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बाण

A Sanskrit English Dictionary | sa  en |   | 
बाण  m. m. or वाण॑ ([RV.] ), बा॑ण ([AV.] ; later more usually वाणq.v.) a reed-shaft, shaft made of a reed, an arrow, [RV.] &c. &c.
पञ्च-ब्°   N. of the number five (from the 5 arrows of काम-देव; cf.), [Sūryas.] ; [Sāh.]
the versed sine of an arc, [Gaṇit.]
a mark for arrows, aim, [BhP.]
a partic. part of an arrow, [L.]
Saccharum Sara or a similar species of reed, [Bhpr.]
वाण   the udder of a cow (, [RV. iv, 24, 9] ), [L.]
वाण   music (for ), [AV. x, 2, 17] = केवल,
N. of an असुर (a, son of बलि, an enemy of विष्णु and favourite of शिव), [MBh.] ; [Pur.]
of one of स्कन्द's attendants, [MBh.]
of a king, [Hariv.]
-भट्ट   (also ) of a poet (the author of the कादम्बरी, of the हर्ष-चरित, and perhaps of the रत्नावली), [Cat.]
See also: भट्ट
of a man of low origin, [Rājat.]
बाण  f. m. ([Śiś.] ) or () f. ([L.] ) a blue-flowering Barleria
बाण  n. n. the flower of Barleria, [Kir.] ; [Śiś.]
the body, [PraśnUp.]

बाणः [bāṇḥ]   1 An arrow, shaft, reed; [Bṛi. Up.3.8.2;] धनुष्यमोघं समधत्त बाणम् [Ku.3.66.]
An aim or mark for arrows.
The feathered end of an arrow.
The udder of a cow.
The body (शरीर); ते प्रकाश्श्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः [Praśna Up.2.2.]
 N. N. of a demon, son of Bali; cf. उषा.
 N. N. of a celebrated poet who lived at the court of king Harṣavardhana and flourished in the first half of the seventh century; see App. II). He is the author of कादम्बरी, हर्षचरित and of some other works; (Govardhana in his [Āryāsaptaśatī 37] speaks in these terms of Bāṇa: जाता शिखण्डिनी प्राग् यथा शिखण्डी तथावगच्छामि । प्रागल्भ्यधिकमाप्तुं वाणी बाणो बभूवेति ॥; so हृदयवसतिः पञ्चबाणस्तु बाणः [P. R.1.22] ).
A symbolical expression for the number 'five'.
A sound voice.
Fire.
Lightning.
A form of Śiva.
The versed sine of an arc.
-णः, -णा   The hinder part or feathered end of an arrow.
-णः, -णा, -णम्   a blue flowering Barleria
-नीलझिण्टी   (Mar. कोऱ्हांटी); अनाविलोन्मीलितबाणचक्षुषः [Ki.4.] 28. [Śi.6.46.] -Comp.
-असनम्   a bow; स पार्थबाणासन- वेगमुक्तैर्दृढाहतः पत्रिभिरुग्रवेगैः [Mb.8.89.86.] ˚यन्त्रम् a kind of bow with a mechanical contrivance at one of its ends for tightening the string and letting off the arrow; [Dk.1.1.]
-आवलिः, -ली  f. f.
a series of arrows.
a series of five verses forming one sentence.
-आश्रयः   a quiver.
-गङ्गा  N. N. of a river said to have been produced by Rāvaṇa's arrow; सोमेशाद् दक्षिणे भागे बाणेनाभि- बिभिद्य वै । रावणेन प्रकटिता जलधारातिपुण्यदा । बाणगङ्गेति विख्याता या स्नानादघहारिणी ॥ [Varāha P.]
-गोचरः   the range of an arrow; अवतीर्णोऽसि रतिरमणबाणगोचरम् [Māl.1.19] /2.-जालम् a number of arrows.
-जित्  m. m. an epithet of Viṣṇu.
-तूणः, -धिः   a quiver; क्षीणबाणो विबाणधिः [Mb. 8.63;] बबन्धाथ च बाणधी (du.) [Bk.14.17;] [Ki.18.1.] -निकृत a. pierced or wounded by an arrow.
-पत्रः  N. N. of a bird (कङ्क).
-पथः   the range of an arrow.-पाणि a. armed with arrows.
पातः an arrowshot (as a measure of distance).
the range of an arrow.
a bed of arrows (बाणशय्या, शरतल्प); बाणपातान्तरे रामं पातितं पुरुषर्षभम् [Rām.6.45.25.] ˚वर्तिन् a. being within the range of an arrow.
-पुरम्   Śoṇitapura, the capital of Bāṇāsura.
-मुक्ति  f. f.,
-मोक्षणम्   discharging or shooting an arrow.
-रेखा   a long wound made by an arrow.
-लिङ्गम्   a white stone found in the river नर्मदा and worshipped as the लिङ्ग of Śiva.
-वारः   a breast-plate, an armour, cuirass; cf. वारबाणः.
-वृष्टिः  f. f. a shower of arrows.
-संधानम्   the fitting of an arrow to the bow-string; का कथा बाणसंधाने ज्याशब्देनैव दूरतः [Ś.3.1.]
-सिद्धिः  f. f. the hitting of a mark by an arrow.
-सुता   an epithet of Uṣā, daughter of Bāṇa; see उषा.

Shabda-Sagara | sa  en |   | 
बाण  m.  (-णः)
1. An arrow, a shaft.
2. An aim.
3. The udder of a cow. 4. The feathered end of an arrow.
5. A kind of creeper, (Blue Barleria.)
6. A name of a demon, son of Virochan.
7. The name of the celebrated poet, the author of Kādambari and Harsha- charita, &c.
8. The number five.
E. बण् or वण् to sound, aff. घञ् .

ना.  तीर , शर , सायक .

A dictionary, Marathi and English | mr  en |   | 
A term for a man without wife, or family, or home, or friends, or money. 5 Gunwale of a boat. 6 As intended in the following ex. असो बाणसंख्या दिवसांत ॥ सुवेले पर्यंत जाहाला सत ॥. An arrow of कामदेव the god of love. His quiver is charged with five, viz. अरविंद, अशोक, च्यूत, नव- मल्लिका or मोगरा, नीलोत्पल. 7 Distance from the ecliptic or celestial latitude.
That has quitted or is without house, family, and worldly concerns. Compare Sig. IV. of बाण the noun.
Gunwale.

 पु. 
धनुष्यानें मारण्याचा तीर ; शर ; सायक ; विशिख . ( क्रि० मारणें ).
अग्निनलिका ; लोखंडी , कागदी किंवा कळकाच्या नळींत दारु भरुन तिला काठी बांधून तयार केलेलें आयुध ; कळकी बाण ; आतषबाजीचा एक प्रकार .
शिवलिंग . हें नर्मदा नदींत सांपडतें . याची शिव समजून पूजा करतात .
घरदार , कुटुंब , इष्टमित्र किंवा धन वगैरे कांहीं नसलेला मनुष्य . सडाफटिंग ; सडेसोट .
गलबताची वरची कड ; बहाणी ; बहाण . - स्त्री . ( गो . ) होडीचा कांठ .
पांच संख्या ( मदनाचे अरविंद , अशोक , च्यूत , नवमल्लिका किंवा मोगरा व नीलोत्पल हे पांच बाण आहेत त्यावरुन ). असो बाणसंख्या दिवसांत ।
क्रांतिवृत्तापासून अंतर .
( गो . ) पंचा , धोतर यांचा रंगीत कांठ .
( ल . ) सूर्याचे किरण प्रत्येक . उगवला दिनराज बाण आले चौबारा । - ब ६०५ .
( ल . ) महत्त्वाचा मुद्दा . ( क्रि० गमाविणें ; हातचा गमावणें ). भलता प्रसंग आल्यास हा बाण त्यानें शिल्लक ठेविला होता . - इंप १७८ - वि . सडेसोट ; घरदार सोडलेला ; निर्बाण ( माणूस ). [ सं . ]
०दार   बाणाईत - पु . ( दोन्हीं प्रकारचें ) बाण बाळगणारा ; बाण फेंकणारा शिपाई ; तिरंदाज .
०पंचक  न. वर सांगितलेले मदनाचे पांच बाण . [ बाण + पंचक ] बाणाकार वि . बाणाच्या आकाराचा ; बाणाच्या गतीच्या आकाराचा ; समकलछिन्नाकार ; समकक्षछिन्नाकार . [ सं . बाण + आकार ] बाणाटी स्त्री . बाण .

बाण n.  एक दानव, जो कश्यप एवं दनु के पुत्रों में से एक था ।
बाण II. n.  एक सुविख्यात असुर, जो अस्रु राजा बलि वैरोचन का पुत्र था । शिव का पार्षद होने के कारण, इसे महाकाल नामान्तर भी प्राप्त था [म.आ.५९.२०-२१] । पद्म में इसे ‘भूतों’ का राजा कहा गया है [पद्म.२५.११] । यह सहस्त्रबाहु होने के कारण, अत्यधिक पराक्रमी एवं युद्ध में अजेय था । बलिपत्नी अशना से उत्पन्न हुए शतपुत्रों में यह ज्येष्ठ था । मत्स्य में इसकी माता का नाम विंध्यावलि दिया गया है [मत्स्य.१८७.४०] । इसकी राजधानी दैत्यों के सुविख्यात त्रिपुरों में से शोणितपुर में थी । कई ग्रंथों मे, उस नगरी का निर्देश ‘लोहितपुर’ नाम से भी किया गया है । हरिवंश में बाणकी जीवनकथा विस्तृत रुप में दी गयी है [ह.वं.२.११६-१२८] । दैत्यों की ये त्रिपुर नगरियों आकाश में सदैव संचरण किया करती थीं । ये निर्भेद्य थी, जिन्हें कोई जीत न सकता था । इसके रहस्य का कारण थीं दैत्य स्त्रियॉं, जिनके पतिसेवा के प्रभाव से ये नगरियॉं पृथ्वी पर न आतीं थी तथा आकाश में ही तैरती थी । दैत्य लोग इन नगरियों में रहते तथा देवों एवं ऋषियों के आश्रमों में जाकर उत्पात मचाते । इससे अब कर देव ऋषि आदि भगवान् शंकर के पास गये, तथा अपने कष्टो का निवेदन कर उबारने के लिए प्रार्थना की । शंकर भगवान ने भक्तों की मर्मांतक वाणी को सुनकर नारद को स्मरण किया । याद करते ही, स्मरणगामी नारद तत्काल प्रकट हुए । शंकर ने देवर्षि नारद से निवेदन किया कि, वह राक्षसों की नगरियों में जाकर वहॉं की पत्नियों का ध्यान पतिसेवा से हटाकर दूसरी ओर लगा दें, जिससे ये नगर पृथ्वी पर आ सकें, तथा इन अजेय राक्षसों का नाश हो सके । शंकर के वचनों को स्वीकार कर, नारद वहॉं गया, तथा वहॉं की स्त्रियों को विभिन्न प्रकार के अन्य धार्मिक पूजा-पाठों की ओर उनका ध्यान आकर्षित कर पतिसेवा व्रत से हटा दिया । जिसके कारण, नगरों की शक्ति कम होने लगी । ऐसी स्थिति देखकर, शंकर ने तीन नोकों वाले बाण से तीनों नगरों को वेध दिया । शंकर ने अग्नि को भी आज्ञा दी कि, ये त्रिपुर नगरियों को जला दे जाय । अग्नि ने आज्ञा पाते हे उन्हें भस्मीभूत करना शुरु किया ।
बाण II. n.  नगरों को जलता देख कर, बाण अपनी नगरी से अपने उपास्यदेव का शिवलिंग साथ ले कर बाहर निकला । यह शिवभक्त था, अतएव अपने को कष्ट में पाकर इसने ‘तोटक छन्द’ के द्वारा, शंकर की पूजा कर के उसे प्रसन्न किया । प्रसन्न हो कर शंकर ने इसकी शोणितपुर नगरी बचा दी, तथा अन्य दो को जलने दिया । वे दोनों जलकर क्रमशः ‘शैल’ तथा ‘अमरकंटक’ पर्वत पर गिरी । इसी कारण उन दो स्थानों पर दो तीर्थ बन गये [मत्स्य. १८७-१८८] ;[पद्म. स्व. १४-१५] । एक बार खेल में निमग्न शिवपुत्र कार्तिकेय को देख कर यह प्रसन्नता से विभोर हो उठा । तथा इसके मन में यह इच्छा जागृत हुयी कि मैं शंकर-पुत्र बनूँ । यह सोच कर इसने कडी तपस्या की, जिससे प्रसन्न हो कर शंकर ने इसे वर मॉंगने के लिए कहा । इसने शंकर से प्रार्थना की, ‘मेरी उत्कट अभिलाषा है कि, कार्तिकेय की भॉंति माता पार्वती मुझे पुत्र के रुप में ग्रहण करे’। शंकर ने वरप्रदान करते हुए, कार्तिकेय के जन्मस्थान का नित्य के लिए इसे अधिपति बनाया [ह.वं.२.११६.२२] । कार्तिकेय ने प्रसन्न हो कर इसे अपना तेजस्वी ध्वज एवं मयूर वाहन प्रदान किया । शिवपुत्र द्वारा दिये गये ध्वज में मयूर की छाप थी, जिसका सर मयूर का न हो कर मनुष्य का था [ह.वं.१.११६.२२] ;[शिव. रुद्र. यु.५३] । शंकर द्वारा प्राप्त वरों का निर्देश शिव पुराण में भी प्राप्त है, लेकिन उसमें कुछ भिन्नता हैं । शिवपुराण में लिखा है कि, इसने भगवान शंकर के साथ ताण्डव में भाग लेकर अत्यधिक सुन्दर नृत्य किया था, जिससे प्रसन्न हो कर इसे ये वर प्राप्त हुए थे । इसके सिवाय इसने शंकर से यह भी वर मॉंगा कि, वह भविष्य में उसके परिवार का रक्षण करता हुआ इसे चिरन्तन आनंद प्रदान करता रहेगा । शंकर ने इसे यह वरदन दे कर, वह स्वयं अपने पुत्र कार्तिकेय एवं गणेश के साथ इसकी रक्षार्थ इसके नगर में रहने लगा [शिव.रुद्र.यु.५१] । भागवत के अनुसार, तांडवनृत्य के समय इसने शिव के साथ वाद्यवादन किया था, जिससे प्रसन्न हो कर उसने इसे उक्त वरप्रदान किये थे [शिव. रुद्र. यु.५१] । भागवत के अनुसार, तांडवनृत्य के समय इसने शिव के साथ वाद्यवादन किया था, जिससे प्रसन्न हो कर उसने इसे उक्त वरप्रदान किये थे [भा.१०.६२] । बाण ने शंकर द्वारा प्राप्त किये हुए इन वरों के बल पर, अनेकानेक बार इन्द्रादि देवों को जीत कर, जब जैसा चाहा किया । किसी में इतनी शक्ति न थी, जो इसके तेज के सामने ठहर सके । एक बार महाबली बाण ने शंकर से कहा, ‘मेरी अनंत शक्ति मेरे अंदर लडने के लिए मुझे मजबूर कर रही है; पर कोई भी मेरी टक्कर का नजर नहीं आ रहा । हजा बाहुओं को तृप्ति करने के लिए मैं दिग्गजों से भी लडने गया, पर वे भी मेरी शक्ति के सामने ठहर न सके । अब मै युद्ध करना चाहता हूँ । मुझे उसमें ही शान्ति है । यह युद्ध कब होगा?’ उत्तर देते हुए शंकर ने कहा ‘जिस दिन कार्तिकेय द्वारा दिया गया ध्वज ध्वस्त होगा, उसी के बाद तुम्हरी यह इच्छा पूर्ण होगी । तुम्हे युद्ध का अवसर प्राप्त होगा’। पश्चात इसके ध्वज पर इन्द्र का वज्र गिरा, तथा वह ध्वस्त हो गया ।
बाण II. n.  इसके उषा नामक एक कन्या थी, जो अत्यधिक नियंत्रण में रख्खी जाती थी । एक बार एक पहरेदार द्वारा इसे यह सूचना प्राप्त हुई कि, उषा किसी परपुरुष से अपने सम्पर्क बढा रही हैं । इससे संतप्त होकर, सत्यता जानने की इच्छा से यह उसके महल गया । वहॉं इसने देखा कि, उषा एक पुरुष के साथ द्यूत खेल रही है । दोनों को इस प्रकार निमग्न देखक्र यह क्रोध से लाल हो उठा, तथा अपने शस्त्रास्त्र तथा गणों के साथ उस पर आक्रमण बोल दिया । पर उस पुरुष का बाल बॉंका न हुआ । उसने बाण के हर वार का कस कर मुकाबला किया । वह पुरुष कोई साधारण नहीं, वरन् कृष्ण का पौत्र अनिरुद्ध हीं था । अन्त में बाण ने अपने को गुप्त रखकर अनिरुद्धपर् नागपाश छोडे । उन नागों ने उषा तथा अनिरुद्ध को चारों ओर से जकड लिया, तथा दोनों कारागार में बन्दी बनाकर डाल दिये गये ।
बाण II. n.  अनिरुद्ध के कारावास हो जाने की सूचना जैसे हे कृष्ण को प्राप्त हुयी, वह अपनी यादव सेना के साथ शोणितपुर पहुँचा, तथा समस्त नगरी को सैनिकों से घेर लिया । दोनों पक्षों में घनघोर युद्ध हुआ । बाण्की रक्षा के लिए उसकी ओर से शंकर भगवान्, कार्तिकेय एवं गणेश भी थे । इस युद्ध में गणेश का एक दॉंत भी टूटा, जिससे उसे ‘एकदंत’ नाम प्राप्त हुआ । इस युद्ध में, पद्म के अनुसार, बाण का युद्ध सबसे पहले बलराम से हुआ, अथा भागवत एवं शिवपुराण के अनुसार, इसका सर्वप्रथम युध सात्यकि से हुआ । कृष्ण के साथ इसका युद्ध बाद में हुआ, जिसमें कृष्ण के अपार बलपौरुष के समक्ष इसके सभी प्रयत्न असफल हो अये । इन समस्त युद्धों में, पहले बाण की ही जीत नजर आती थी; किन्तु अन्त में इसको हर एक युद्ध में पराजय का ही मुँह देखना पडा । अन्त में जैसे ही कृष्ण ने सुदर्शन चक्र के द्वारा इसका वध करना चाहा, वैसे ही अष्टावतार लम्बा के रुप में पार्वती इसके संरक्षण के लिए नग्नावस्था में ही दौडी आई । भागवत में पार्वती के इस रुप को ‘कोटरा’ कहा गया है । इसके पूर्व भी, इसी युद्ध में पार्वतीजी अपने पुत्र कार्तिकेय की रक्षा के लिये आई थी, तथा उन्हें अब दुबारा इसकी रक्षा के लिए आना पडा, क्योंकि वह वचनबद्ध थीं । कृष्ण ने पार्वती से अलग रहएन के लिए कहा, किन्तु वह न मानी तथा कृष्ण से निवेदन किया, ‘यदि तुम चाह्ते हो कि मैं पुत्रवती रहूँ, मेरा पुत्र जीवित रहे, तो बाण को जीवनदान दो । मैं इसकी रक्षा के ही लिये तुम्हारे सम्मुख हूँ’। कृष्ण ने प्रत्युत्तर देते हुए कहा ‘मैं तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर सकता, किन्तु यह अहंकारी हैं, इसे अपने हजार बाहुओं पर गर्व है; अतएव इसके दो हाथों को छोडकर समस्त हाथों को नष्ट कर दूँगा’। इतना कह कर कृष्ण ने इसको दो हाथों को छोडकर शेष हाथ काट दिये [पद्म.३.२.५०] । भागवत तथा शिवपुराण के अनुसार विष्णु ने इसके चार हात रहने दिये, तथा शेष काट डाले [भा.१०.६३.४९] । शिवपुराण में कृष्ण द्वारा इसका वध न होने कारण दिया गया है । जब कृष्ण ने इसका वध करना चाहा, तब शिव ने उसने कहा ‘दधीचि, रावण एवं तारकासुर जैसे लोगों का वध करने के पूर्व तुमने मेरी संमति ली थी । बाण मेरे लिये पुत्रवत है, उसको मैने अमरत्व प्रदान किया है; अतः मेरी यही इच्छा है कि, तुम इसका वध न करो ।
बाण II. n.  भागवत के अनुसार कृष्ण ने इसे इसलिये जीवित छोडा, क्यों कि, उसने इसके प्रपितामह प्रह्राद को वर प्रदान किया था कि, वह उसके किसी वंशज का वध न करेगा । इसी कारण इसका वध नही किया, केवल गर्व को चूर करने के लिये हाथ तोड दिये । इसके साथ ही कृष्ण वर दिया, ‘तुम्हारे ये बचे हुए हाथ जरामरण रहित होंगे, एवं तुम स्वयं भगवान् शिव के प्रमुख सेवक बनोंगे [भा.१०.६३] । युद्ध समाप्त होने पर भगवान् शिव ने भी इसे अन्य वर भी दिये, जिनके कारण इसे अक्षय गाणपत्य, बाहुयुद्ध में अग्रणित्व, निर्विकार शंभभक्ति, शंमुभक्तों के प्रति प्रेम, देवों से तथा विष्णु से निर्वैरत्व, देवसाम्यत्व (अजरत्व एवं अमरत्व) इसे प्राप्त हुए [शिव.रुद्र.यु ५९] । हरिवंश तथा विष्णु पुराणके अनुसार, शिव ने इसे निम्न वर और प्रदान कियेः---बाहुओं टूटने के वेदना का शमन होना, बाहुओं के टूटने के कारण मिली विद्रूपता का नष्ट होना, शिव की भक्ति करने पर पुत्र की प्राप्ति होना आदि [ह.वं.२.१२६] ;[विष्णु.५.३०]
बाण II. n.  तत्पश्चात् कृष्ण ने इसे बडे सम्मान के साथ द्वारका बुलाया, एवं उषा तथा अनिरुद्ध का विवाह संपन्न कराया । विवाहोपरान्त कृष्ण ने इसे बडे स्नेह से विदा किया । इसने उषा के अनिरुद्ध से उत्पन्न पुत्र को अपने राज्य का उत्तरधिकारी बनाया, जिससे प्रतीत होता है कि इसको कोई पुत्र न था [शिव.रुद्र.यु.५९] । किन्तु ब्रह्मांड में इसकी पत्नी लोहिनी से उत्पन्न इसके ‘इंद्रधन्वन्’ नामक पुत्र का निर्देश प्राप्त हैं [ब्रह्मांड ३.५.४५] । इसे ‘अनौषम्या’ नामक और भी अनेक पत्नियॉं थीं, जिनका निर्देश पद्म एवं मत्स्य में प्राप्त है [पद्म.१४] ;[मत्स्य.१८७.२५] । ‘नित्याचार पद्धति’ नामक ग्रंथ के अनुसार, बाण के द्वारा चौदह करोड शिवलिंगों की स्थापना देश के विभिन्न भागों में की गयी थी । ये लिंग ‘बाणलिंग’ नाम से सुविख्यात थे । नर्मदा गंगा आदि पवित्र नदियों में प्राप्त शिवलिंगकार पत्थरों को भी, बाणासुर के नाम से ‘बाणलिंग’ कहा जाता है [नित्याचार. पृ.५५६]
बाण II. n.  सदाचारसंपन्न एवं परम ईश्वरभक्त हो कर भी जिन असुरों का देवों के द्वारा अत्यंत निर्घृणता के साथ संहार किया गया, उन असुरों में बाण प्रमुख था । इसके वंश में से इसका पिता बलि, इसका प्रपितामह प्रह्राद, एवं इसका पितुःप्रपितामह हिरण्यकशिपु इन सारे राजाओं को देवों के साथ लडना पडा । इससे प्रतीत होता है कि, देव एवं दैत्य जातिओं के पुरातन शत्रुत्व के कारण ये सारे युद्ध उत्पन्न हुए थे । पिढियों से चलता आ रहा यह शत्रुत्व किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत शत्रुत्व न हो कर, दो जातिओं का संघर्ष था (बलि वैरोचन देखिये) । बाण की जीवनकथा में शैव एवं वैष्णवों के परंपरागत संघर्षो की परछाइयॉं भी अस्पष्ट रुप से दिखाई देती है । आकाश में तैरती हुयी बाण की शोणितपुर राजधानी किसी पर्वतीय प्रदेश में स्थित नगरी के ओर संकेत करती है । शोणितपुर को लोहितपुर एवं बाणापुर नामान्तर भी प्राप्त थे (त्रिकाण्ड.३२.१७; अभि.१३३. ९७७) । आसाम में स्थित ब्रह्मपुत्रा नदी का प्राचीन नाम भी लोहित ही था । इससे प्रतीत होता है कि, बाण का राज्य सद्यःकालीन आसाम राज्य के किसी पहाडी में बसा होगा । यह पहाडी अत्यंत दुर्गम होने के कारण, देवों के लिये बाण अजेय बना होगा ।
बाण III. n.  स्कंद का एक सैनिक [म,.श.४४.६२]

Puranic Encyclopaedia  | en  en |   | 
BĀṆA (BĀṆABHAṬṬA) I   A Sanskrit poet who lived in the 7th century A.D. He was a member of the assembly of emperor Harṣavardhana. ‘Harṣacarita’ (prose) is the most important work of Bāṇa. Though many of the descriptions in this book contain exaggerations it affords plenty of scope for investigation into the features of ancient Sanskrit literature. He has mentioned about Vyāsa, Bhaṭṭāra-hariścandra, Sātavāhana, Pravarasena, Bhāsa, Kālidāsa and such others. Harṣacarita, in a sense, is a Romance. It is divided into eight Ucchvāsas. From the first two or three chapters informations could be had of Bāṇabhaṭṭa. His mother Rājyadevī died when he was a little boy. At the age of fourteen his father also died. After that he arrived at the palace of Harṣa. The story of Harṣacarita begins with the death of Prabhākara-Vardhana, father of Harṣa. The Book ends with the story incomplete. Harṣacarita is the only historic prose work available in Sanskrit.
BĀṆA II   A mighty and powerful Asura.
1) Genealogy and birth.
Descended from Mahāviṣṇu in the following order: Brahmā-Marīci-Kaśyapa- Hiraṇyakaśipu-Pṛahlāda-Virocana-Mahābali-Bāṇa.
2) Getting a boon.
Bāṇa began his reign with the city of Śoṇitapura as his capital. Then he went to the vicinity of the Himālayas and began to do penance thinking of Śiva. Śiva made his appearance and asked him what he wanted. He requested that he should be considered as the son of Pārvatī and that he should be given thousand hands so as to destroy all his enemies. Śiva granted him the boon. From that day onwards Pārvatī considered him as the younger brother of Subrahmaṇya. He returned to his Kingdom and began to reign.
3) Battle with Śrī Kṛṣṇa and his fall.
(See the word Aniruddha).
4) Other information.
(1) In the Purāṇas Bāṇāsura is often called by the name Mahākāla, which is the name of an attendant of Śiva. [M.B., Ādi Parva, Chapter 65, Stanza 20] .
(2) Śukrācārya (the teacher of the Asuras) always worked for the uplift of Bāṇa. [M.B., Sabhā Parva, Chapter 38, Stanza 29] .
(3) In the Battle with Śrī Kṛṣṇa, Bāṇa was helped by Śiva, Subrahmaṇya, and the Gods like Agni (fire) and others. [M.B., Sabhā Parva, Chapter 38] .
(4) Śrī Kṛṣṇa cut down the thousand hands of Bāṇa with his Cakrāyudha (the wheel weapon). [M.B., Sabhā Parva, Chapter 38] .
(5) Bāṇa often stood under the cover of the mountain of Krauñca and attacked the devas (gods). So once Subrahmaṇya had to cut the mountain Krauñca with his arrows. [M.B., Śalya Parva, Chapter 46, Stanza 82] .
BĀṆA III   A warrior of Subrahmaṇya. Mention is made about this Bāṇa in [Mahābhārata, Śalya Parva, Chapter 45, Stanza 67] . BĀṆA IV. An asura. During the regime of Śrī Rāma this Asura fought against the King and his brothers. A Śivaliṅga had been consecrated in the throat of this asura. So it was not possible for Lakṣmaṇa to defeat him though he had fought with him for so many days. Lakṣmaṇa heard an etherial voice saying, “Unless and until the image of Śivaliṅga is removed from his throat Bāṇa could not be killed.” By the operation of arrows Lakṣmaṇa smashed the image of Śivaliṅga in his throat. With the same arrow he cut the throat of the asura also and thus Bāṇa was killed. [Kampa Rāmāyaṇa, Uttara Kāṇḍa] .

Aryabhushan School Dictionary | mr  en |   | 
 m  An arrow; a rocket.

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