखी । फिर प्रजापति ने वराह का रुप धारण कर पानी में प्रवेश किया, एवं पानी में डूबी हुई पृथ्वी को उपर उठाया । तत्पश्चात् उसने पृथ्वी को पोंछ कर स्वच्छ किया, एवं वहॉं देव, मनुष्य आदि का निर्माण किया [तै. सं. ७.१.५.१] । तैत्तिरीय ब्राह्मण में यही कथा कुछ अलग ढंग से दी गई है, जिसके अनुसार ब्रह्मा के नाभिकमल के निचले भाग में स्थित कीचड प्रजापति ने वराह का रुप धारण कर क्षीरसागर से उपर लाया, एवं उसे ब्रह्मा के नाभिकमल के पन्नों पर फैला दिया । आगे चल कर उसी कीचड ने पृथ्वी का रुप धारण किया [तै. ब्रा. १.१.३]
वराह n.  इन ग्रंथों में निर्दिष्ट विष्णु के अवतार प्रायः ‘ वराह अवतार ’ से ही प्रारंभ होता हैं । हिराण्याक्ष नामक असुर पृथ्वी का हरण कर उसे पाताल में ले गया । उस समय विष्णु ने वराह का रुप धारण कर, अपने एक ही दॉंत से पृथ्वी को उपर उठा कर समुद्र के बाहर लाया, एवं उसकी स्थापना शेष नाग के मस्तक पर की । तत्पश्चात् उसने हिराण्याक्ष का भी वध किया [म. व. परि. १. क्र. १६. पंक्ति. ५६ - ५८, क्र. २७. पंक्ति. ४७ -५० ];[ म.शां. २६०];[ मत्स्य. ४७.४७.२४७ - २४८];[ भा. १.३.७, २.७.१, ३.१३.३१];[ लिंग. १.९४];[ वायु. ९७.७];[ ह. वं. १.४१];[ पद्म. उ. १६९, २३७] । विष्णु का यह अवतार वाराह - कल्प के प्रारंभ में हुआ [वायु. २३.१०० -१०९] । कई पुराणों में इसका स्वरुपवर्णन प्राप्त है, जहॉं इसे चतुर्बाहु, चतुष्पाद, चतुर्नेत्र एवं चतुर्मुख कहा गया है । हिरण्याक्ष के वध के पश्चात् इसने यथाविधि श्राद्ध किया था [म. शां. ३३३.१२ - १७]
वराह n.  जिस स्थानपर इसने पृथ्वी का उद्धार किया, उस स्थान को ‘ वराहतीर्थ ’ कहते हैं [म. व. ८१.१५];[ पद्म. उ. १६९] । वराह पुराण के अनुसार, यह ‘ वराहक्षेत्र ’ अथवा ‘ कोकामुखक्षेत्र ’ बंगाल में त्रिवेणी नदी के तट पर नाथपूर ग्राम के पास स्थित है [वराह. १४०.] । गंगानदी के तट पर सोरोन ग्राम में वराह - लक्ष्मी का मंदीर हैं [वराह. १३७]
वराह n.  विष्णु के दस अवतारों में से मत्स्य, कूर्म एवं वराह ये ‘ दिव्य ’, अर्थात मनुष्य जाति के उप्तत्ति के पूर्व के अवतार माने जाते हैं । विष्णु के मानुषी अवतार अर्धमनुष्याकृति नृसिंह से, एवं वामन अवतार से प्रारंभ होते है । इससे प्रतीत होता है कि, मत्स्य, वराह एवं कूर्म अवतार पृथ्वी के उस अवस्था में उत्पन्न हुए थे, जिस समय पृथ्वी पर कोई भी मनुष्य प्राणि का अस्तित्व नहीं था । प्राणिजाति की उत्क्रान्ति के दृष्टि से भी मत्स्य, कूर्म, वराह यह क्रम सुयोग्य प्रतीत होता है । क्यों कि, प्राणिशास्त्र के अनुसार सृष्टि में सर्वप्रथम जलचर प्राणि ( मत्स्य ) उत्पन्न हुए, एवं तप्तश्चात् क्रमशः जमीन पर घसीट कर चलनेवाले ( कूर्म ) , स्तनोंवाले ( वराह ), एवं अन्त में मनुष्यजाति का निर्माण हुआ । इस प्रकार पुराणों में निर्दिष्ट विष्णु के दैवी अवतार प्राणिजाति के उत्क्रान्ति के क्रमशः विकसित होनेवाले रुप प्रतीत होते हैं । प्राणिशास्त्र की दृष्टि से, प्राणीजाति के उत्पत्ति के पूर्व समस्त सृष्टि जलमय थी, जहां के कीचड में सर्वप्रथम प्राणिजाति की उत्पत्ति हुई । इस दृष्टि से देखा जाये तो, प्रजापति ने वराह का रुप धारण कर समुद्र का सारा कीचड पानी के बाहर लाया, एवं उसी कीचड से सर्वप्रथम पृथ्वी का, एवं तत्पश्चात पृथ्वी के प्राणिसृष्टि का निर्माण किया, यह तैत्तिरीय ब्राह्मण में निर्दिष्ट कल्पना उत्क्रान्तिवाद की दृष्टि से सुयोग्य प्रतीत होती है । वैदिक वाडमय में सर्वत्र ब्रह्मा को सृष्टि का निर्माण करनेवाला देवता माना गया है, जिसका स्थान ब्राह्मण एवं पौराणिक ग्रंथों में क्रमशः प्रजापति एवं विष्णु के द्वारा लिया गया है ( ब्रह्मन्, विष्णु एवं प्रजापति देखिये ) । यही कारण है कि, ब्राह्मण एवं पौराणिक ग्रंथों में वराह को क्रमशः प्रजापति एवं विष्णु का अवतार कहा गया है ।
वराह II. n.  युधिष्ठिर की सभा का एक ऋषि [म. स. ४.१५]

Puranic Encyclopaedia  | en  en |   | 
VARĀHA   An ancient hermit. It is mentioned in [Mahābhārata, Sabhā Parva, Chapter 4, Stanza 17], that this hermit stayed in the palace of Yudhiṣṭhira.
VARĀHA III   (Boar). One of the ten incarnations of Mahāviṣṇu.
1) Need for this incarnation.
Jaya and Vijaya, two doorkeepers of Mahāviṣṇu showed disrespect towards the famous hermits Sanaka and others who went to visit Mahāviṣṇu. The angry hermits cursed them to take birth as asuras. Accordingly Jaya and Vijaya took birth as the two asuras Hiraṇyākṣa and Hiraṇyakaśipu and were born from Prajāpati Kaśyapa by his wife Diti. Even their birth itself was inauspicious. Once, while Kaśyapa was carrying on evening worship, his wife was filled with libid. She embraced Kaśyapa. Because she got pregnancy in an inauspicious moment, two asura sons were born. At the time of their birth darkness spread over the whole of the world, and some ill omens were seen. The Devas (gods) trembled. The elder son was called Hiraṇyākṣa and the second son was called Hiraṇyakaśipu. As Hiraṇyākṣa grew up he began to quarrel with the Devas. When the fight grew fierce, he picked up the earth in his hands as a ball and went under water. There was left only water. The Devas went to Mahāviṣṇu and prayed to him in order to get the earth back. At this time Manu Svāyambhuva, the son of Brahmā, was living with his father looking after his welfare. The father, who was pleased with the services of his son said. “My dear son, you should worship Devī, who will be pleased with your devotion and will bless you. If she is pleased with you, you will become a famous Prajāpati.” Hearing the words of Brahmā, Svāyambhuva worshipped Devī with ardent devotion, deep meditation and severe vows and penance, at which Jagadambā was pleased. She appeared before him and asked him what boon he wanted. Manu requested that he should be permitted to carry on creation without any obstruction. Devī gave him permission. Manu returned to his father Brahmā and said. “Father, point out to me a solitary place. I will sit there and create subjects by the blessings of Devī.” Only when he heard the request of his son, did Brahmā begin to think about the exigency of providing his son with such a place. For, the earth was completely under water. For a long time even Brahmā was being subjected to much inconvenience to carry on creation. Only Bhagavān Ādi Nārāyaṇa (Viṣṇu) could do anything in this matter. So Brahmā with the Manus, hermits and others began to meditate on Mahāviṣṇu.
2) Incarnation.
Instantly the young one of a Boar jumped out of the nose of Brahmā through his breath. That divine figure of Boar stood in the air and began to grow. Within a few moments, it became a colossal Being. It grew up as big as an elephant. Soon it became as large as a mountain. Seeing this, Brahmā and the others stood in amazement. The Boar made a grunt in a loud roaring sound. The people of Janaloka, Satyaloka etc. understood that it was the sound of Mahāviṣṇu. They raised glory and praise to Bhagavān, who heard all these praises, but without condescending to tell anything, looked at all of them with grace and love, and with a mighty force jumped into the sea. It was immensely troubled by the manes of God Almighty. Varuṇa prayed to him to save him from them. Bhagvān folded his mane and went down to the deep water and made a search for the earth. The Boar walked smelling and snorting and found out the earth. He slowly lifted it on his tusks and started from there. On the way, the fierce and wicked Hiraṇyākṣa hindered him. Bhagavān Viṣṇu used his club Nandaka and killed Hiraṇyākṣa. It was besmeared with his blood; Mahāviṣṇu came up to the surface of water with the earth. He set the earth firm over the water. Thus Brahmā gave Manu a place in the earth which floated on the water like a lotus-leaf, and empowered him to perform creation.
3) Incarnation of Boar again.
The goddess Earth, the deity of earth which was raised to the surface of water, fell in love with Mahāviṣṇu and embraced him. He embraced her in return. These mutual embraces continued for one complete Devavarṣa (year of God) and consequently the goddess Earth became tired and weak and unconscious. So the earth slid down a little under water. Bhagavān took the form of a Boar again and lifted the earth to its original place and returned to Vaikuṇṭha. [Bhāgavata, Skandha 3];[ Devī Bhāgavata Skandhas 8 and 9];[ Agni Purāṇa, Chapter 5];[ Padma Purāṇa, Bhūmikhaṇḍa, Chapter 91].
VARĀHA IV   A mountain near Girivraja, the capital city of Magadha. [Mahābhārata, Sabhā Parva, Chapter 21, Stanza 2].
VARĀHA PURĀṆA   See under Purāṇa.

Aryabhushan School Dictionary | mr  en |   | 
 m  A boar.

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