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भीष्म

See also BHĪṢMA , BHĪṢMA PARVA
A warrior renowned in Hindú story for his bravery, wisdom, continence, and fidelity to his word. Hence, appellatively, a valiant, wise, continent, and faithful person in general. 2 A cant name for a bug. Because the blood of this creature, like the eyes of the hero, is said to split diamonds.
 पु. 
शौर्य , शहाणपणा , ब्रह्मचर्य व सत्यप्रतिज्ञा यांविषयीं एक पुराणप्रसिद्ध क्षत्रिय भारती योद्धा .
( ल . ) शूर , बुद्धिमान , इंद्रियनिग्रही , सत्यप्रतिज्ञ असा मनुष्य .
( संकेत ) ढेंकूण . ( कारण भीष्माच्या नेत्रांनीं जसा हिरा भग्न होई त्याप्रमाणें या प्राण्याच्या रक्तानें हिरा भंगतो असें म्हणतात ). [ सं . ] सामाशब्द -
०तर्पण  न. दिपवाळीमध्यें नरक चतुर्दशीस भीष्माप्रीत्यर्थ करावयाचें तर्पण . [ सं . ]
०प्रतिज्ञा  स्त्री. 
भीष्मानें आमरण पाळेली अविवाहित राहण्याची प्रतिज्ञा . यावरुन
( ल . ) खात्रीचें वचन ; कधीं न मोडणारा निश्चय .
घोर , अचाट प्रतिज्ञा . भीष्माष्टमी - स्त्री . माघ शुद्ध अष्टमी ; भीष्माच्या पुण्यतिथीचा दिवस . [ सं . भीष्म + अष्टमी ]
n.  (सो.कुरु.) सुविख्यात राजनीति एवं रणनीति शास्त्रज्ञ जो कुरु राज शन्तनु के द्वारा गंगा नदी के गर्भ से उत्पन्न हुआ था । अष्टवसुओं में से आठवें वसु के अंश से यह उत्पन्न हुआ था [म.आ.९०.५०] । इसका मूल नाम ‘देवव्रत’ था । गंगा का पुत्र होने के कारण, इसे ‘गांगेय’ ‘जाह्रवीपुत्र,’ ‘भागीरथीपुत्र’ आदि नामांतर भी प्राप्त थे । ‘भीष्म’ का शाब्दिक अर्थ ‘भयंकर’ है । इसने अपने पिता शन्तनु के सुख के लिए आजन्म अविवाहित रहने एवं राजत्याग करने की भयंकर प्रतिज्ञा की थी । इसीसे इसे ‘भीष्म’ कहा गया ।
ध्येयवादी व्यक्तित्त्व n.  एक अत्यधिक पराक्रमी एवं ध्येयनिष्ठ राजर्षि के रुप में भीष्म चरित्रचित्रण श्री व्यास के द्वारा महाभारत में किया गया है । परशुराम जामदग्न्य के समान युद्धविशारदों को युद्ध में परास्त करनेवाला भीष्म महाभारतकालीन सर्वश्रेष्ठ पराक्रमी क्षत्रिय माना जा सकता है । अपने इस पराक्रम के बल पर कुरुकुल का संरक्षण करना, एवं उस कुल की प्रतिष्ठा को बढाना, यही ध्येय भीष्म के सामने आमरण रहा । कुरुवंशीय राजा शंतनु से ले कर चित्रांगद, विचित्रवीर्य, पाण्डु, धृतराष्ट्र तथा दुर्योधन तक कौरववंश की ‘संरक्षक देवता’ के रुप में यह प्रयत्नशील रहा । अपने इस ध्येय की पूर्ति के लिये, अपनी तरुणाई में सभी विलासादि से यह दूर रहा, एवं वृद्धावस्था में मोक्षप्राप्ति के प्रति कभी उत्सुक न रहा । यह चाहता था केवल कुरुवंश का कल्याण एवं प्रतिष्ठा, जिसके लिए यह सदैव प्रयत्नशील रहा । भीष्म का दैवदुर्विलास यही था कि, जिस कुरुवंश की महत्ता के लिए यह आमरण तरसता रहा, उसी कुरुकुल का संपूर्ण विनाश इसके ऑखों के सामने हुआ, एवं इसके सारे प्रयत्न विफल साबित हुए । चित्रांगद, विचित्रवीर्य, पाण्डु, धृतराष्ट्र जैसे अल्पायु, कमजोर एवं शारिरीक व्याधीउपाधियों से पीडित राजाओं के राज्य को अपने मजबूत कंधों पर सँभलनेवाला भीष्म, भारतीययुद्ध के काल में कुरुवंश को आपसी दुही से न बचाया सका । इसी कारण, भारतीय युद्ध के दसवें दिन, इसने अत्यंत शोकाकुल हो कर अर्जुन से कहा, ‘मुझे युद्ध में परास्त कर मेरा पराजय करने की ताकद दुनिया में किसी को भी नही है । किंतु मेरा दुर्भाग्य यही है कि, पराजित हो कर ही मुझे मृत्यु प्राप्त करनी है । अतएव, मुझे युद्ध में हराकर, तुम विजय प्राप्त करो’।
योग्यता n.  भीष्म सर्वशास्त्रवेत्ता, परम ज्ञानी एवं तत्त्वज्ञान का महापंडित था । यह किसी की समस्याओं को तत्काल सुलझा देनेवाला, संशय का शमन करनेवाला, तथा जिज्ञासुओं की शंकासमाधान करनेवाला सात्त्विक विचारधारा का उदार महापुरुष था । यह रणविद्या, राजनीति, अर्थशास्त्र, एवं अध्यात्मज्ञान के साथ धर्म, नीति, एवं दर्शन परमवेत्ता था । गंगा ने वसिष्ठद्वारा, इसे समस्त वेदों में पारंगत कराया था । बृहस्पति तथा शुक्राचार्य के द्वारा इसने अस्त्रशस्त्र का ज्ञान प्राप्त किया था । परशुराम से अन्य अस्त्रशास्त्रो के साथ धनुर्वेद, राजधर्म तथा अर्थशास्त्र मी सीखा था [म.आ.९४.३१-३६] । इसके अतिरिक्त च्यवन भार्गव से साङवेद, वसिष्ट से महाबुद्धि, पितामहसुत से अध्यात्म, एवं मार्कण्डेय से यतिधर्म का ज्ञान प्राप्त किया था । शुक्र तथा बृहापति का तो यह साक्षात् शिष्य ही था । यह किसी के मारने से न मरने वाला ‘इच्छामरणी’ था, अर्थात जब यह चाहे तभी इसकी मृत्यु सम्भव थी [म.शां.३८.५-१६,४६.१५-२३]
जन्म n.  ब्रह्मा के शाप के कारण, गंगा नदी को पूरुवंशीय राजा शंतनु की पत्नी बनना पडा । वसिष्ठ के शाप तथा इंद्र की आज्ञा से अष्टवसुओं ने गंगा के उदर में जन्म लिया । उनमें से सात पुत्रों को गंगा ने नदी में डुबो दिया । आठवॉं पुत्र ‘द्यु’ नामक वसु का अंश था, जिसको डुबाते समय शंतनु ने गंगा से विरोध किया । यही पुत्र भीष्म है, जिस साथ ले कर गंगा अन्तर्धान हो गयी । इस आठवें पुत्र को वसुओं द्वारा यह शाप दिया था कि, यह निःसंतान ही होगा । अपने पुत्र भीष्म को गंगा को दे देने के उपरांत, करीब छत्तीस वर्षो के उपरांत शंतनु मृगया खेलने गया । हिरन के पीछे दौडता हुआ गंगा नदी के पास आ कर उसने देखा कि, यकायक उसका पानी कम हो गया । शंतनु को आश्चर्य की सीमा न रही । जब उन्होंने देखा कि, एक सुन्दर बालक ने अपने अचूक शरसंधान के द्वारा गंगा का प्रवाह रोक रक्खा है । इस प्रकर बालक की अस्त्रविद्या को देख कर, वह चकित हो गया [म.आ.९४.२२-२५] । यह बालक और न हो कर, शंतनुपुत्र भीष्म ही था । किन्तु इतने दिनों के बाद देखने के कारण, वह उसे पहचान न सका । जैसे ही शंतनु ने इसे देखा, वह तत्काल ही दृष्टि से ओझिल हो गया । उसके मन में शंका हुयी, कहीं यह मेरा तो पुत्र नहीं? यह बात मन में आते ही उसने गंगा को सम्बोधित कर पुत्र को पुनः दिखाने के लिए आग्रह किया । तब स्त्रीरुपधारणी गंगा शुभ्र परिधानों तथा बहुमूल्य अलंकारों को धारण किए हुए उपस्थिटा हुयीं । अन्त में गंगा ने सर्पूण पूर्वकथन कहते हुए, अपने पुत्र भीष्म को अपनी गोद से उतार कर, राजा शंतनु को दिया [म.आ.९४.३१] । जिस समय गंगा ने भीष्म को दिया, उस समय उसका मातृहृदय शोक से विह्रल था, क्योंकि, जिस पुत्र का पालन पोषण किया, शिक्षादि दी, वही पुत्र आज उससे दूर जा रहा था । अंत में गंगा उस पुत्र को दे कर अंतर्धान हो गयीं ।
हस्तिनापुत्र में n.  शंतनु ने गांगेय (भीष्म) को अपनी राजधानी हस्तिनापुर लाया, तथा शुभ मुहूर्त पर उसका युवराज्याभिषेक किया [म.आ.९४.३८] । इस प्रकार राज्यसूत्र को अपने हाथों में ले कर, यह अपने पिता की राज्यव्यवस्था की देखरेख करने लगा । इसकी योग्यता एवं व्यवहार से समस्त प्रजा एवं अन्यजन प्रसन्न थे ।
भीष्मप्रतिज्ञा n.  गंगा के विरह में पीडित शंतनु को कुछ भी न सूझता था । एक दिन जब वह मृगया के लिए गया था, तो उसे पास हे कहीं से सुगन्ध का ज्ञान हुआ । उस सुगन्ध को ढूढते ढूंढते, वह एक धीवरकन्या सत्यवती के पास आ खडा हुआ, जिसके शरीर से वह मादक सुगन्ध चारों ओर फैल कर, वातावरण को भर रही थी । शंतनु उसकी उठती युवावस्था एवं कौमार्य को देख कर लुब्ध हो उठा, एवं, धीवर से उसे प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की । किन्तु धीवर ने सत्यवती को देने से इन्कार करते हुए कहा, ‘भीष्म के रहते हुए, सत्यवती का भावी पुत्र राज्य नहीं प्राप्त कर सकता । आप इसके भावी पुत्र को अपने उपरांत राज्याधिकारी घोषित करें, तो मैं आप को सत्यवती को इसी क्षण दे सकता हूँ ।’ धीवर की यह बात सुनते ही शंतनु खिन्न हो उठा, एवं निराश हृदय वापस लौट आया, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि, भीष्म सा योग्य नेता राज्याधिकार से पदच्युत किया जाय । सत्यवती की मोहकता ने शंतनु के हृदय में इतना घर कर लिया कि, वह दिन पर दिन चिन्ता में जलने लगा । भीष्म नेपिता की उदासीनता का कारण कई बार पूँछा, किन्तु उसने इसे लज्जावश न बताया । आखिर एक दिन भीष्म को पता चल ही गया । पितृसुख के लिए स्वार्थत्याग करने का निश्चय कर, यह उस धीवर के पास जा पहुँचा । वहॉं इसने धीवर से अपने पिता के लिए सत्यवती को मॉगा, किंतु उसने अबकी बार भी वही शर्त सामने रखी । तब भीष्म ने आजन्म ब्रह्मचारी रह कर राज्यलोभ छोड कर, सदैव सत्यवती के पुत्रों की रक्षा करते हुए, उसके द्वारा हुए ज्येष्ठ पुत्र को ही राज्याधिकारी बनाने की प्रतिज्ञा की [म.आ.९४.७९] । इसकी इस भयंकर प्रतिज्ञा सुन कर देवताओं ने पुष्पवर्षा करना आरम्भ किया, एवं इसे ‘भीष्म’ नाम दिया [म.आ.९४.९३]
शंतनु की मृत्यु n.  भीष्म सत्यवती को ले आया, जिसे देखते ही पिता ने इसे आनंदित हो कर आशीर्वाद दिया, ‘तुम ‘इच्छामरणी’ होगे’ [म.आ.९४.९४] । बाद में सत्यवती के चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य नाम के दो पुत्र हुए । उनमें से चित्रांगद को गद्दी पर बैठा कर भीष्म स्वयं राज्यभार ले कर राजकाज चलाता रहा ।
उग्रायुधवध n.  शन्तनु की मृत्यु के उपरांत, उसकी नवयौवना पत्नी सत्यवती को प्राप्त करने के लिए पडोस के राजा उग्रायुध ने भीष्म के पास सन्देश भेजा कि, यह अपनी सौतीली मॉं सत्यवती को उसके यहॉं भेज दे । किन्तु अपने पिता के शोक में विह्रल भीष्म ने इसका कोई उत्तर न दिया । इस पर क्रोधित होकर उग्रायुध ने भीष्म पर चढाई करने के लिए सेनापति को आज्ञा दी । लोगों ने समझाया भी कि, भीष्म इस समय अशौच कर्म में है । अतएव इस समय उसे छेडना उचित नहीं । किन्तु उग्रायुध ने भीष्म पर हमला कर दिया । युद्ध तीन दिन तक चलता रहा, तथा उसके उपरांत, भीष्म ने उग्रायुध का वध किया [ह.वं.१.२०.४९-७१];[ म.शां.२७.१] ।किन्तु विचित्रवीर्य अभी छोटा ही था, अतएव राज्य की पूरी देखदेख भीष्म ही करता था । विवाहयोग्य आयु होने के उपरांत, भीष्म नें उसके विवाह का निश्चय किया । इतने में इसे पता चला कि, काशिराज की तीन कन्याओं अंबा, अंबिला एवं अंबालिका की शादी के लिए स्वयंवर होने वाला है । अतएव यह वहॉं गया, एवं वहॉं एकत्र हुए सभी राजाओं को चुनौती देकर, उसकी तीनों कन्याओं का हरण कर आया । विचित्रवीर्य का उन कन्याओं से विवाह करने लिए इसने मुहुर्तादि भी ठीक कराई । किन्तु बडी बहन अंबा को छोडकर अन्य दो बहनों से ही विचित्रवीर्य का विवाह हुआ, जिसका नाम अंबिका एवं अंबालिका था ।
अंबाविरोध n.  काशिराज की बडी कन्या अंबा ने कहा कि, ‘मैं विचित्रवीर्य से शादी न करुँगी, कारण कि मने मन में शाल्व का वरण किया है ’। भीष्म इस पर राजी हो गया । अंबा शाल्व के पास गयी, लेकिन वह अंबा की वरण करने को राजी न हुआ । तब उसने आकर भीष्म से कहा, ‘मैं शाल्व से विवाह करना चाहती थी, तथा तुम उसमें बाधक बन कर आये । तुमने मेरा हरण किया है, अतएव शास्त्रोक्त के अनुसार, तुम्हे मुझसे शादी करनी चाहिए । मैं कदापि विचित्रीविर्य से विवाह न करूँगी, मेरा उससे सम्बन्ध ही क्या?’ किन्तु भीष्म तैयार न हुआ । इस कारण अंबा भीष्म से अत्यधिक क्रुद्ध हुयी, एवं उसके प्राप्त के लिए तप करने लगी । तपस्याकाल मेंब, एक दिन अंबाकी भेंट अपने नाना होत्रवाहन सृंजय से हुयी । उससे अंबा ने अपना सारा रोना कह सुनायी कि, किस तरह वह शाल्य का वरण करना चाहती थी, तथा किसी प्रकार शाल्व एवं भीष्म उसका वरणरुप में स्वीकार करने लिए राजी नहीं है । यह कह कर, अंबा ने सृंजय से कुछ मदद चाही । लेकिन उसने कहा, ‘यदि तुम मदद ही चाहती हो, तो परशुराम के पास जाओ । वह तुम्हारी मदद करेंगे ।’
परशुराम से युद्ध n.  फिर अंबा परशुराम के पास गयी, एवं उससे प्रार्थना की कि, वह भीष्म का वध करे, जिसने उसका हरण कर उसका जीवन बर्बाद किया है, तथा वरण करने के लिए भी तैयार नहीं है । परशुराम ने कहा ‘मैनें किसी ब्राह्मण के कार्य हेतु ही अस्त्रग्रहण करने की, प्रतिज्ञा की है, अतएव मैं असमर्थ हूँ’। अन्त में अंबा द्वारा बार बार प्रार्थना किये जाने पर, परशुराम ने भीष्म को समझा कर मामले को सुलझाने की बात सोची । आगे चल कर परशुराम ने गुरु के नाते भीष्म को बहुविध उपदेश दिया, एवं इस बात पर जोर दिया कि, यह अंबा को स्वीकार करे । किन्तु भीष्म अपनी बात पर अटल रहे । इससे क्रोधित होकर परशुराम ने भीष्म को द्वन्द्वयुद्ध के लिए चुनौती दी । दोनों युद्ध के लिए तत्पर ही थे कि, पुत्रचिन्ता से युक्त गंगा ने आकर भीष्म से कहा, ‘परशुराम तुम्हारे गुरु हैं, तुम्हें उनसे युद्ध करना शोभा नहीं देता’ । भीष्म ने कहा, ‘युद्ध मै नहीं कर रहा, किन्तु अपने सत्य की रक्षा हमें करनी ही है । इस प्रकार यदि तुम्हे समझाना ही है, तो परशुराम से कहो कि वह अपने हठ को छोडकर मेरी स्थिति पर ध्यान दे ’। अपने पुत्र भीष्म को परशुराम के क्रोध से उबारने के लिए, गंगा परशुराम के पास गयी, तथा उसे बहुविध समझाने का प्रयत्न किया । किन्तु परशुराम अपने हठ पर अटल रहे । परशुराम एवं भीष्म में चार दिन तक घोर युद्ध हुआ [म.उ.१७६-१८६] । अंत में अपने ‘प्रस्वाय अस्त्र’ के बल से भीष्म ने परशुराम को युद्ध में परास्त किया [म.उ.१८७.४]
शिखंडिजन्म n.  भीष्म को समूल नष्ट करने के लिए अंबा पीछे पड गयी । पहले उसने घोर तप किया, फिर परशुरम के द्वारा इसे नष्ट करना चाहा । इसे देख कर गंगा नदी ने अंबा को शाप दिया कि, वह टेडी मेडी क्षुद्र नदी बनेगी । अंबा अपने अपमान का बदला लेने के लिए जी जान से जुटी ही रही । उसने शिव की उपासना कर के उससे वरदान प्राप्त किया, ‘इस जन्म में न सही, अगले जन्म में शिखण्डी बन कर, तुम भीष्म के मृत्यु का कारण बन कर, उससे अपना बदला ले सकोगी’। शिवप्रसाद के बल से अगले जन्म एमं शिखण्डी का जन्म ले कर, अंबा ने भीष्म का वध कराया [म.उ.१७०-१९३]
विचित्रवीर्य की मृत्यु n.  सात वर्षो तक राज्यभोग के साथ-साथ अत्यधिक भोगविलास में निमग्न हुआ विचित्रवीर्य राजा राजयक्ष्मा से पीडित मृत्यु को प्राप्त हुआ । अपनी पत्नी अंबिका एवं अंबालिका से उसे कोई संतान न थी । अतएव सत्यवती ने भीष्म को आज्ञा दी कि, वह विचित्रवीर्य की पत्नियों से संभोग कर के नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न करे । किंतु इसने अपनी सौतेली माता की आज्ञा की अवहेलना कर, अपने ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा पर यह दृढ रहा । हार कर सत्यवती ने व्यास के द्वारा संतान उत्पन्न करा कर, विचित्रवीर्य के राज्य के उत्तराधिकारी के रुप में दो पुत्र प्राप्त किये ।
धृतराष्ट्र एवं पाण्डु का जन्म n.  विचित्रवीर्य पुत्रों में से प्रथम पुत्र धृतराष्ट्र जन्मान्ध था, अतएव भीष्म ने विचित्रवीर्य के उपरांत पाण्डु को राजगद्दी पर बैठाया । किन्तु पाण्डु की शीघ्र ही मृत्यु हो गयी, अतएव राज्य की सारी व्यवस्था धृतराष्ट्र ही देखने लगा । धृतराष्ट्र का व्यवहार अपने तथा पाण्डु के पुत्रों में भिन्न था, जिसका परिणाम यह हुआ कि, कौरवों एवं पाण्डु के पुत्रों (पाण्डवों) के बीच एक खाई पैदा हो गयी, जो कालांतर में चौडी ही होती गयी । अपने पिता शंतनु एवं उसके बाद विचित्रवीर्य के काल से लेकर, उसके मृत्यु तक भीष्म हस्तिनापुर राज्य के सर्वांगीण विकासपथ की ओर ले जाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहा । यह राज्य का सब से बडा कर्ताधर्ता सलाहकार एवं हर प्रकार की व्यवस्था का निर्देशक था । धृतराष्ट्र के व्यवहार में पक्षपात देखकर, द्रुपद राजा के पुरोहित ने आकर भीष्म से शिकायत की, कि धृतराष्ट्र अपने पुत्रों की ओर सजग, एवं पाण्डवों की ओर उपेक्षित व्यवहार करता है । भीष्म ने पुरोहित का योग्य स्वागत कर पाण्डवों की ओर पूरी तरह से ध्यान देने का उन्हे वचन दिया [म.उ.२१] । युधिष्ठिर द्वारा किये गये राजसूययज्ञ में पाण्डवों ने चतुर्दिशाओं में दिग्विजय प्राप्त कर यशःकीर्ति प्राप्त की । पाण्डवों के इस दिग्विजय को देखकर भीष्म ने कर्ण से कहा, ‘अर्जुन तुमसे अधिक पराक्रमी है जिसका उदाहरण सम्मुख है । पाण्डवो के ये दिग्विजय का कारण अर्जुन ही है ।’ भीष्म की इस कठोर वाणी को सुनकर कर्ण तिलमिला गया, तथा कहने लगा कि, वह अर्जुन से कहीं अधिक श्रेष्ठ है । इतना कहकर यह दिग्विजय के लिए निकल पडा [म.व.परि१. क्र.२४]
भारतीय युद्ध n.  पाण्डवों से बधुत्व भाव रखने के लिए भीष्म ने अनेक बार दुर्योधन को समझाया, किन्तु उसका कुछ भी फायदा न हुआ । आखिर बात युद्ध तक आ गयी, एवं इसे दुर्योधन की मनमानी के बीच अपनी विचार धारा की हत्या करनी पडी । इसे कौरवपक्ष के सेनापतित्व का भार भी ग्रहण करना पडा । इस भार का वहन करने के पूर्व उसने दुर्योधन से दो शर्ते रखी थी । पहली शर्त यह थी कि, ये पाण्डवो से युद्ध कर उन्हें पराजित अवश्य करेगा, किन्तु युद्ध में किसी पाण्डव की हत्त्या अपने हाथों न करेगा । दूसरी शर्त थी कि, जिस समय यह युद्ध करेगा उस समय कर्ण उसके साथ युद्ध न करेगा, उसे इसके पीछे रहने पडेगा [म.उ.१५३.२१-२४] । कौरवसेना का अधिपत्य स्वीकारते समय भीष्म ने दुर्योधन से विश्वास दिलाया, ‘मैं सेनाकर्म, व्यूहरचना, भृत एवं अभृत लोगों से कार्य चलाना, सैन्यसंचलन एवं आक्रमण कर्मो में प्रवीण हूँ । युद्धशास्त्र में मेरा ज्ञान देवगुरु बृहस्पति के समान हैं । मैं तुम्हे विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि, मैं तुम्हारा सैनापत्य का कार्य अच्छी तरह से निभाऊंगा, एवं एक महिने से पहले पांडवसेना को ध्वस्त कर दूंगा’ [म.उ.१९४]
कौरव एवं पांडव सेना का बलाबल---भारतीय युद्ध आरम्भ होने के पूर्व सेनापति भीष्म ने कौरव एवं पांडवों के चतुरंगिणी सेना की विस्तृत जानकारी एवं बलाबल दुर्योधन को बताया था [म.उ.१६४] । महाभारत के ‘रहसंख्यान’ पर्व [म.उ.१६१-१६९] में प्राप्त इस जानकारी से प्रतीत होता है कि, जिस प्रकार पदाति-दल, अश्वदल आदि में सैनिकों की विभिन्न श्रेणियॉं थी, उसे प्रकार कुशलता की मात्रा से रथसेना में भी अनेक पद थे ।
भीष्म के द्वारा बतायी गयी श्रेणियॉं इस प्रकार थीः---रथयूथपयूथप, महारथ, अतिरथ, अर्धरथ एवं रथोदार । उनमें से रथयूथपयूथप सबसे बडा पद था, एवं रथीदार सबसे छोटा पद था ।
भीष्म के द्वारा निर्देश किये गये कौरवसेना के विभिन्न रथयोद्धा निम्न प्रकार थेः---
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कौरवपक्ष पांडवपक्ष
(१) अतिरथ भीष्म,
कृतवर्मन,
भोज,
बाह्रीक,
शल्य ।
(१) अतिरथ धृष्टद्युम्न (सेनापति),
कुंतिभोज पुरुजित,
वसुदान,
श्रेणिमत्,
सत्यजित (द्रुपदपुत्र) ।
(२) अर्धरथ कर्ण । (२) अर्धंरथ क्षत्रधर्मन् (धृष्टद्युम्नपुत्र) ।
(३) एकरथ शकुनि,
सुदक्षिण कांबोज,
दंडधार ।
(४) महारथ अश्वत्थामन्, जो रथ योद्धाओं में अतुल्य माना जाता था,
और पौरव ।
(३) महारथ अज,
अमितौजस् चेकितान,
जयन्त,
द्रुपद,
द्रौपदेय,
धृष्टकेतृ (शिशुपालसुत),
भोज,
रोचमान,
विराट,
शंख,
श्वेत,
सत्यजित्,
सत्यधृति ।
(५) रथ अचल,
वृषक गांधार ।
(४) रथ अर्जुन,
उत्तमौजस्,
उत्तर वैराटि,
काश्य (अष्टरथ),
भीन (अष्टरथ),
वार्धक्षेमि ।
(५) रथमुख्य शिखंडिन्।
(६) रथयूथपयूथप उग्रायुध,
कृप शारद्वत,
द्रोण,
भूरिश्रवस।
(६) रथयूथपयूथप अभिमन्यु,
घटोत्कच,
माधव, सात्त्यकि ।
(७) रथवर जलसंध मागध ।    
(८) रथसत्तम बृहद्वल कौसल्य,
वृषसेन,
दुर्योधनपुत्र लक्ष्मण,
विंद,
अनुविंद,
शल्य,
जयद्रथ,
अलायुध ।
(७) रथसत्तम क्रोधहन्तृ,
चित्रायुध,
सेनाबिन्दु ।
    (८) रथिन् नकुल, सहदेव ।
    (९) रथोत्तम क्षत्रदेव, पांडयराज ।
(९) रथोदार दुर्योधन,
सुशर्मन,एवं उसके चार भाई ।
(१०) रथोदार काशिक,
केकयबन्धु (पंचक),
चंद्रसेन,
नील,
वमदिराश्व,
युधामन्यु,
युधिष्ठिर,
व्याघ्रदत्त,
शंख,
सुकुमार,
सूर्यदत्त ।

कर्ण-भीष्म विरोध n.  भीष्म के द्वारा किये गये उपर्युक्त रथि महारथियों के वर्णन में कर्ण को रथी अथवा महारथी न कहकर केवल अर्धरथों में उसकी गणना की । द्रोणाचार्य ने भी उसे अपनी संमति दी । यह अपना अपमान समझकर कर्ण क्रोध से उछल पडा । उसने दुर्योधन से कहा, ‘बुढापे के कारण, भीष्म मतिभ्रष्ठ हो चुका है । ऐसे मतिभ्रष्ट लोगों की सलाह लेना मुझे सरासर मूर्खता प्रतीत होती है । दुष्टबुद्धि भीष्म कौरवों में फूट पाडना चाहता है । मेरी राय यही है कि, इस मतिभ्रष्ट एवं दुष्टबुद्धि बूढे का पल्ला तुम छोड दो । जबतक यह भीष्म कौरवसेना का सेनापति है तबतक मैं युद्ध में भाग नहीं लूँगा’ [म.उ.१६५.१०-२७] । इस पर भीष्म ने भी अत्यंत क्रुद्ध हो कर दुर्योधन से कहा, ‘कवचकुंडल आदि के त्याग से निर्बल, एवं परशुराम तथा ब्राह्मणों के शाप से इंद्रियदुर्बल हुए पापी कर्ण के लिए, अर्धरथ यह नीच श्रेणी ही योग है’। आगे चल कर इसने कर्ण से कहा, ‘मुझे बूढा कहने की हिंमत तू ने की है । किन्तु मै चूनौति देता हूँ कि, युद्ध में तुम्हारा पराजय करने की ताकद आज भी मेरे जर्जर बाहुओं में है। परशुराम जामदग्न्य आदि यों को मैने रणभूमि में पराजित किया है । फिर तेरे जैसे पापी मनुष्य का पराजय करना मेरे बाये हात का खेल है’। अपने गुरु भीष्म एवं परममित्र कर्ण के दरम्यान हुए इस वाक्युद्ध के कारण, दुर्योधन अत्यधिक कष्टी हुआ, एवं उसने इन दोनों को शान्त होने के लिए प्रार्थना की [म.उ.१६६.१-१०]
सेनापत्य n.  भारतीय युद्ध में प्रथम दस दिन यह कौरव सेना का सेनापति रहा । इसके रथ की पताका पर ताडवृक्ष का चिह्र था [म.वि.१४८.५] । इन दस दिनों में अत्यधिक वीरता के साथ लडकर, एवं सैन्यसंचालन कर, इसने पांडवों की सेना को ध्वस्त कर जर्जर ही नहीं बनाया; बल्कि उनकी जीत की आशा को भी मिट्टी में मिला दिया । इसकी युद्धवीरता का प्रमाण इससे अधिक क्या हो सकता है कि, युद्धभूमि में कभी अस्त्रग्रहण न करने की प्रतिज्ञा करनेवाले भगवान कृष्ण को भी अस्त्रग्रहण करना पडा । भारतीय युद्ध के तीसरे एवं नवें दिन अर्जुन की रक्षा के लिए कृष्ण को हाथ में सुदर्शन चक्र ले कर युद्धभूमि में उतरना पडा [म.भी.५५, १०२] । भारतीययुद्ध के तीसरे दिन इसका तथा अर्जुन का घनघोर युद्ध हुआ, जिसमें अर्जुन आहत हो कर मूर्च्छित हो गया । यह देख कर कृष्ण अत्यधिक क्रुद्ध हुआ, एवं अर्जुन की रक्षा के लिए हाथ में सुदर्शन चक्र ले कर स्वयं युद्धभूमि में प्रविष्ट हुआ । कृष्ण का यह रौद्ररुप देख कर भीष्म ने अपने अस्त्र-शत्र नीचे रख दिये, एवं श्रद्धावनत हो कर कृष्ण से कहा, ‘स्वयं कृष्ण भगवान् से मेरी हत्या हो रही है, यह मेरा सौभाग्य है’ । ऐसा कह कर इसने कृष्ण का स्तवन किया । इतने में अर्जुन ने होश में आकर कृष्ण से प्रार्थना की, ‘युद्धभूमि में आप न उतरे, अभी मैं युद्ध के लिए काफी हूँ’।
दुर्योधन आक्षेप n.  भारतीययुद्ध के दसवें दिन, दुर्योधन ने भीष्म पर आक्षेप लगाते हुए कहा, ‘आप का मन तो पाण्डवों के पक्ष की ओर है । अतएव युद्ध में हमारी जीत संभव कहॉं?’ भीष्म ने चिन्तित हो कर गंभीरतापूर्वक कहा, ‘मैं बूढा हूँ, फिर भी जो होता है करता हूँ, तथा किसी प्रकार कर्तव्य से च्युत नहीं । पाण्डव बल पौरुष में श्रेष्ठ तथा रणभूमि में अजेय हैं । फिर यदि तुम मेरे रणकौशल को ही देखना चाहते हो तो कल देख सकते हो । देखना, या तो कल पाण्डवों की हार होगी, या मेरी मृत्यु [म.भी.१०५.२६] । पाण्डवविहीन पृथ्वी को बनाने की भीष्मप्रतिज्ञा को सुन कर सभी पाण्डव भयभीत हो उठे । क्यों कि, वे समस्त कौरवसेना में भीष्म की ही शक्ति का सिक्का मानते थे । कृष्ण ने पाण्डवों के बचाने के लिए अर्जुनादि के सामने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा, ‘तुम लोग यदि अपना जीवन चाहते हो, तो भीष्म की मृत्यु का उपाय करो, अन्यथा तुम को पराजित हो कर, अपने प्राणों की आहुति देनी पडेगी’।
कृष्ण सें भेंट n.  नवें दिन की रात्रि को कृष धर्मादि पाण्डवों को साथ ले कर भीष्म से मिलने उसके शिबिर गया । कृष्ण ने भीष्म से कहा, ‘आपकी प्रतिज्ञा सुन कर सभी पाण्डव आतंकित हो उठे हैं । अब आपकी मृत्यु किस प्रकार सम्भव हो कि, जिससे पाण्डव की रक्षा की जा सके?।’ भीष्म ने कृष्ण के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा, ‘जिसके रथ का ध्वज अभद्र हो, जो हीन जाति का हो, अथवा जो स्त्री हो उससे मैं युद्ध कदापि न करुँगा।’ द्रुपद राजा का पुत्र शिखण्डी पूर्वकाल में स्त्री था, बाद में पुरुष बना । अतएव उसे सामने कर के, यदि अर्जुन युद्ध करेगा, तो मै कुछ न कर सकूँगा, तथा मुझे अर्जुन सहज ही युद्ध में जीत सकेगा । इस प्रकार पाण्डव सुलभता के साथ रणभूमि में कौरव को जीतकर राज्य प्राप्त कर सकते हैं [म.भी.१०३] । दूसरे दिन भीष्म के बताये हुए मार्ग को अपना कर शिखण्डी को सामने रखकर अर्जुन ने भीष्म को पराजित किया [म.भी.११३-११४] । भीष्म पतन काय यह दिन पौष के कृष्णपक्ष की सप्तमी थी, एवं उस समय फल्गुनी नक्षत्र था (भारतसावित्री) ।
शरशय्या n.  इसके वध के समय सर्वांग बाणों से बिद्ध था । रथ से गिरकर बाणों पर ही टिका हुआ भूमि पर यह इस प्रकर आ गिरा, मानों शरशय्या में लेटा हो । इसका सर केवल बाणों से बचा था, जो शरशय्या से लटक रहा था । उसे देखकर अर्जुन ने तीन बाणों को मार कर, इसके सर के लिए तकिया बना दिया । शरशय्या में पडा हुआ यह अधिक प्यासा हो उठा था, जिसे देखकर अर्जुन ने अपने एक बाण द्वारा गंगा नदी के प्रवाह को अपनी ओर खींचकर, उस धारा के द्वारा भीष्म की तृषा का हरण किया । अर्जुन की इस सेवा से भीष्म अत्यधिक प्रसन्न हुआ [म.भी.११५] । जिस समय भीष्म पितामह शरशय्या में आहत था, उस समय अनेकानेक ऋषि, मुनि, देवी देवतादि इसके दर्शन करने आये थे । इन सारे ऋषिंमुनियों को एवं अपने कौरवपांडव बांधवो को इसने नानाविध रुप से उपदेश दिया । इसने दुर्योधन से कहा, ‘मेरी मृत्यु कौरव पाण्डवों के बीच हुए वैरभाव की अन्तिम आहुति हो, तो अच्छा है । इससे तुम सभी विनष्ट होने से बच जाओगे’। यह आजीवन कर्ण को हेय दृष्टि से देखता रहा, कारण कि वह जन्म से हीन था । कर्ण भी हृदय से इसका आदर नहीं करता था । किन्तु अन्तिम समय, जब कर्ण इससे मिलने आया, तब सारे भेदभावों को भूल कर इसने उसका दृढ आलिंगन करते हुए सदुपदेश दिया, ‘या तो तुम कौरव पाण्डवों के बीच मित्रता स्थापित कराओ, अथवा कौरवों के पक्ष को छोडकर पाण्डवों के पक्ष में सम्भिलित हो जाओ’। दुर्योधन को तनमनधन से मित्रता का व्रत लेने वाले कर्ण ने भीष्म से कहा, ‘दुर्योधन मेरा मित्र है, अतः आप मुझे यह अनुज्ञा दें कि, उसी के पक्ष में लडता हुआ मैं पाण्डवों का पराभव करुँ’ । भीष्म ने उसके व्रत को सुनकर उसे अनुज्ञा प्रदान की [म.भी.११६-११७] । भारतीय युद्ध में अपने कुरुवंशी बन्धुओं का क्षय देख कर युधिष्ठिर अत्यधिक शोकमग्न हुआ था । उसे इस प्रकार उदास देखकर, अपने धर्मोपदेश के द्वारा भीष्म ने उसे शान्ति प्रदान की । युधिष्ठिर को धर्मोपदेश देते समय भीष्म इतना शक्तिहीन हो चला था कि, कृष्ण ने उसे शक्ति प्रदान कर, उपदेश देने के योग्य बनाया [म.शां.५२];[ भा.१.९,९.२२.१९] । पितामह भीष्म एवं युधिष्ठिर के बीच हुयी ज्ञानचर्चा महाभारत के ‘शान्ति’ एवं ‘अनुशासन’ पर्व में प्राप्त है, जो जो आज भी अपनी अपार ज्ञानराशि के कारण, जीवन के परम सत्य की ओर पथनिर्देश कराने में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है ।
प्राणत्याग n.  अर्जुन के द्वारा आहत होकर जब यह शरशय्या पर पडा हुआ था, उस समय सूर्य दक्षिणायन था । अतएव इच्छाबल पर इसने अपने प्राणों को रोक रखा था । जैसे ही सूर्य उत्तरायण आया, इसने अपने प्राण विसर्जित किये [म.अनु.१६८.७] । यह दिन माघ सुदी अष्टमी थी [निर्णयसिंधु पृ.१६३] । जिस समय यह अपने प्राणों को त्याग कर निजधाम जाने की तैयारी में था, उस समय अनेकानेक शत्रुमित्र पक्ष के लोगों के अतिरिक्त, न जाने कितने ऋषिमुनि आदि इसके दर्शन कर, उपदेश ग्रहण करने की लालसा से आये थे । इसकी मृत्यु विनशन क्षेत्र में हुयी [भा.१.९.१] । मृत्यु के समय इसकी आयु सम्भवतः १८६ वर्षो की थी । यह उम्र में करीब अपनी सौतेली मॉं सत्यवती का समवयस्क था, तथा सत्यवती का पुत्र व्यास, जो उसे कौमार्य अवस्था में हुआ था, वह तो इससे कहीं अधिक छोटा था ।
भीष्मचरित्र का एक कलंकित क्षण n.  भीष्म कौरववंश का वह प्रकाशस्तम्भ था, जिसने आजीवन लोगों को अपने चरित्र, कार्य, एवं रीतिनीति से आलोकित कर, उसे सन्मार्ग दिखाया । फिर भी इसके जीवन में एक अवसर यह भी आता है कि, कौरव पाण्डवों की भरी सभा में निर्वस्त्र की जानेवाली द्रौपदी विलाप कर के भीष्म से न्याय की मॉंग करती है, तथा भीष्म उसकी दीनहीन दशा न देखकर, उसे पत्नीधर्म का पाठ पढाते हैं । द्यूत खेलते समय धर्म ने अपने को, समस्त पाण्डवों को तथा अन्त में द्रौपदी को भी हार लिया । कौरव द्रौपदी की लोकलज्जा का हरण कर, उसका उपहास करने लगे, तथा सभी बडे बूढों के साथ भीष्म भी चूपचाप बैठ गया । द्रौपदी ने इसी से न्याय की मॉंग की, क्यों कि, यह पाण्डवों तथा कौरव दोनों का हितैषी था, यहा नहीं, यह परम धर्मात्मा, न्यायी एवं उचित अनुचित का समझने वाला, सभी से उम्र में बडा, तथा कौरववंश का कर्ताधर्ता प्रमुख व्यक्ति था । द्रौपदी ने इससे प्रश्न किया, ‘धर्मराज जब कौरवों द्वारा स्वयं अपने को हार गये हैं, तब क्या उन्हें अधिकार है कि, मुझे वह दॉंव पर लगायें’? भीष्म ने उत्तर दिया, ‘वस्तुतः अधिकार तो नहीं, क्योकि तुम्हें दॉंव पर लगाना अनुचित है । अतएव तुम्हें कोई जीत नहीं सकता । लेकिन तुम्हें भूलना चाहिए कि, स्त्री सदैव पति के आधीन रही है, तथा उसे अपनी पत्नी पर सदैव अधिकार रहा है । आज तुम्हारा पति युधिष्थिर कौरवों का दास है, अतएव आर्यपत्नी होने के कारण, तुम दास की दासी हो [म.स.६०.४०-४२] । भीष्म के द्वारा दिये गये इस उपदेश ने द्रौपदी के हृदय को सन्तोष एवं शान्ति तो प्रदान न किया, किन्तु उसके मन को अधिक उद्विग्न बना दिया । द्रौपदी चाहती थी कि, भीष्म उस आरर्नाद करने वाली कुलवधू की लुटती हुयी लज्जा को देखकर, दुर्योधन के द्वारा दिये गये आदेशों का खण्डन करते हुए उसकी नारीत्व की रक्षा करेगा । किन्तु भीष्म तो पति की आज्ञाओं का अन्धा पालन करने पर प्रवचन दे कर ही, अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ बैठे [म.वि.परि.१.६०.२५-४५]
कुछ धूमिल स्थल n.  भीष्म के चरित्र में यदाकदा कुछ धूमिल शूल और दीख पडते हैं । कौरवों ने द्यूत में पाण्डवों को बुलाकर कपटापूर्ण व्यवहार के द्वारा उन्हें जीतने की योजना बनाई, जिसकी पूर्ण सूचना इसे प्राप्त थी । फिर भी इसने एक बार भी दुर्योधनादि को रोकने का प्रयत्न न किया । दुर्योधन को एक बार नहीं, हजार बार इसने कहा की, उसका पक्ष न्याय का नहीं, वह अन्यायी है । फिर भी भारतीय युद्ध के समय, इसने अपने आदर्शो के विरुद्ध दुर्योधन को अपना राजा मानकर, पग पग पर उसका साथ दिया । दूसरी ओर युद्धनीति के विरुद्ध, इसने अपने मरने का रहस्य कृष्ण एवं युधिष्ठिर को बताया, जो इसके विपक्षी थे । महाभारत के कई पाण्डुलिपियों में प्राप्त श्लोकों से पता चलता ह्गैं कि, इन कमजोरियों को दृष्टि में रखकर कृष्ण ने भी इसकी कटु आलोचना की थी ।
‘अर्थस्य पुरुषो दासः’: n.  कौरवों का पक्ष अन्यायी हो कर भी इसने उनका साथ क्यों दिया, इसका स्पष्टीकरण भीष्म ने महाभारत में निम्न प्रकार किया है. ‘अर्थस्य पुरुषो दास:’ दासस्त्वर्थो न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज, बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः॥ (पुरुष अर्थ का दास है, पर अर्थ किसी का दास नही है । हे महाराज, यह सत्य है, कौरवों ने मुझे अर्थ से बॉंध लिया हैं) । उपर्युक्त भीष्म के कथन से साधारण रुप में यही अर्थ निकलता है कि, यह अर्थ (धन, संपत्ति) को प्रधानता देता है । यदि हम इसे इस प्रकार ले, तो भीष्म के ये शब्द इसके आदर्शात्मक जीवन का धब्बा प्रतीत होता है जो उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ढक देता है । किन्तु कई अभ्यासकों के अनुसार, ‘अर्थस्य पुरुषो दासः’ शब्दों से भीष्म के द्वारा प्रकट की गयी विवशता सिर्फ संपत्ति के विषय में न हो कर अधिक तर राजनैतिक ढंग की थी । ‘कौटिलीय अर्थशास्त्र’ में अर्थ की व्याख्या ‘राजनैतिक कर्तव्य’ इस अर्थ से की गयी हैं । इस प्रकार, राजनैतिक कर्तव्यों से बँधा हुआ भीष्म यदि अपने व्रत के अनुसार, आजीवन कौरव पक्ष के दुःखसुखों में सदैव एक क्रियाशील कर्ताधर्ता रहा तो, इसमें कुछ भी अनौचित्य प्रतीत नही होगा । भीष्म की तरह द्रोण, कृप एवं शल्य आदि ने भी ‘अर्थेन बद्ध;’ कह कर दुर्योधन के पक्ष का स्वीकार किया था । उन में से द्रोण दक्षिणपांचाल देश का राजा था, एवं शल्य युधिष्ठिर का मातुल एवं मद्र का राजा था । इन सारें राजा महाराजाओं के ‘अर्थेन बद्ध;’ कथन से यही तात्पर्य प्रतीत होता है कि, वे सारे दुर्योधन से वचनबद्ध थे, एवं उसी के कारण, दुर्योधन के पक्ष में शामिल हो गये थे [म.भी.४१.३६-३७, ५१-५२, ६६-६७, ७७-७८]
अन्य धूमिल स्थल n.  आधुनिक दृष्टि से हम देखे तो हमें कुछ उचित नहीं लगता कि, अप्ने पिता की भोगपिपासा की तृप्ति के लिए भीष्म इतना बडा ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर आगे बढे । उस व्रत के कारण, आगे आनेवाली कर्तव्य शृंखालाओं को भी इसे बार बार उपेक्षा करनी पडी । लेकिन यह लकीर का फकीर बना, एवं अपनी पुरानी प्रतिज्ञा पर जमा रहा । इसने आजन्म ब्रह्मचर्य का व्रत न लिया होता, तो कुरुवंश दो भागों में विभक्त होकर, आपस में टकरा कर खत्म न हो जाता । चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य ऐसी सन्ताने न होती, जो अल्पायु में ही मर गयी । पांडु तथा धृतराष्ट्र ऐसे पुत्र न होते कि, एक क्षय से मरा, तो दूसरा जन्माध पैदा हुआ । इसका कारण था कि यह सभी नियोग द्वारा जन्मे थे किसी में तेज, बल तथा शक्ति न थी जिस भीष्म में वह थी, वह कर्मपथ से हठ कर निष्क्रिय धर्मपथ अपना बैठा था ।
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