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अर्जुन

See also :
ARJUNA , ARJUNA II , ARJUNA III , ARJUNA IV
 पु. पांच पांडवांतील मध्यम पांडव . हा फार पराक्रमी असल्यामुळें लक्षणेनें पराक्रमी वीर असा अर्थ होतो . ' आमचा अर्जुन गेला एक बाजू खचली .' - भाव १७ .
दहा नांवें - अर्जुन , फाल्गुन , जिष्णु , किरीटी , श्वेत  वाहन , बीभत्सु , विजयी , कृष्ण , सव्यासाची , व धनंजय . ( सं .)
 पु. 
  1. पांच पांडवांपैकीं तिसरा ; पार्थ .
  2. सहस्त्रार्जुन कार्तवीर्य

 वि. पांढरा ; श्वेत . [ सं . ]
अर्जुनसादडा - साताडा ; पांढरा ऐन . याचा पांढरा डीक औषधी आहे . हें झाड कोंकणांत होतें . याच्या सालींचा उपयोग कातडें कमाविण्यास व औषधास होतो . पानें वीतभर लांब , फुलें पांढरीं . साल पांढरी , लांकूड हरकामास उपयोगी . अइन पहा .
०वाद्य  न. बोंब ; शंखध्वनि ; अर्जुनाचें दुसरें नांव फाल्गुन यावरुन फाल्गुनांतील वाद्य म्हणजे बोंब . अर्जुन वाद्यें केलीं - ख १९३० .
०रुख  पु. एक झाड ; अर्जुनसादडा , अर्जुन ( अर्थ ३ ) पहा . जै अर्जुनाचें रुख मोडिलें । - दाव ३३६ . [ सं . अर्जुन + वृक्ष ]
n.  (सो. पूरु.) कुन्ती को दुर्वास द्वारा दिये गये इन्द्रमंत्रप्रभाव से उत्पन्न पुत्र । यह कुन्ती का तृतीय पुत्र था । इसका जन्म होते ही इसका पराक्रम कथन करनेवाली आकाशवाणी हुई [म.आ.११४.२८] । यह इंद्र के अर्ध सामर्थ्य से हुआ [मार्क. ५.२२] । इसके जन्म के समय, उत्तराफाल्गुनी समवेत पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र, फाल्गुन माह में था, अतएव इसका नाम फाल्गुन प्रचलित हुआ [म. वि. ३९.१४] । इसका जन्म हिमालय के शतशृंग नामक भाग पर हुआ । पांडू की मृत्यु के पश्चात्, इसके उपनयनादि संस्कार, वसुदेव ने काश्यप नामक ब्राह्मण भेज कर, शतशृंग पर ही करवाए [म.आ.११५ परि. १.६७]
विद्याजंन n.  यद्यपि सब कौरव पांडवों ने शस्त्रविद्या द्रोण से ही ग्रहण की, तथापि विशेष नैपुण्य के कारण, द्रोण की इसपर विशेष प्रीति थी । इस की अध्ययन में भी प्रशंसनीयदक्षता थी । द्रोण सब शिष्यों को पानी भरने के लिये छोटें पात्र देता हा, परंतु अपने पुत्र का समय व्यर्थ न जावे, इसलिये अश्वत्थामा को बडा पात्र देता था । यह बात, सर्वप्रथम अर्जुन के ही ध्यान में आयी तथा बडी कुशलता से इसनें अश्वत्थामा के साथ आने का क्रम जारी रखा । इसीसे यह सब से आगे रहा परंतु अश्वत्थामा से पीछे न रहा । एकबार भोजनसमय, हवा के कारण बत्ती बुझ गयी परंतु अंधकार होते हुए भी इसका भोजन ठीक तरह से पूर्ण हुआ । तब इस ने तर्क किया कि, अंधकार में भी गलती न करते हुए मुँह में ग्रास जाने का कारण दृढाभ्यास है । तुरंत, अंधकार में भी लक्ष्यवेध करने का इसने प्रारंभ किया, तथा यह धनुर्विद्या में अत्यंत निष्णात हो गया । द्रोण को भी इसके लिये काफी अभिमान था, अतएव अर्जुन का पराभव कोई भी न कर सके, इसलिये उसने कपट से अपने शिष्य एकलव्य का अंगूठा मांग लिया । इतनी अधिक गुरुकृपा का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि, ‘रथी तथा महारथियों में अग्रेसरत्व ले कर लडनेवाला,’ ऐसी इसकी ख्याति हो गई ।
परीक्षा n.  एकबार परीक्षा लेने के लिये, द्रोण ने वृक्ष पर रखे एक चिन्ह पर लक्ष्य वेध करने के इसे कहा, तथा सबको पूछा कि, तुम्हें क्या दिख रहा है । । केवल अर्जुन ने ही कहा कि, लक्ष्य के मस्तिष्क के अतिरिक्त मुझे और कुछ भी नही दिखता । तब से द्रोण इसपर अधिक प्रसन्न रहने लगे । एकबार जब द्रोण, गंगास्नान के लिये गये थे तब मगर ने उसे पकड लिया । सभी शिष्य दिङ्‍मूढ हो गये परंतु अर्जुन ने पांच बाण मार कर द्रोण की मगर से रक्षा की । द्रोणाचार्याद्वारा ली गई शिष्यपरीक्षा में अर्जुन के प्रथम आनेके उपलक्ष में, ब्रह्मशिर नामक उत्कृष्ट अस्त्र उसने इसे दिया [म.आ.१२३], तथा कहा कि, इस अस्त्र का प्रयोग मानव पर न करना [म.आ.१५१.१२-१३ कुं.] । एकबार द्रोण ने अपने सब शिष्यों क शस्त्रास्त्रनैपुण्य दर्शाने के लिये एक बडा समारंभ किया । उस समय अर्जुन ने लगातार पांच बाण ऐसे छोडे कि, पांचों मिल कर एक ही तीर नजर आवे । एक लटकते तथा हिलते सींग में इक्कीस बाण भरना इ. प्रयोग कर इसने दिखाये, तथा सबसे प्रशंसा प्राप्त की । परंतु कर्ण इसे सहन कर कर सका । अर्जुन द्वारा किये गये समस्त प्रयोग उसने कर दिखाये, तथा अर्जुन के साथ द्वंद्वयुद्ध करने की इच्छा प्रदर्शित की । तब अर्जुन ने आंगुतुक कह कर उस का उपहास किया । तथापि द्रोण की इच्छानुसार यह युद्ध के लिये सुसज्ज हुआ, परंतु ‘तुम कुलीन नही हो, अतएव राजपुत्र अर्जुन तुमसे युद्ध नही करेगा,’ ऐसा कृपाचार्य ने कहा । तब दुर्योधन ने कर्ण को अभिषेक कर के, अंगदेश का राजा बनाया । युद्ध की भाषा प्रारंभ हुई, परंतु गडबडी में यह प्रसंग यहीं समाप्त हुआ [म.आ.१२६.१२७] । आगे चल कर, गुरुदक्षिणा के रुप में द्रुपद को जीवित पकड कर लाने का कार्य जब द्रोण ने शिष्यों को दिया, तब केवल अर्जुन ही यह काम कर सका [म.आ.१२८]
पराक्रम n.  अर्जुन ने आगे चल कर, सौवीराधिपति दत्तामित्र नाम से प्रसिद्ध सुमित्र को जीता । उसी प्रकार, विपुल को, जो पांडु द्वारा नही जीता गया, जीता । पूर्व तथा पश्चिम दिशायें जीतीं । कुछ प्रतियों में तो कहा है कि, अर्जुन ने पंद्रहवें वर्ष की उम्र में दिग्विजय किया [म.आ.१५१.४४.५० कुं.] । पांडवों की चारों तरफ प्रसिद्धी होने के लिये, अर्जुन के पराक्रम का बहुत ही उपयोग हुआ । आगे चल कर, जतुगृह से छुटकारा होने के बाद, सब पांडव ब्राह्मणवेष में द्रौपदीस्वयंवर के लिये गये । राह में रात्रि के समय, अंगारपर्ण गंधर्व ने इन्हे रोका । तब उसका तथा अर्जुन का युद्ध हो कर अंगारपर्ण का इस ने पराभव किया । अंगारपर्ण ने इसे चाक्षुषीविद्या दी, तथा अर्जुन ने उसे अग्न्यस्त्र दे कर उसमे मैत्री की (अंगारपर्ण देखिये) । पांचालनगरी में अर्जुन नें, द्रौपदी के स्वयंवरार्थ लगाये गये मत्स्ययंत्रभेदन की शर्यत जीती, तथा द्रौपदी ने अर्जुन का वरण किया [म.आ.१७९] आगे चल कर, धृतराष्ट्र ने विदुर को भेज कर पांडवों को हस्तिनापुर से वापस लाया । एक बार, आयुधागार में युधिष्ठिर तथा द्रौपदी जब एकांत में थे, तब अर्जुन को विवश हो कर वहॉं जाना पडा । कोई ब्राह्मणों की यज्ञीय गौए चोरी हो गई थीं, इस लिये वे राजा को सूचना देने आये थे । अर्जुन ने निर्भय होने का आश्वासन उन्हें दिया तथा अयुधागार से शस्त्र लेकर गायें आपस लोंटा कर लाई । युधिष्ठिर तथा द्रौपदी को एकांत में देखा, इस लिये नियत शर्त के अनुसार यह बारह महीनो तक तीर्थाटन करने गया [म.आ.२०५]
तीर्थयात्रा n.  अर्जुन ने इस तीर्थाटन काल में, कौख्य नाग की उलूपी नामक कन्या से, पाताल में विवाह किया[म.आ.२०६] । तदनंतर यह हिमालय पर गया । वहॉं से बिंदुतीर्थ पर गया । वहॉं से, पूर्व की ओर मुड कर उत्पालिनी नदी, नंदा, अपरनंदा, कौशिकी, महानदी, गया तथा गंगा नामक तीर्थस्थान इसने देखे । वहॉं से अंग, वंग तथा कलिंग देश देख कर, यह समुद्र की ओर मुडा । महेंद्र पर्वत पर से मणिपूर के राज्य में प्रविष्ट हुआ । मणिपूर राजा चित्रवाहन की चित्रांगदा नामक एक सुन्दरी कन्या थी । अर्जुन ने उसे अपने लिये मांग लिया । राजा ने इस शर्त पर कन्या दी कि, कन्या का पुत्र उसे मिले । अर्जुन मणिपूर में तीन वर्ष रहा । उस अवधी में चित्रागंदा को एक पुत्र हुआ । उसका नाम बभ्रुवाहन । आगे मगरो के कारण, सब के द्वारा त्यक्त पंचतीर्थ में से सौभद्रतीर्थ पर अर्जुन प्रथम गया, तथा वहॉं शाप से मगर बनी हुई अप्सराओं का उद्धार कर के, पुनश्व मणिपूर वापस आया । वहॉं चित्रांगदा तथा बभ्रुवाहन से मिल कर गोकर्ण गया । वहॉं से प्रभासक्षेत्र में जाने पर कृष्णार्जुन मीलन हुआ । वहॉं से रैवतकपर्वत तथा द्वारका जा कर, कृष्ण की सहायता से सुभद्राहरण करने का इसने सोचा, तथा उसके लिये धर्मराज की संमति प्राप्त की । मृगया के निमित्त्य से बाहर गये अर्जुन ने, रैवतक पर्वत के देवाताओं का दर्शन तथा प्रदक्षिणा किया । पश्चात् द्वारका वापिस जानेवाली सुभद्रा को अपने रथ में बिठाया तथा वहॉं से पलायन किया । पश्चात् अर्जुन का पक्ष ले कर, कृष्ण ने बलराम की ओर से अर्जुन को निमंत्रण दिया, तथा बडे धूमधाम से विवाह करवाया । वहॉं एक वर्ष रह कर, अर्जुन ने बाकी दिन पुष्करतीर्थ में बिताये । परंतु निम्नलिखित लोकप्रसिद्धि कथा भी कुछ स्थानों पर वर्णित है । सुभद्रा के दुर्योधन से होनेवाले विवाह की वार्ता, अर्जुन को प्रभासक्षेत्र में मालूम हुई । उसे प्राप्त करने के लिये, त्रिदण्डी सन्यास ले कर द्वारका में चातुर्मास बिताने का निश्चय इसने किया । वहॉं सब पौरजनों में यह अत्यंत प्रसिद्ध हुआ । तब बलराम ने भी इसे अपने घर में भोजन का निमंत्रण दिया । सीधे साधे भोले बलराम इसे पहचान न सके । वहॉं सुभद्रा तथा अर्जुन की दृष्टिभेट हुई । यात्रा के लिये, शर से बाहर गई हुई सुभद्रा को रथ में डाल कर अर्जुन ने हरण कर लिया, तथा विरोधकों को मार भगाया । अर्जुन के त्रिदण्डी संन्यास कीं कथा भागवत तथा महाभारत की कुंभकोणम्‍ प्रति में ही केवल है [भा.१०.८६];[ म.आ.२३८.४ कुं.] । स्कंद.ुराण में भी अर्जुन की तीर्थयात्रा का उल्लेख है तथा नारद ने अर्जुन को अनेक क्षेत्रों का महात्म्य कथन किया है [स्कंद. १.२.५]
वस्तुप्राप्ति n.  अर्जुन को अनेक व्यक्तियों से भिन्न वस्तु प्राप्त होने का उल्लेख है । मय ने बिंदुसर पर से उत्तम आवाज करनेवाला देवदत्त नामक वारुण महाशंख अर्जुन कों दिया [म.स.३.७.१८] । उसी प्रकार, अग्नि ने अर्जुन को, खांडववन भक्षणार्थ देने के उपलक्ष में ,गांडीव धनुष्य, दो अक्षय तूणीर, कपिध्वजयुक्त सफेद अश्वों का रथ, आदि चीजें दीं [म.आ.५५.३७];२५१ कुं. । ये सारी चीजें अग्नि ने वरुण से तथा वरुण ने सोम प्राप्त की थी । अर्जुन यद्यपि इन्द्रांश से उत्पन्न हुआ था, तथापि खांडवदाह के समय वर्षा कर के विरोध करने के कारण, इन्द्र का अर्जुन से युद्ध हुआ, तथा उसमें इन्द्र को पीछे हटना पडा [म.आ.२१८] आगे चल कर, इन्द्र ने इसे कवच तथा कुंडल दिये [म.व.१७१.४]
दिग्विजय n.  वनवास के पहले, राजसूययज्ञ के समय इसने किये दिग्विजय की कल्पना निम्नांकित वर्णन से आएगी । प्रथम कुलिंद देश के राजा को जीता । आनर्त तथा कालकूट देशों पर सत्ता स्थापित कर, सुमंडल राज का पराजय किय । आगे चल कर, उसे साथ लेकर, शाकलद्वीप तथा प्रतिविंध्य पर आक्रमण किया । उस समय शाकलद्वीप के तथा सप्तद्धीप के सब राजाओं को अर्जुन ने जीता तथा उनके साथ प्राग्ज्योतिष देश पर आक्रमण किया । वहॉं भगदत्त के साथ अर्जुन का आठ दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ । अन्त में जब भगदत्त ने कर देना स्वीकर किया, तब अर्जुन ने कुबेर के प्रदेश पर आक्रमण किया । वहॉं के सब राजाओं से कर वसूल कर, उलूक देश पर आक्रमण किया । उलूक देश के राजा का नाम बृहन्त था । उसे युद्ध में पराभूत कर तथा कर ले कर, उसके सहित सेनाबिंदु पर आक्रमण किया, तथा गद्दी से उसे पदच्युत किया । तदनंतर मोदापूर का वामदेव, सुदामन तथा उत्तर उलूक के राजाओं को इकट्टा कर के उनसे कर वसूल किया । तदनंतर पंचगण देश को जीत कर सेनाबिंदू के देवप्रस्थ नगर को यह गया । वहॉं से इसने राजा पौरव विश्वगश्व पर आक्रमण किया । उसे जीत कर, पर्वत में रहनेवाले सात उत्सवसंकेत गणों को जीता, तदनंतर काश्मीर के वीरों को जीता तथा दस मांडलिकों के साथ लोहित को जीता । त्रिगर्त, दार्व तथा कोकनद से कर ले कर अभिसारी नगरी जीती । उरगा नगरी के रोचमान को जीता । चित्रायुध का सिंहपूर नगरी को ध्वस्त किया । तदनंतर सुह्य तथा चौल देश उध्वस्त कर के, बाल्हीक देश में प्रविष्ट हुआ । वह देश जीत कर, कांबोज तथा दरद देश हस्तगत किये । उत्तर की ओर के दस्युओं को हस्तगत कर के, आगे लोह, परम कांबोज तथा उत्तर ऋषि को अर्जुन ने जीता । ऋषिक देश में भयंकर युद्ध करना पडा, परंतु अन्त में विजय प्राप्त हो कर, मयूरवर्ण तथा शुकोदरवर्ण अश्व करभार के रुप में प्राप्त हुए । इस प्रकार, निष्कुटसहित हिमालय जीत कर, अर्जुन श्वेत पर्वत पर आ कर रहने लगा [म.स.२४] । वहॉं से, किंपुरुषावास देश पर आक्रमण करके, राजा द्रुमपुत्र से कर वसूल किया । हाटक देश में जाकर, सामनीती से, गुह्यक के पास से कर लिया । मान सरोवर पर ऋषियों द्वारा निकाली गई नहरें देखीं । गंधर्वो के देशों पर आक्रमण कर के, त्तित्तिरिकल्माष तथा मंडूक नामक उत्तम अश्व करभार के रुप में प्राप्त किये । तदनंतर जब यह हरिवर्ष पर आक्रमण करने जा रहा था, तब द्वारपाल ने इसे रोका, तथा यहीं दिग्विजय रोकने के लिये कहा । क्यों कि, उत्तर कुरु देश में सब चीजें अदृश्य है । तब अर्जुन धर्मराज की सत्ता को मान्यता ले कर वापस आ गया, तथा इन्द्रप्रस्थ में प्रविष्ट हुवा [म.स.२३-२५]
वनवास n.  वनवास में पाशुपतास्त्र-प्राप्ति के लिये, इन्द्रकील पर्वत पर अर्जुन ने तपश्चर्या की तथा शंकर को प्रसन्न कर लिया । किरातवेष में आये शंकरर्से इसने मूकवध पर से युद्ध किया तथा अंत में उससे पाशुपतास्त्र प्राप्त किया । पाशुपतास्त्र का रहस्यपूर्ण ज्ञान इसने शंकर से प्राप्त किया [म.व.३८.४१] । अन्य देवों ने भी अर्जुन को अनेको अस्त्र दिये [म.व.४२] तदनंतर इन्द्र के निमंत्रण के कारण, उससे भेजे गये रथ में बैठ कर, यह स्वर्ग गया । वहॉं इन्द्र ने अर्जुन का काफी सम्मान कर अपने अर्धासन पर इसे जगह दी । वहॉं अर्जुन ने अनेक अस्त्रों की शिक्षा प्राप्त की । इस प्रकार इसने अपने पांच वर्ष स्वर्ग में बिताये । इन्द्र के कथनानुसार, वाद्य बजाना, नृत्यकला तथा गानकला की भी शिक्षा इसने ली । इस काम में चित्रसेन नामक गंधर्व का अत्याधिक उपयोग हुआ [म.व.४५.६] । एकबार अर्जुन के पास उर्वशी ने संभोगयाचना की । परंतु इसने उसे नही कर दी । इससे क्रोधित हो कर, ‘तुम नपुंसक बनोगे,’ ऐसा शाप उसने अर्जुन को दिया । परंतु इन्द्र ने उसे बताया कि, अज्ञातवास के समय एक वर्ष तक तुम नपुंसक रहोगे, तथा इस शाप का तुम्हें उपयोग ही होगा [म. व. परि. ६] । इंद्र ने लोमश के द्वारा अर्जुन का समाचार भी अन्य पांडवों को भेजा । अर्जुन कुछ कालोपरांत अपने बांधवों के बीच आते ही, अज्ञातवास के लिये द्रौपदी को विराटनगर तक कंधों पर ले जाने का कार्य अर्जुन ने किया [म. वि.५]
अज्ञातवास n.  अज्ञातवास में अर्जुन ने बृहन्नला नाम तथा नपुंसकत्व का स्वीकार किया, तथा स्वयं ही को द्रौपदी की परिचारिका बता कर, उत्तरा को नृत्यगायनादि सिखाने का काम पाया । आगे जब विराटादि सब लोग, दक्षिणगोग्रहण में मग्न थे, तब दुर्योधनादि ने उत्तरगोग्रहण किया । रजवाडे में अकेला भूमिंज्य (उत्तर) ही था । उसके पास सारथि न था । बृहन्नला सारथ्य कर सकती है यह ज्ञात होने के पश्चात् वह युद्ध के लिये निकला । परंतु ऐन समय पर घबरा कर, रथ से कूद कर भागने लगा । बृहन्नला ने उसे समझा कर, स्वयं युध करने का निश्चय किया, तथा शमीवृक्ष पर के आयुध ले कर उत्तर को अपना परिचय दिया । घमासान युद्ध करते गौओं को पुनः प्राप्त करते समय, इसने कर्ण को भगा कर उस के भाई को जान से मारा । इसके उपलक्ष में, अर्जुन को उपहार रुप में उत्तरा को देने का विचार विराट ने प्रकट किया, परंतु अर्जुन ने उसका स्वीकार अभिमन्यु के लिये किया [म. वि.६७]
कृष्णमहाय्य n.  भारतीय युद्ध की तैय्यारी जब चालू थी, तब दुर्योधन कृष्ण की सहायता प्राप्त करने के लिये द्वारका गया । अर्जुन भी वहीं उपस्थित हुआ । दुर्योधन सराने की ओर बैठा, तथा अर्जुन नम्रता से पैरों की ओर बैठा । उठते ही प्रथम अर्जुन दिखा । उसी प्रकार यह दुर्योधन से छोटा भी था, अतएव कृष्ण ने प्रथम अर्जुन को मॉंग प्रस्तुत करने को कहा । दश कोटि गोपालों की नारायण नामक सेना, तथा निःशस्त्र स्वयं ऐसा विभाजन कर, जो चाहिये उसे मांगने की सूचना कृष्ण ने की । तब अर्जुन ने कृष्ण को मांग लिया । अपनी ओर हजारो सैनिक आये, इस बात पर दुर्योधन संतुष्ट हुआ [म.उ.७] कृष्ण जब पांडवो के मध्यस्थ कार्य के लिये गया, तब अर्जुन ने कहा कि, उसे जो योग्य प्रतीत हो वही वह तय करे [म.३.७६]
भारतीययुद्ध n.  युद्ध के आरंभ में ही, अर्जुन को युद्ध का परिणाम दिखाई देने लगा था । यह सोचने लगा कि, वह स्वयं किसी अविचारी कृत्य में प्रवृत्त हो गया है । इस विचार के कारण, यह युद्ध से निवृत्त होने लगा । परंतु कृष्ण ने इसे कर्तव्यच्युत होने से परावृत्त किया । यही भगवद्‍गीता है [म.भी.२३.४०] । युद्ध के प्रारंभ में ही भीष्मार्जुन युद्ध प्रारंभ हुआ । तीसरे दिन ऐसा प्रतीत होने लगा कि, भीष्म पांडवों को बिल्कुल नही बचने देंगे । परंतु कृष्ण ने प्रतिज्ञा तोड कर हाथ में चक्र लिया, तथा अर्जुन ने भी जोर लगाया । तीसरे दिन के अंत में, कौरवों का इसने काफी नुकसान किया । नववे दिन, अर्जुन का द्रोणाचार्य के साथ युद्ध हुआ । भीष्म के साथ भी जोरदार युद्ध हुआ । संध्या होने के कारण युद्ध रोका गया, परंतु भीष्म के सामने किसी की शक्ति काम नही आती थी, इससे सब निराश हो गये । धर्मराज एवं कृष्ण ने विचार किया, वे भीष्म को ही पूछे, कि उसका वध किस प्रकार किया जा सकता है । भीष्म ने भी सरल स्वभाव से कहा कि, शिखंडी को आगे रख कर, अर्जुन अगर मुझ से लडे तो मेरा वध हो सकता है । क्यो कि, अभद्र ध्वजयुक्त तथा एकबार स्त्री रहनेवाले शिखंडी के समान लोगों पर अपने नियमानुसार भीष्म शस्त्र नही चलाते थे ।
भीष्मवध n.  दसवे दिन, शिखंडी को भीष्म के सामने छोड कर, अर्जुन ने कौरव सेना को बिल्कुल त्रस्त कर डाला । कौरवों ने पांडवों को रोकने का अंतिम प्रयत्न किया, परंतु सफलता हाथ न लगी । अर्जुन ने शिखंडी के आड में रह कर, हजारों बाण भीष्म पर बरसाये तथा भीष्म को नीचे गिरा दिया । हजारों बाण जिसके शरीर में भिदे है, ऐसा भीष्म जब वीरोचित शय्या पर विश्रांति कर रहा था, तब उसकी गर्दन नीचे लटकने लगी अतएव उसने तकिया मांगा । कईयो ने उसे नरम तकिये का दिये, परंतु अर्जुन ने वीरशय्या के लिये उचित तीन बाणोंका तकिया तैय्यार कर के उसे प्रसन्न किया । उसी प्रकार भीष्म के पानी मांगने पर, सबने पानी ला दिया । परंतु उसका स्वीकार न कर, अर्जुन ने भूमि में बाण मार कर उत्पन्न किये जल का स्वीकार भीष्म ने किया [म. भी.११६] । इसके सिवा, युद्ध में शत्रुओं को मारेंगे अथवा मरेंगे, ऐसी प्रत्तिज्ञा कर के बाहर आये हुए त्रिगर्त देश का राजा सत्यरथ, सत्यवर्मा, सत्यव्रत, सत्येषु तथा सत्यकर्मा तथा प्रस्थलाधिपति सुशर्मा, तथा मावेल्लक, लालिस्थ तथा मद्रक आदि अन्य राजाओ को अर्जुन ने परलोक दर्शया [म. द्रों १६];[ म.क. १३,३२, ३९] । तदनंतर अर्जुन ने हाथी की सहायता से लडनेवाले भगदत्त को मार डाला । भगदत्त ने एक बार अर्जुन पर प्राणघातक अंकुश फेका, परंतु कृष्ण ने बीच में आ कर उसे अपनी छाती पर लिया तथा अर्जुन को बचाया [म.द्रो.२८]
जयद्रथवध n.  जयद्रथ ने अभिमन्यु को मृत्यु के बाद लाथ मारने के कारण, अर्जुन ने प्रतिज्ञा की कि, दूसरे दिन सूर्यास्त के पहले मैं उसकी हत्या करुंगा । रात्रि में शंकर ने इसके स्वप्न में आ कर, इसको धीरज बंधा कर पुनः पाशुपतास्त्र दिया [म. द्रो.५७] । अर्जुन में वीरश्री का संचार हुआ तथा इसने दुःशासन दुर्योधनादि का कई बार पराभव किया । कर्ण को भगाया । अंबष्ट, श्रुतायुस् तथा अश्रुतायुस का वध किया [म. द्रो.६८] । इस प्रकार तुमुल युद्धप्रसंग में, सूर्यास्त होने के पहले ही, अर्जुन ने जयद्रथ का शिरच्छेद किया [म. द्रो. १२१]
कर्णवध n.  तदुपरांत, कर्ण के द्वारा धर्मराज का पराभव होने के कारण, धर्म के मन में कर्ण के प्रति अत्यंत द्वेष उत्पन्न हो गया । परंतु कर्ण के सामने किसी का बस नही चलता था । तब धर्म ने अर्जुन की निर्भत्सना की, तथा कहा कि, कर्णवध करने की शक्ति अगर नही है, तो गांडीव किसी और को दे दो । उसने कर्णवध किये बिना रण से वापस लौट आने के लिये, अर्जुन को दोष दिया । यह सुनते ही, पूर्वप्रतिज्ञा के अनुसार, गांडीव कीसी दूसरे को दे दो, ऐसे कहनेवाले धर्मराज का वध करने के लिये खड्‌ग लेकर दौडा । तब कृष्ण ने धर्माधर्म का भेद बना कर कहा कि, धर्मराज के लिये ‘आप’ शब्द का प्रयोग करने के बदले अगर ‘तुम’ या ‘तू’ कहा तो यह अपमान वधतुल्य है । अर्जुन ने यह मानकर, धर्मराज के प्रति कुत्सित शब्दों का उपयोग कर, उसका अत्यंत अपमान किया । अंत में, ऐसा करने का कारण बता कर, यह कर्णवध के काम में लग गया । कृष्ण इसे लगातर उत्तेजन दे ही रहा था । कर्णार्जुन का तुमुल युद्ध शुरु हुआ । अर्जुन ने कर्ण को घायल कर के एक बार बेहोश कर दिया, तथा बाण पर बैठ पर आये हुए तक्षक का वध किया । परंतु युद्ध के ऐन रंग में ही, कर्ण के रथ का पहिया पृथ्वी ने निगल लिया । कर्ण नें रथ से कूद कर पहिया उठाने का प्रयत्न किया, परंतु कुछ लाभ नही हुआ । उसने धर्मयुद्ध के अनुसार अर्जुनको रुकने का उपदेश किया, परंतु उसका भी कुछ लाभ न हो कर, अर्जुन ने कर्ण का मस्तक उडा दिया [म. क. ६७]
युद्धसमाप्ति n.  दुर्योधन की मृत्यु के बाद सब उसके शिबिर में आये । तब अनेक अस्त्रप्रयोगों से दग्ध, परंतु कृष्ण के, सामर्थ्य से सुरक्षित अर्जुन का रथ, कृष्णार्जुन के नीचे उतरते ही, अपने आप जल कर खाक हो गया [म. श. ६१] । आगे चल कर, अश्वत्थामा ने चिढ कर रात्रि के समय ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, तथा सबको जलाना प्रारंभ किया । तब उसके परिहार के लिये अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया । परंतु वह सब लोगों को अधिक कष्ट देनेवाला सोच कर इसने वापस ले लिया [म. सौ.१५] । यद्यपि भारतीय युद्ध में, अर्जुन का सारथी कृष्ण था [म. ३.७. ३४] । तो भी पुरु नामक एक सारथि अर्जुन के पास निरंतर रहता था [म. स.३०]
अश्वमेध n.  जब युधिष्ठिर ने अश्वमेध का अश्व छोडा, तब उसके संरक्षणार्थ अर्जुन की योजना कीं गई थी । अर्जुन प्रथम अश्व के पीछे उत्तर दिशा की ओर गया । राह में कई छोटे बडे युद्ध हुए । उनमें से केवल महत्त्वपूर्ण युद्धों का वर्णन महाभारत में दिया है । त्रिगर्त का राजा सूर्यवर्मा, उसी प्रकार उसका भाई केतुवर्मा तथा धृतवर्मा का पराजय अर्जुन ने किया । प्राग्ज्योतिषपुर का राजा भगदत्तपुत्र यज्ञदत्त को इसने अच्छा पाठ सिखाया । तदनंतर यह सिंधु देश में गया । सिंधुराजा जयद्रथ का वध अर्जुन के द्वारा होने के कारण, वहॉं के निवासियों में अर्जुन के प्रति त्वेष जागृत था । उनके द्वारा जोरदार आक्रमण होने के कारण, अर्जुन के हाथों से गाण्डीव छूट गया । परंतु उसके बाद भी इसने जोरदार युद्ध शुरु किया । अर्जुन के आगमन की सूचना मात्र से जयद्रथपुत्र सुरथ मृत हो गया । परंतु जयद्रथ की पत्नी तथा दुर्योधन भगिनी दुःशला, अपने नाती सहित अर्जुन के पास आई, तथा इसे शरण आ कर युद्धसे परावृत्त किया ।$पुत्रभेट---तदनंतर अर्जुन मणलूर देश में गया । तब इसका पुत्र बभ्रुवाहन अनेक लोगो के साथ, इसके स्वागत के लिये आया । परंतु क्षत्रियोचित वर्णन न करने के कारण अर्जुन ने उसकी निर्भत्सना की । पाताल से उलूपी वहॉं आई तथा उसने भी अपने सापत्न पुत्र को युद्ध के लिये प्रोत्साहन दिया । बभ्रुवाहन ने घनघोर युद्ध प्रारंभ कर के अर्जुन को मूर्च्छित किया, तथा स्वयं भी मूर्च्छित हो गया । उसकी माता चित्रांगदा रणक्षेत्र में आई तथा पुत्र एवं पति के लिये उसने अत्यंत विलाप किया । बभ्रुवाहन ने प्रायोपवेशन किया । तब, इस पिता पुत्र युद्ध के लिये, उलूपी को सबके द्वारा दोष दिये के जाने कारण, केवल स्मरण से प्राप्त होने वाले संजीवनीमणि से उसने अर्जुन को जागृत किया । शिखण्डी को सामने रख कर भीष्मवध करने के कारण अजिंक्य अर्जुन का पराभव बभ्रुवाहन कर सका । तदुपरांत, अर्जुन मगध देश में गया तथा जरासंधपौत्र मेघसंधी का इसने पराभव किया । उसके बाद वंग, पुण्ड्र तथा केरल देश जीत कर, दक्षिण की ओर मुडकर इसने चेदि देश पर आक्रमण किया । वहॉं शिशुपालपुत्र शरभ से सत्कार प्राप्त कर, काशी, अंग, कोसल, किरात तथा तङ्गण देश पार कर, यह दशार्ण देश में गया । वहॉं चित्रांगद से युद्ध कर के उसे अपने काबू में लाया । निषादराज एकलव्य के राज्य में जा कर, उसके पुत्र से युद्ध कर के उसे जीता । पुनःदक्षिण की ओर आ कर, द्रविड, आन्ध्र, रौद्र, माहिषक तथा कोल्लगिरेय, इनको सुगमता से जीत कर सुराष्ट्र के आसपास गया । वहॉं से, गोकर्ण, प्रभास, द्वारका इ. भाग से, समुद्रकिनारे से पंचनद देश में गया तथा वहॉं से गांधार गया । गांधार में, शकुनिपुत्र से इसका भयानक युद्ध हुआ तथा शकुनिपुत्र की सेना का इसने संहार किया । अपने पुत्र की भी यही स्थिति होगी यह जानकर, शकुनि की पत्नी ने, अर्जुन को युद्ध से परावृत्त किया । इस, प्रकार, बडे गौरव के साथ अश्व के पीछे पीछे दिग्विजय कर के, अर्जुन हस्तिनापुर लौट आया । उस समय माघ पौर्णिमा थी, तथा यज्ञ चैत्र पौर्णिमा के समय होने वाला था । इस के लिये अर्जुन ने सब को आमंत्रण दिया था [म.आश्व. ७१ ८५- कुं.] युधिष्ठिर को अर्जुन के आगमन की वार्ता प्रथम जासूसों द्वारा मालूम हूई । तदनंतर अर्जुन के शरीर स्वास्थ्य के बारे में उसने कृष्ण के पास विशेष पूछताछ की [म. आश्व. ८९. कु.] । अर्जुन ने आनेवाले राजाओं का सन्मान करने के बारेमें बताते समय, बभ्रुवाहन का विशेष सन्मान करने के लिये कहा [म. आश्व. ८८.१८-२१ कुं.]
हतबलता n.  सब यादवों का संहार हुआ, ऐसी वार्ता दारुक ने हस्तिनापूर में आ कर बताई । तब अर्जुन को ऐसा लगा कि, यह वार्ता गलत है । परंतु स्वयं द्वारका में आ कर देखने के बाद, उसे विश्वास हुआ । कृष्णपत्नियों का हृदयभेदी विलाप बडे कष्ट से सुन कर इसने सबको धीरज बँधाया, तथा यह वसुदेव से मिलने आया । ऑंखों में पानी ला कर इसने वसुदेव का चरण स्पर्श किया । वृद्ध वसुदेव ने अर्जुन का आलिंगन कर के शोक किया, तथा शूर राम-कृष्ण की मृत्यु हो गई, केवल मैं जीवित बचा, ऐसें खेदजनक शब्द कहे । द्वारका जल्द ही समुद्र में डूबने वाली है, ऐसा बता कर, स्त्रियॉं, रत्न तथा राज्य सम्हालने के लिये वसुदेव ने अर्जुन से कहा तथा देहत्याग किया [म. मौ. ६-७] । अर्जुन ने सब को द्वारका छोड कर इन्द्रप्रस्थ जाने की तैय्यारी करने के लिये कहा, तथा वसुदेव, राम तथा कृष्ण को अग्नि दी । तदनंतर, इसके नेतृत्व में अवशिष्ट यादवस्त्रियॉं तथा पौर इन्द्रप्रस्थ निकले ही, कि इधर द्वारका समुद्र ने निगल ली इन्द्रप्रस्थ की ओर आते समय, पंचनद देश में अर्जुन ने डेरा डाला । अर्जुन अकेला ही अनेक स्त्रियों को ले कर जा रहा है यह देख, वहॉं के आभीर लोगों ने अर्जुन पर आक्रमण किया । अर्जुन उस समय वृद्ध हो चला था, भाग्य भी बदला गया था । इससे पहले के समान, धनुष सज्ज कर बाण नही छोड सकता था । अस्त्रमंत्र याद नही आ रहे थे, बाण भी समाप्त हो गये थे । अंत में, धनुष्य का लाठी के समान उपयोग कर अर्जुन सब को मारने लगा । इससे कई स्त्रियॉं भगाई गई, कई स्वयं भाग गई, तथा बचे हुए परिवार के साथ बडी कठिनाई से अर्जुन इन्द्रप्रस्थ लौट सका (अष्टावक्र देखिये) । जो कुछ अंकुर यादव वंश के बचे थे, उनकी इसने व्यवस्था की । हार्दिक्यतनय को मृत्तिकावत का राज्य दिया, अश्वपति को खाण्डववन का राज्य दिया तथा बाकी सब को इन्द्रप्रस्थ में रख कर, वज्र को इन्द्रप्रस्थ का राजा बनाया [म. मौ. ८];[ पद्म. ३. २७९. ५६];[ब्रह्म. २१०-२१२];[ विष्णु. ५.३७.३८];[ अग्नि.१५] । इस प्रकार व्यवस्था कर के, अर्जुन उद्विग्र अवस्था में व्यास आश्रम में गया, तथा व्यास का दर्शन ले कर, हस्तिनापूर आ कर, सब निवेदन युधिष्ठिर को किया [म. मौ९ कुं]
मृत्यु n.  तदपुरांत जब सब पांडव हिमालय पर जा रहे थे, तब १०६ वर्ष की उम्र में इसका पतन हुआ । भीम ने पूछा कि, बीच में ही इसका पतन क्यों हुआ? तब धर्म ने कहा कि, यह हमेशा कहता था कि, मैं अकेले ही शत्रूओं को नष्ट करुंगा, परंतु उसने ऐसा किया नही । उसी प्रकार, अन्य धनुर्धारियों का यह अवमान भी करता था, इस लिये इसका पतन हुआ [म. महा. ३.२१-२२]
कौटुंबिक n.  अर्जुन को द्रौपदी उत्पन्न पुत्र श्रुतकीर्ति भारतीय युद्ध में मृत हो गया । सुभद्रा से उत्पन्न पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह में मृत हुआ, तथा चित्रांगदापुत्र बभ्रुवाहन मणिपूर का राजा बना । उलूपीपुत्र इरावर की मृत्यु भी युद्ध में हुई । आगे चल कर, अर्जुन का पौत्र परीक्षित राजा बना । अर्जुन ने हिरण्यपुर के पौलोम, कालकेय तथा दानव का वध किया [ब्रह्मांड. ३.६.२८] । यह नर का अवतार है ।
अस्त्र n.  परशुराम द्वारा की गई नरस्तुति में अर्जुन के निम्नांकित अस्त्रों का वर्णन है १. काकुदिक (काम), २. शुक (क्रोध), ३. नाक (लोभ), ४. अक्षिसंतर्जन (मोह), ५. संतन (मद), ६. नर्तक (मान), ७. घोर (मत्सर), ८. आस्यमोदक (अहंकार), [म.उ.९६] । अर्जुन की उपासना पाणिनी के समय लोक करते थे, ऐसा पाणिनीसूत्रों से ज्ञात होता है [पा. सू. ४.३.९८] । इसके रथ का नाम नंदिघोष [गरुड. ३.१४५.१६] । इसने ६५ वर्षो तक गांडीव का उपयोग किया [म. वि. ४७.७]
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